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Hathras News: ब्रज में फिर से लहलहाएगी कपास की फसल
Sun, 05 Jul 2026 02:17 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Sun, 05 Jul 2026 02:17 AM IST
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सिकंदराराऊ रोड स्थित बिजली कॉटन मिल का मुख्य द्वार। संवाद
- फोटो : Samvad
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विनीत चौरसिया
हाथरस। कभी देश की प्रमुख कपास बेल्ट और सूत उत्पादन में पहचान रखने वाले हाथरस सहित अलीगढ़, मथुरा और आगरा का चयन कपास क्रांति योजना में किया गया है। ब्रज के इन जिलों में 30-30 किसानों के समूह बनाकर उन्हें साल में दो बार कपास की उन्नत खेती और बेहतर उत्पादन लेने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही किसानों को 7500 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान भी दिया जाएगा।
बड़ी बात यह है कि इन जिलों की भूमि और जलवायु कपास की खेती के लिए उपयुक्त है। एक समय था, जब हाथरस की पहचान केवल हींग और उद्योगों से नहीं, बल्कि कपास उत्पादन और सूत उद्योग से भी होती थी। यहां की मिलों में तैयार सूत देशभर में भेजा जाता था।
1980 के दशक में मिलें बंद हुईं तो कपास की खेती भी लगभग समाप्त हो गई। वर्तमान में हाथरस में केवल मुरसान क्षेत्र के करीब 200 हेक्टेयर में ही कपास की खेती बची है। कपास की बुवाई अप्रैल माह में होती है। ऐसे में सरकार आगामी सीजन से पहले अधिक से अधिक किसानों को इस योजना से जोड़ना चाहती है।
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जिला कृषि अधिकारी निखिल देव तिवारी का कहना है कि हाथरस सहित ब्रज क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी कपास उत्पादन के लिए उपयुक्त है। आधुनिक तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग से उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है। संवाद
क्या है कपास क्रांति योजना
चीन के बाद दुनिया का दूसरा कपास उत्पादक और उपभोक्ता देश भारत है। इसके बाद भी कपास को आयात करना पड़ता है, जिसे देखते हुए केंद्र सरकार ने 2030-2031 तक कपास उत्पादकता मिशन के तहत भारत को इसके उत्पादन में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए 5,659.22 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। खेत से रेशा, रेशे से फैक्टरी, फैक्टरी से फैशन और फैशन से विदेश विजन के साथ कपास क्रांति योजना लागू की गई है।
कभी देशभर में थी बिजली कॉटन मिल की धाक
बिजली कॉटन मिल के पूर्व कर्मचारी गिरजेश कुमार कुलश्रेष्ठ ने बताया कि एक समय जिले की बिजली कॉटन मिल की देश भर में धाक थी। इसके मालिक आगरा के सेठ रामबाबूलाल थे। एक समय छोटी-बड़ी करीब 25 कॉटन मिलें हाथरस में थीं। वर्ष 1970-71 में देश की 103 कॉटन मिलों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें राष्ट्रीय वस्त्र निगम के अधीन कर दिया गया। इसके बाद से अव्यवस्थाएं बढ़ती गईं, मिलों में उत्पादन प्रभावित होने लगा। इकाइयां घाटे में चली गईं। वर्ष 1982 से 1988 तक हाथरस की सभी कॉटन मिलें बंद हो गईं।
राजस्थान और पंजाब से भी आती थी कपास
आजादी से पहले राजस्थान और पंजाब से भी बड़ी मात्रा में कपास आती थी। उसके बाद कपास उत्पाद कई इलाके पाकिस्तान की सीमा में चले गए, लेकिन कारोबार होता रहा। हाथरस में कपास से सूत तैयार किया जाता था, प्रकाश टेक्सटाइल फैक्टरी में कपड़ा भी बनाया जाता था। शहर की रुई मंडी की पहचान उसी दौर की है, हालांकि अब बस यह नाम रह गया है, कपास का कारोबार अब यहां नहीं होता।
-हाथरस की मंडी के अलावा मथुरा की राया मंडी में हम कपास बेचते हैं। इसका सामान्य रूप से प्रयोग रजाई गद्दों में किया जाता है। इसके बाद अगर थोक कारोबारियों के पास माल बचता है कि तो उसे गुजरात की कॉटन मिलों के लिए भेज देते हैं। विष्णु चौधरी, निवासी गांव उदयभान
