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अटल जी की बातों पर दिया होता ध्यान तो विदेशों तक फलता फूलता हाथरस का हेंडीक्राफ्ट का कारोबार
Updated Sun, 19 Aug 2018 12:37 AM IST
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न्यूज डेस्क अमर उजाला हाथरस
हाथरस। आजादी के बाद 16 अगस्त 1959 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हाथरस आए थे। यहां पर जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने के बाद उन्होंने हैंडीक्राफ्ट की कला को देखा तो कहा था कि शासन-प्रशासन को इसके लिए नीति बनानी चाहिए। हाथरस में 16 अगस्त 1959 में अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने आए थे।
यहां उनकी मुलाकात सुरेश बागड़ी के पिता रामलाल बागड़ी से हुई। रामलाल जी ने वाजपेयी से चीन ल्हाना कला केंद्र देखने का अनुरोध किया। जिस पर वाजपेयी जी उनके कला केंद्र पहुंचे और केंद्र पर मौजूद विजिटर बुक के एक पन्ने में वाजपेयी ने लिखा कि चीन ल्हासा कला केंद्र द्वारा निर्मित वस्तुएं देखकर आनंद हुआ।
भारत के प्राचीन हस्तकौशल को सुरक्षित एवं संवर्द्धित करने में इस केंद्र का योगदान स्तुत्य है। शासन को कला केन्द्र की वस्तुओं का निर्यात का उचित प्रबंध करना चाहिए। भारतीय कला के प्रचार के साथ विदेशी मुद्रा की प्राप्ति में भी यह सहायक हो सकता है।’ अगर शासन-प्रशासन ने अटल जी के लिखे शब्दों पर ध्यान दिया होता तो आज हाथरस का हैंडीक्राफ्ट का कारोबार विदेशों तक होता।
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1952 में पानीपत से हाथरस आए थे रामलाल बागड़ी
सुरेश बागड़ी ने बताया कि उनके पिता रामलाल बागड़ी सन 1952 में हाथरस आए थे। उन्होंने सन 1954 में चीन ल्हामा कला केंद्र के नाम से हैंडीक्राफ्ट का काम शुरू किया। उन्होंने रामलखन चित्रशाला भी बनाई। हस्त निर्मित कलात्मक बर्तन बनाने का काम शुरू किया। 1962 में कला केंद्र का नाम चीन ल्हामा से बदल कर तिब्बती कला केंद्र कर दिया गया। केंद्र का नाम बदलने की वजह भारत से चीन का युद्ध था।
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हाथरस। आजादी के बाद 16 अगस्त 1959 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हाथरस आए थे। यहां पर जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने के बाद उन्होंने हैंडीक्राफ्ट की कला को देखा तो कहा था कि शासन-प्रशासन को इसके लिए नीति बनानी चाहिए। हाथरस में 16 अगस्त 1959 में अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने आए थे।
यहां उनकी मुलाकात सुरेश बागड़ी के पिता रामलाल बागड़ी से हुई। रामलाल जी ने वाजपेयी से चीन ल्हाना कला केंद्र देखने का अनुरोध किया। जिस पर वाजपेयी जी उनके कला केंद्र पहुंचे और केंद्र पर मौजूद विजिटर बुक के एक पन्ने में वाजपेयी ने लिखा कि चीन ल्हासा कला केंद्र द्वारा निर्मित वस्तुएं देखकर आनंद हुआ।
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भारत के प्राचीन हस्तकौशल को सुरक्षित एवं संवर्द्धित करने में इस केंद्र का योगदान स्तुत्य है। शासन को कला केन्द्र की वस्तुओं का निर्यात का उचित प्रबंध करना चाहिए। भारतीय कला के प्रचार के साथ विदेशी मुद्रा की प्राप्ति में भी यह सहायक हो सकता है।’ अगर शासन-प्रशासन ने अटल जी के लिखे शब्दों पर ध्यान दिया होता तो आज हाथरस का हैंडीक्राफ्ट का कारोबार विदेशों तक होता।
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1952 में पानीपत से हाथरस आए थे रामलाल बागड़ी
सुरेश बागड़ी ने बताया कि उनके पिता रामलाल बागड़ी सन 1952 में हाथरस आए थे। उन्होंने सन 1954 में चीन ल्हामा कला केंद्र के नाम से हैंडीक्राफ्ट का काम शुरू किया। उन्होंने रामलखन चित्रशाला भी बनाई। हस्त निर्मित कलात्मक बर्तन बनाने का काम शुरू किया। 1962 में कला केंद्र का नाम चीन ल्हामा से बदल कर तिब्बती कला केंद्र कर दिया गया। केंद्र का नाम बदलने की वजह भारत से चीन का युद्ध था।