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जिन्होंने दी देश के लिए जान, उनके परिवारों का नहीं कोई ध्यान
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शहीद सत्यवीर
- फोटो : SADABAD
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अशोक वार्ष्णेय, सादाबाद।
शहीदों के परिवार के जख्म भर पाना नामुमकिन है। 26 जुलाई आते ही हर उस परिवार के जख्म हरे हो जाते हैं, जिन्होंने उस युद्ध में अपने बेटे, भाई, पति या पिता को खोया है। बहनें एक बार फिर राखी को देखकर रो पड़ती हैं और मां बाप घर के कोने में खड़ी लाठी का सहारा लेकर बाहर अकेले ही निकल पड़ते हैं, क्योंकि कारगिल युद्ध ने इनसे इनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया था। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में सादाबाद की वीरभोग्या वसुंधरा के कई जांबाज भी वतन के लिए शहीद हो गए थे। इन जांबाजों की शहादत से सादाबाद का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज तो हो गया, लेकिन शहीदों के परिवार आज भी उपेक्षाओं का शिकार है। हुक्मरानों ने इनकी समस्याओं पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। जो सुविधाएं इन्हें मिलनी चाहिए, वह उनसे आज भी कोसों दूर हैं। अमर उजाला ने कुछ ऐसे ही शहीदों के परिवारों से बातचीत की। बातचीत में अपना दर्द बताते बताते उनकी आंखों से आंसू भी छलक उठे।
शहीद गजपाल की प्रतिमा स्थल तक का रास्ता बहदाल
सादाबाद की ग्राम पंचायत नौगांव के माजरा नगला चौधरी निवासी रामकिशन सूबेदार के बेटे चौ. गजपाल सिंह ने भी कारगिल युद्ध में वीरता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी फौज और पाकिस्तानी आतंकियों से जमकर संघर्ष किया था। संघर्ष के बाद उस समय अचानक प्राकृतिक रूप से बर्फीले तूफान में गजपाल सिंह सहित आधा दर्जन सैनिक फंस गए थे, जिसमें गजपाल का शव 45 दिन बाद मिला था। जब उनके बेटे के शहीद होने की खबर आई तो जैसे उन पर पहाड़ टूट पड़ा। शहीद गजपाल के पिता भी सेना से 1997 मे सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने 1995 में जाट रेजीमेंट मे अपने पुत्र गजपाल को देश की सेवा के लिए भर्ती कराया था। रामकिशन ने कारगिल दिवस की पूर्व संध्या पर बताया कि सरकारी मशीनरी का यह हाल है कि कोतवाली, तहसील या अन्य सरकारी दफ्तरों में किसी भी कार्य के लिए जाया जाए तो कोई भी तवज्जो उन्हें और उनके परिवार को नहीं मिलती। उन्होंने बताया कि उनके बेटे गजपाल के प्रतिमा स्थल तक जाने के लिए रास्ता बेहद खराब है। उनके मकान के आगे सड़क पर गंदा पानी भरा रहता है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। इस देश पर शहादत देने वालों की कतई चिंता नहीं प्रशासन को नहीं है।
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प्रशासन ने नहीं कराया हसन अली के शहीद गेट का निर्माण
कारगिल युद्ध में इन दो शहीदों के अलावा नगला कल्हू कंजौली निवासी हसन अली का भी नाम आता है। हसन अली की पत्नी रीमा बेगम ने बताया कि उनके पति देश के लिए शहीद हो गए, लेकिन आज तक प्रशासन ने शहीद गेट तक निर्माण नहीं कराया। उनके स्मारक पर आज तक पानी पीने तक की कोई सुविधा नहीं है। मकान के आगे पानी निकासी की सुविधा भी नहीं है। शहीद गेट के लिए वह कई बार अधिकारियों के यहां एप्लीकेशन भी दे चुकी है, लेकिन आज तक उनकी सुनवाई नहीं हुई है। कोई अधिकारी सुनता नहीं है, इसलिए शिकायत करना भी छोड़ दिया है। वह कहती हैं कि उनके लिए देश सेवा सर्वोपरि है, पति के निधन के बाद उन्होने अपने बेटे आबू हसन को भी सेना में भर्ती कराया है। दो साल पहले ही उसकी भर्ती हुई है। उनका बेटा देश सेवा में जी जान से जुटा है। बोलीं कि सरकार को शहीदों के परिवार के लिए कुछ तो करना चाहिए। उनके वीर सपूतों ने अपने प्राण देश की रक्षा करते करते त्याग दिए।
प्रशासन भूला, खुद पिता ने बनवाया था सत्यवीर का स्मारक
सादाबाद क्षेत्र के ही गांव भूतिया निवासी 70 वर्षीय एवं दृष्टिहीन बाबूलाल बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान जिस समय उन्हें अपने युवा पुत्र सत्यवीर के शहीद होने की सूचना मिली थी। तभी से उनकी आंखें सूख गईं और तब से लेकर आज तक आंखों की रोशनी नही लौटी है। बेटे के शहीद होने के वक्त तो प्रशासन और सरकार ने गांव के विकास और प्रतिमा स्थल को लेकर कई वादे किए थे, लेकिन उन्हें खुद ही अपने बेटे का शहीद स्मारक बनवाना पड़ा। उन्होंने बताया कि सरकारी मशीनरी से उन्हें कभी कोई राहत नहीं मिली और न कोई अधिकारी उनकी सुनता है। वर्ष 1999 के बाद से लेकर अब तक न किसी अधिकारी ने और न किसी जनप्रतिनिधि ने उनका हाल चाल जाना। वह कहते हैं कि उनका बेटा देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया, लेकिन आज उसके ही परिवार को कोई संरक्षण या सहायता नहीं मिल रही।
