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Hathras News: जरायम के कलंक को मिटाने की छटपटाहट, अपराध से तौबा कर रहे बधिक

Mon, 23 Jun 2025 11:22 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 23 Jun 2025 11:22 PM IST
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Desperation to remove the stigma of prostitution, criminals are desisting from crime
अपराध ही जिनका पुश्तैनी धंधा, आजादी के 78 साल बाद भी अंग्रेजों के जमाने में लगे इस कलंक के साथ गांव बाग बधिक लोग जी रहे हैं। इस गांव की छवि ऐसी थी कि आसपास से भी लोग गुजरने से बचते थे। पुलिस भी इस गांव जाने से कतराती थी, कभी गई भी तो एक साथ कई थानों की पुलिस जाती थी। अब यहां के लोग जरायम के कलंक को मिटाना चाहते हैं। अपराध से तौबा कर मुख्यधारा में जुड़ने की छटपटाहट उनमें साफ दिख रही है।
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यहां के ग्रामीणों का कहना है कि जो लोग अपराध कर रहे हैं, उन्हें सजा दी जाए, वह भी इस मामले में पुलिस के साथ हैं, लेकिन बेगुनाह को न फंसाया जाए। गांव के मनोज कुमार बताते हैं कि इस बदलाव में यहां की महिलाओं की अहम भूमिका है, जिन्होंने अपने पति और परिवार पर अपराध छोड़ने के लिए दबाव बनाया। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने समय-समय पर बैठकें कर लोगों को समाज के साथ मुख्य धारा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
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2500 की आबादी वाले इस गांव में कभी 40 हिस्ट्रीशीटर अपराधी थे। गांव के 70 प्रतिशत परिवारों के किसी न किसी सदस्य पर कोई न कोई मामला दर्ज था। सीओ हिमांशु माथुर का कहना है कि अब गांव में काफी सुधार आ रहा है। 2020-2021से कोई अपराध इस गांव के लोगों पर दर्ज नहीं हुआ है। हिस्ट्रीशीटर भी 22 रह गए हैं, उन पर भी कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है।
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बुजुर्ग शीला देवी (65) बताती हैं कि जो लोग पहले चोरी करते थे, वे भी अब मेहनत मजदूरी करते हैं। रामवती (55) बताती हैं कि यहां की महिलाओं ने अपने पतियों को बड़ा काम यानी अपराध करने से रोका।

सौदान सिंह (50) कहते हैं कि विकास, सुविधाएं और रोजगार बढ़े तो गांव पूरी तरह से अपराध मुक्त हो जाए। महात्मा इंदल सिंह बताते हैं कि हम हर साल मिलजुलकर भागवत कथा करते हैं और धर्म से जुड़ने का भी असर हो रहा है।



शिक्षा के प्रति भी बढ़ रहा रुझान

पहले इस गांव में कोई पढ़ने नहीं जाता था। अब एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय है, जिसमें गांव के बच्चे पढ़ रहे हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए आगरा और दूसरी जगह चले गए।



पीड़ा... सरकारी नौकरी से दूर कर देती है पुलिस की रिपोर्ट

सहपऊ। इस गांव से दो लोग दुर्ग सिंह उपनिरीक्षक और लोचन सिंह मुख्य आरक्षी पद से सेवानिवृत है। ग्रामीण बताते हैं कि एक और युवक की पुलिस में नौकरी लगी थी, लेकिन गांव की छवि और रिकार्ड देखते हुए थाने से वैरिफिकेशन रिपोर्ट खिलाफ चली गई। नेत्रपाल सिंह की पीड़ा है कि बच्चों को सरकारी नौकरी नहीं मिलती। वह यह भी कहते हैं कि निजी संस्थानों, सॉफ्टवेयर कंपनियों और फैक्टरियों में काफी लोग नौकरी कर रहे हैं, इनमें अधिकांश दूसरी जगहों पर जा बसे हैं। दुर्ग सिंह की पत्नी तेजवती ग्राम प्रधान रह चुकी हैं। ब्यूरो



अंग्रेज अधिकारी का पेन चुराने पर

बाग कर दिया था बधिकों के नाम

ग्रामीण बताते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में यहां 14 एकड़ का एक बाग था। एक बार एक अंग्रेज अधिकारी ने गांव के लोगों को बुलाया और पूछा कि क्या वे उनकी कोई वस्तु चोरी कर सकते हैं। ग्रामीणों ने कोई कार्रवाई नहीं करने का लिखित आश्वासन मांगा। अंग्रेज अधिकारी ने सुरक्षा बंदोबस्त किए और तय समय के बाद कहा कि आप तो कोई चोरी नहीं कर पाए। तब ग्रामीणों उनका वह पेन रख दिया,जिससे आश्वासन लिखकर दिया था। तब अंग्रेज अधिकारी ने 60 बीघा जमीन गांव के लोगों के नाम कर दी।



पुलिस का व्यवहार आज भी अंग्रेजों जैसा

1871 में अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति अधिनियम पारित किया था और 200 से अधिक जनजातियों को जरायम पेशा जातियों में शामिल किया। तभी से बधिक सहित इन जातियों में पैदा होने वालों पर जन्म से ही अपराधी का ठप्पा लग जाता। 1952 में इसमें बदलाव किया गया। इसे आदतन अपराधी अधिनियम बनाया गया। कानून बदला लेकिन पुलिस का व्यवहार इनके प्रति अंग्रेजों के जमाने वाला ही रहा।


-समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पुलिस मिशन जागृति की टीम को वहां भेजकर महिलाओं की शिक्षा और नवाचार के बारे में जागरूक करेगी। जिससे वह मुख्य धारा में जुड़ सके। युवाओं के भी कौशल विकास पर जोर दिया जा रहा है। चिरंजीवनाथ सिन्हा, एसपी
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