-करीब 35-40 वर्ष पहले हाथरस की पहचान कपास और कॉटन मिलों से होती थी। सरकार की यह योजना प्रभावी ढंग से लागू हुई और किसानों को उचित बाजार मिला तो निश्चित रूप से कपास की खेती फिर से बढ़ेगी और किसानों की आय में भी इजाफा होगा। -लक्ष्मीपति सेकसरिया, कॉटन मिलों के जानकार
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हाथरस। कभी देश की प्रमुख कपास बेल्ट और सूत उत्पादन में पहचान रखने वाले हाथरस सहित अलीगढ़, मथुरा और आगरा का चयन कपास क्रांति योजना में किया गया है। ब्रज के इन जिलों में 30-30 किसानों के समूह बनाकर उन्हें साल में दो बार कपास की उन्नत खेती और बेहतर उत्पादन लेने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही किसानों को 7500 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान भी दिया जाएगा।
बड़ी बात यह है कि इन जिलों की भूमि और जलवायु कपास की खेती के लिए उपयुक्त है। एक समय था, जब हाथरस की पहचान केवल हींग और उद्योगों से नहीं, बल्कि कपास उत्पादन और सूत उद्योग से भी होती थी। यहां की मिलों में तैयार सूत देशभर में भेजा जाता था।
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1980 के दशक में मिलें बंद हुईं तो कपास की खेती भी लगभग समाप्त हो गई। वर्तमान में हाथरस में केवल मुरसान क्षेत्र के करीब 200 हेक्टेयर में ही कपास की खेती बची है। कपास की बुवाई अप्रैल माह में होती है। ऐसे में सरकार आगामी सीजन से पहले अधिक से अधिक किसानों को इस योजना से जोड़ना चाहती है।
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जिला कृषि अधिकारी निखिल देव तिवारी का कहना है कि हाथरस सहित ब्रज क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी कपास उत्पादन के लिए उपयुक्त है। आधुनिक तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग से उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है। संवाद
क्या है कपास क्रांति योजना
चीन के बाद दुनिया का दूसरा कपास उत्पादक और उपभोक्ता देश भारत है। इसके बाद भी कपास को आयात करना पड़ता है, जिसे देखते हुए केंद्र सरकार ने 2030-2031 तक कपास उत्पादकता मिशन के तहत भारत को इसके उत्पादन में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए 5,659.22 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। खेत से रेशा, रेशे से फैक्टरी, फैक्टरी से फैशन और फैशन से विदेश विजन के साथ कपास क्रांति योजना लागू की गई है।
कभी देशभर में थी बिजली कॉटन मिल की धाक
बिजली कॉटन मिल के पूर्व कर्मचारी गिरजेश कुमार कुलश्रेष्ठ ने बताया कि एक समय जिले की बिजली कॉटन मिल की देश भर में धाक थी। इसके मालिक आगरा के सेठ रामबाबूलाल थे। एक समय छोटी-बड़ी करीब 25 कॉटन मिलें हाथरस में थीं। वर्ष 1970-71 में देश की 103 कॉटन मिलों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें राष्ट्रीय वस्त्र निगम के अधीन कर दिया गया। इसके बाद से अव्यवस्थाएं बढ़ती गईं, मिलों में उत्पादन प्रभावित होने लगा। इकाइयां घाटे में चली गईं। वर्ष 1982 से 1988 तक हाथरस की सभी कॉटन मिलें बंद हो गईं।
राजस्थान और पंजाब से भी आती थी कपास
आजादी से पहले राजस्थान और पंजाब से भी बड़ी मात्रा में कपास आती थी। उसके बाद कपास उत्पाद कई इलाके पाकिस्तान की सीमा में चले गए, लेकिन कारोबार होता रहा। हाथरस में कपास से सूत तैयार किया जाता था, प्रकाश टेक्सटाइल फैक्टरी में कपड़ा भी बनाया जाता था। शहर की रुई मंडी की पहचान उसी दौर की है, हालांकि अब बस यह नाम रह गया है, कपास का कारोबार अब यहां नहीं होता।
-हाथरस की मंडी के अलावा मथुरा की राया मंडी में हम कपास बेचते हैं। इसका सामान्य रूप से प्रयोग रजाई गद्दों में किया जाता है। इसके बाद अगर थोक कारोबारियों के पास माल बचता है कि तो उसे गुजरात की कॉटन मिलों के लिए भेज देते हैं। विष्णु चौधरी, निवासी गांव उदयभान
-करीब 35-40 वर्ष पहले हाथरस की पहचान कपास और कॉटन मिलों से होती थी। सरकार की यह योजना प्रभावी ढंग से लागू हुई और किसानों को उचित बाजार मिला तो निश्चित रूप से कपास की खेती फिर से बढ़ेगी और किसानों की आय में भी इजाफा होगा। -लक्ष्मीपति सेकसरिया, कॉटन मिलों के जानकार