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Hathras Mahotsav: गुलाबो सपेरा नहीं भूला पातीं वो सात घंटे, जब उन्हें जमीन में जिंदा ही दफन कर दिया था

Sun, 26 Mar 2023 02:27 AM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस Published by: चमन शर्मा Updated Sun, 26 Mar 2023 02:27 AM IST
सार

गुलाबो सपेरा ने हाथरस महोत्सव में बताया कि मेरे जन्म के समय मेरे पिता घर में नहीं थे तो मुझे समाज के लोगों ने जमीन में जिंदा ही दफना दिया था। मेरी मां की जिद पर मेरी मौसी ने मुझे करीब सात घंटे बाद जमीन से बाहर निकाला। मुझे जीवित देख कर पिता डर के कारण अपने साथ दूर स्थानों पर ले गए।

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Gulabo Sapera not forget seven hours she was buried alive in the ground
हाथरस महोत्सव में गुलाबो सपेरा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोना का समय एक ऐसा दौर था, जब कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। कलाकारों को किराए के घरों से बाहर निकाल दिया गया। मेरे घर का बिजली कनेक्शन काट दिया गया था। पड़ोसी मदद नहीं करते तो शायद कलाकार मर ही जाते। यह बातें पद्मश्री गुलाबो सपेरा ने हाथरस महोत्सव कार्यक्रम के दौरान कही। 

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जिले में पहली बार हाथरस महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। हाथरस महोत्सव में दूसरे दिन शनिवार को पद्मश्री गुलाबो सपेरा पहुंचीं। उन्होंने कहा कि मैं हर घर में एक गुलाबो देखना चाहती हूं। बेटियों को शिक्षित कर समाज को मजबूत करना चाहिए। आज हमारे समाज के सभी परिवारों में बेटियां हैं। यह बेटियां विदेशों में भी नाम रोशन कर रही हैं। 
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उन्होंने कहा कि लोक नृत्य मेरे द्वारा ही शुरू किया गया है। मेरी नृत्य कला को देश में सम्मान मिला है। मंच पर जो नृत्य करती हूं, वह दिल से करती हूं। इस नृत्य के आधार पर ही मुझको पद्मश्री दिया गया है। उन्होंने कहा कि मेरी तीन बेटियां हैं। जब मैं विदेश जाती थी, तो एयरपोर्ट पर फॉर्म भरने के लिए मुझे दूसरों को देखना पड़ता था। मैंने उसी दिन ठान लिया था कि मैं अपनी बेटियों को अंग्रेजी जरूर पढ़ाऊंगी।
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नौ माह मां के गर्भ में सात घंटे धरती मां की गोद में रही
गुलाबो सपेरा ने अपने संघर्ष के दिनों को भी साझा किया। उन्होंने कहा कि हम नाथ पंथ से हैं। हमारे समाज में बेटी को जन्म होते ही दुनिया से वापस भेजने की प्रथा थी। मेरे जन्म के समय मेरे पिता घर में नहीं थे तो मुझे समाज के लोगों ने जमीन में जिंदा ही दफना दिया था। मैं नौ माह अपनी मां के गर्भ में और सात घंटे धरती मां की गोद में रही हूं। मेरी मां की जिद पर मेरी मौसी ने मुझे करीब सात घंटे बाद जमीन से बाहर निकाला। 


मुझे जीवित देख कर पिता डर के कारण अपने साथ दूर स्थानों पर ले गए। तब लोगों ने हमारे परिवार को समाज से बाहर कर दिया। कामयाबी मिलने पर समाज के ही लोग मुझे लेने के लिए दिल्ली पहुंचे। मैंने उनसे कहा कि जब बेटियों को मारने की प्रथा बंद होगी तो ही मैं समाज में वापसी करुंगी। तब कहीं जाकर वर्ष 1985 के बाद बेटियों को खत्म करने की अवैध प्रथा खत्म हुई।

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