Holi: बाजार में बने चिप्स-पापड़ का भा रहा स्वाद, 80 से 150 रुपये किलो तक मिल रहे बाजार में
बाजारों में घरों में बनने वाले चिप्स-पापड़ की जगह सूजी, मैदा, चावल, दाल और केला आदि से मशीन की मदद से बने चिप्स-पापड़ ने ले ली है। करीब 80 रुपये किलो से 150 रुपये प्रति किलो तक के दामों पर इनकी बिक्री हो रही है।
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समय के साथ होली के त्योहार की परंपराएं भी बदल रही हैं। एक समय था जब त्योहार से महीने भर पहले महिलाएं घरों में चिप्स-पापड़ तैयार करती थीं, लेकिन अब इनकी जगह रेडीमेड चिप्स-पापड़ ने ले ली है। इस बार भी त्योहार से पहले बाजार में इनकी बिक्री शुरू हो गई है।
पुराने समय में होली से पहले घरों में चिप्स-पापड़ तैयार करने का होता था। महिलाएं सामूहिक रूप से धूप में चिप्स-पापड़ तैयार करती थीं और उन्हें सुखाती थीं। होली से पहले तैयार किए गए चिप्स-पापड़ का स्वाद होली के बाद साल भर लिया जाता था, लेकिन अब इस परंपरा में बड़ा परिवर्तन आया है।
बाजारों में घरों में बनने वाले चिप्स-पापड़ की जगह सूजी, मैदा, चावल, दाल और केला आदि से मशीन की मदद से बने चिप्स-पापड़ ने ले ली है। करीब 80 रुपये किलो से 150 रुपये प्रति किलो तक के दामों पर इनकी बिक्री हो रही है। कई परिवारों में होली पर इनका ही प्रयोग किया जा रहा है।
हम कोशिश करते हैं कि धूप में चिप्स-पापड़ बनाएं और आने वाली पीढ़ी को भी सिखाएं कि कैसे हम होली पर चिप्स-पापड़ बनाते थे, लेकिन अब उस तरह का जोश नहीं है। सामूहिक रूप से जो काम किया जाता था, वह माहौल नहीं है।-कांति देवी, बुजुर्ग गृहिणी।
पहले हमारी सास पूरे जोश के साथ चिप्स-पापड़ धूप में बनाती थीं, लेकिन अब पहले जैसा उत्साह नहीं है। घर पर चिप्स-पापड़ बनाने में बहुत झंझट रहता है। उन्हें सुखाना किसी चुनौती से कम नहीं होता।-गुंजन टालीवाल, गृहिणी।
महिलाओं का कामकाजी होना भी वजह
महिलाओं का कहना है कि पहले महिलाएं नौकरी आदि नहीं करती थीं। अब ज्यादातर महिलाएं कामकाजी हो गई हैं। ऐसे में एक माह पहले से ही चिप्स-पापड़ बना पाना मुमकिन नहीं हो पाता। इसलिए बाजार के रेडीमेड चिप्स-पापड़ को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
बंदरों के उत्पात ने प्रभावित की परंपरा
घरों में चिप्स-पापड़ सामान्य तौर पर छतों पर बनाए जाते थे। इन्हें सुखाने के लिए धूप में रखा जाता था, लेकिन बंदरों के उत्पात ने लोगों का छतों पर जाना कम करा दिया है। बंदरों के उत्पात के चलते होने वाली घटनाओं के चलते महिलाएं खान-पान की वस्तुओं को धूप में सुखा नहीं पातीं।