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शहीदों के परिवार के जख्म भर पाना नामुमकिन है। 26 जुलाई आते ही हर उस परिवार के जख्म हरे हो जाते हैं, जिन्होंने उस युद्ध में अपने बेटे, भाई, पति या पिता को खोया है। बहनें एक बार फिर राखी को देखकर रो पड़ती हैं और मां बाप घर के कोने में खड़ी लाठी का सहारा लेकर बाहर अकेले ही निकल पड़ते हैं, क्योंकि कारगिल युद्ध ने इनसे इनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया था। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में सादाबाद की वीरभोग्या वसुंधरा के कई जांबाज भी वतन के लिए शहीद हो गए थे। इन जांबाजों की शहादत से सादाबाद का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज तो हो गया, लेकिन शहीदों के परिवार आज भी उपेक्षाओं का शिकार है। हुक्मरानों ने इनकी समस्याओं पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। जो सुविधाएं इन्हें मिलनी चाहिए, वह उनसे आज भी कोसों दूर हैं। अमर उजाला ने कुछ ऐसे ही शहीदों के परिवारों से बातचीत की। बातचीत में अपना दर्द बताते बताते उनकी आंखों से आंसू भी छलक उठे।
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शहीद गजपाल की प्रतिमा स्थल तक का रास्ता बहदाल
सादाबाद की ग्राम पंचायत नौगांव के माजरा नगला चौधरी निवासी रामकिशन सूबेदार के बेटे चौ. गजपाल सिंह ने भी कारगिल युद्ध में वीरता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी फौज और पाकिस्तानी आतंकियों से जमकर संघर्ष किया था। संघर्ष के बाद उस समय अचानक प्राकृतिक रूप से बर्फीले तूफान में गजपाल सिंह सहित आधा दर्जन सैनिक फंस गए थे, जिसमें गजपाल का शव 45 दिन बाद मिला था। जब उनके बेटे के शहीद होने की खबर आई तो जैसे उन पर पहाड़ टूट पड़ा। शहीद गजपाल के पिता भी सेना से 1997 मे सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने 1995 में जाट रेजीमेंट मे अपने पुत्र गजपाल को देश की सेवा के लिए भर्ती कराया था। रामकिशन ने कारगिल दिवस की पूर्व संध्या पर बताया कि सरकारी मशीनरी का यह हाल है कि कोतवाली, तहसील या अन्य सरकारी दफ्तरों में किसी भी कार्य के लिए जाया जाए तो कोई भी तवज्जो उन्हें और उनके परिवार को नहीं मिलती। उन्होंने बताया कि उनके बेटे गजपाल के प्रतिमा स्थल तक जाने के लिए रास्ता बेहद खराब है। उनके मकान के आगे सड़क पर गंदा पानी भरा रहता है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। इस देश पर शहादत देने वालों की कतई चिंता नहीं प्रशासन को नहीं है।
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प्रशासन ने नहीं कराया हसन अली के शहीद गेट का निर्माण
कारगिल युद्ध में इन दो शहीदों के अलावा नगला कल्हू कंजौली निवासी हसन अली का भी नाम आता है। हसन अली की पत्नी रीमा बेगम ने बताया कि उनके पति देश के लिए शहीद हो गए, लेकिन आज तक प्रशासन ने शहीद गेट तक निर्माण नहीं कराया। उनके स्मारक पर आज तक पानी पीने तक की कोई सुविधा नहीं है। मकान के आगे पानी निकासी की सुविधा भी नहीं है। शहीद गेट के लिए वह कई बार अधिकारियों के यहां एप्लीकेशन भी दे चुकी है, लेकिन आज तक उनकी सुनवाई नहीं हुई है। कोई अधिकारी सुनता नहीं है, इसलिए शिकायत करना भी छोड़ दिया है। वह कहती हैं कि उनके लिए देश सेवा सर्वोपरि है, पति के निधन के बाद उन्होने अपने बेटे आबू हसन को भी सेना में भर्ती कराया है। दो साल पहले ही उसकी भर्ती हुई है। उनका बेटा देश सेवा में जी जान से जुटा है। बोलीं कि सरकार को शहीदों के परिवार के लिए कुछ तो करना चाहिए। उनके वीर सपूतों ने अपने प्राण देश की रक्षा करते करते त्याग दिए।
प्रशासन भूला, खुद पिता ने बनवाया था सत्यवीर का स्मारक
सादाबाद क्षेत्र के ही गांव भूतिया निवासी 70 वर्षीय एवं दृष्टिहीन बाबूलाल बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान जिस समय उन्हें अपने युवा पुत्र सत्यवीर के शहीद होने की सूचना मिली थी। तभी से उनकी आंखें सूख गईं और तब से लेकर आज तक आंखों की रोशनी नही लौटी है। बेटे के शहीद होने के वक्त तो प्रशासन और सरकार ने गांव के विकास और प्रतिमा स्थल को लेकर कई वादे किए थे, लेकिन उन्हें खुद ही अपने बेटे का शहीद स्मारक बनवाना पड़ा। उन्होंने बताया कि सरकारी मशीनरी से उन्हें कभी कोई राहत नहीं मिली और न कोई अधिकारी उनकी सुनता है। वर्ष 1999 के बाद से लेकर अब तक न किसी अधिकारी ने और न किसी जनप्रतिनिधि ने उनका हाल चाल जाना। वह कहते हैं कि उनका बेटा देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया, लेकिन आज उसके ही परिवार को कोई संरक्षण या सहायता नहीं मिल रही।

शहीद गजपाल का समाधि स्थल। - फोटो : SADABAD

शहीद गजपाल - फोटो : SADABAD

शहीद हसन अली का समाधि स्थल। - फोटो : SADABAD

शहीद हसन अली- फोटो : SADABAD