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किसका क्या हुआ अंजाम, बताएगा मतगणना का परिणाम
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हरदोई। मल्लावां-विधानसभा सीट से सिटिंग विधायक आशीष सिंह आशू के साथ चुनाव के मुकाबले में उतरी भाजपा को वापसी की आस है। भाजपा यहां से लगातार दूसरी जीत हासिल करने के लिए प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी थी।
यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलवा प्रमुख रूप से केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के सहयोगी दल अपना दल की अनुप्रिया पटेल की चुनावी सभा हुई थी।
वोटों के जातीय ध्रुवीकरण से भाजपा ने यहां प्रचार अभियान काफी तेज रखा था, जबकि सपा ने यहां स्टार प्रचारकों के मसले में कोई खास प्रचार अभियान नहीं चलाया।
यहां कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी की सभा कराकर सीट को लेकर इरादे जता दिए थे। बसपा ने यहां सपा की तरह स्टार प्रचारकों के प्रचार पर तो बहुत जोर नहीं दिया, लेकिन काडर वोटों एवं जातीय समीकरणों पर ज्यादा ध्यान दिया।
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इन सभी फैक्टरों के बाद कुर्मी बहुल क्षेत्र में बसपा बड़े उलटफेर की संभावना देख रही है। मतदान के रुझानों को लेकर स्पष्ट रूप से कोई कुछ नहीं कह रहा है।
इसके बाद भी बसपा के बड़े उलटफेर की संभावना लोग देख रहे हैं। बसपा से दो बार विधायक रह चुके कुर्मी जाति के सतीश वर्मा पर दांव लगाना भाजपा की राह में सबसे बड़ी मुश्किल माना जा रहा है।
दरअसल बसपा प्रत्याशी सतीश वर्मा की पत्नी अंजूबाला भाजपा से सांसद रह चुकी हैं। ऐसे में कुछ स्थानों पर भाजपा के वोटों में सेंधमारी के भी आसार दिखे हैं, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष पाल यहां से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। पिछड़ी जाति के वोटों में उनकी पकड़ मानी जाती है।
संडीला विस क्षेत्र---
हरदोई। संडीला विस सीट से सिटिंग विधायक का टिकट काटकर नए चेहरे के साथ चुनाव लड़ी भाजपा की राह जातीय समीकरणों ने कठिन कर दी है, जबकि भाजपा ने यहां नए प्रत्याशी के रूप में अलका अर्कवंशी को जातीय समीकरणों के मद्देनजर ही चुनाव लड़ाया, लेकिन यहां सुभासपा एवं सपा के गठबंधन में यहां चुनाव लड़ रहे सुभासपा प्रत्याशी सुनील अर्कवंशी ने जातीय समीकरणों का खेल बिगाड़ दिया।
ऐसे में यहां बसपा से चुनाव लड़ रहे चार बार के विधायक एवं दो बार मंत्री रह चुके अब्दुल मन्नान ने चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है।
इस सीट पर बसपा प्रत्याशी के रूप में सियासत के बड़े चेहरे माने जाने वाले अब्दुल मन्नान जातिगत के अलावा पार्टी के काडर वोटों एवं अन्य फैक्टरों के साथ बड़ी खामोशी से चुनाव के नई पटकथा लि
ख दी। एक-एक गांव और मोहल्ले से कांटे की टक्कर के अंदाजे के बीच यहां के लोगों ने चुनाव परिणाम ईवीएम में लाक करा दिया है।
जानकारों की मानें तो गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले हुई कांटे की टक्कर में कई स्थानों पर हाथी की चिंघाड़ ने छड़ी और कमल के फूल को पस्त किया है, तो कई स्थानों पर छड़ी का जादू चला है।
इसी तरह से कई स्थानों पर कमल का फूल खिला है। ऐसे में इस सीट पर बसपा के अब्दुल मन्नान, भाजपा की अलका अर्कवंशी एवं सुभासपा के सुनील अर्कवंशी के बीच त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष रहा।
सवायजपुर विस क्षेत्र
भाजपा का सीधा मुकाबला सपा से
हरदोई। सवायजपुर सामान्य विधानसभा सीट से सिटिंग विधायक माधवेंद्र प्रताप सिंह रानू के साथ चुनाव मैदान में उतरी भाजपा की राह में कांग्रेस ने कांटे बो दिए हैं, जिससे मुकाबला दिलचस्प मोड़ से निकलकर सीधे-सीधे सपा के साथ में हो गया।
चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। जातिगत समीकरणों में हमेशा कुछ अलग सा निर्णय करने वाले यहां के वोटरों के बीच इस बार नए फैक्टर आ गए। दरअसल क्षेत्र में कांग्रेस के नन्हे भीठा के बाद पहली बार प्रत्याशी का जोर गांव-गांव में देखा गया।
नन्हे भीठा 20 साल पहले चुनाव लड़े थे। उसके बाद से कांग्रेस इस क्षेत्र में हर गांव तक हर बूथ तक चुनावी बस्ते तक नहीं लगवा पाई। इस बार कांग्रेस प्रत्याशी बनकर चुनावी महाभारत में उतरे राजवर्धन सिंह राजू ने सबसे ज्यादा फोकस ब्राह्मणों पर किया।
इसके अलावा वे काफी समय से यहां से तैयारी कर रहे थे और गांव-गांव संपर्क कर किया था। मतदान के दौरान ऐसे गांवों में भी कांग्रेस के लिए वोट सपोर्ट की बातें हुई, जहां पिछले लंबे समय से भाजपा, बसपा, सपा तक ही चर्चाओं में रहती थी।
यहां से सपा प्रत्याशी पदमराग सिंह पम्मू और भाजपा प्रत्याशी के बीच सीधा मुकाबला है, जबकि कांग्रेस के साथ बसपा प्रत्याशी राहुल तिवारी ने भी पकड़ बनाए रखी है।
शाहाबाद विस क्षेत्र
सपा के आसिफ, भाजपा की रजनी के बीच संग्राम
हरदोई। शाहाबाद सामान्य सीट से सिटिंग विधायक रजनी तिवारी के साथ चुनावी मुकाबले उतरी भाजपा की चुनावी नइया को अपनों ने भंवर में पहुंचा दिया, जिसके चलते सपा और भाजपा के बीच मुकाबला एक पर एक होकर रह गया।
सपा से चुनाव लड़ रहे पूर्व विधायक आसिफ अली बब्बू के लिए भी राहें आसान न थी, तो भाजपा के लिए उसके अपनों ने ही राहें कठिन कर दी हैं। भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे अखिलेश पाठक ने भाजपा की राह में कांटे बिछाने का काम किया है।
पिछला चुनाव बसपा से लड़ने वाले आसिफ के लिए सपा में आने के बाद भितरघात में साइकिल पंक्चर करने की जुगाड़ में लगे लोगों में बहुत से लोग चुनावी सभाओं के बाद एक ओर लामबंद हो गए।
सीएम योगी समेत भाजपा के स्टार प्रचारकों ने चुनावी सभाएं कर माहौल बनाया, जिसके चलते भाजपा के प्रति लोगों में लामबंदी हुई तो उधर सपा में भितरघात के कयास लगाने के बीच हुई इन सभाओं ने पक्ष को लामबंद कर दिया।
सपा प्रत्याशी ने जातीय समीकरण साधते हुए ब्राह्मणों पर भी फोकस किया। चुनाव लड़ बसपा के एबी सिंह एवं कांग्रेस के डॉ. अजीमुश्शान ने भी जातीय समीकरणों को बनाने-बिगाडने का कार्य किया है। लोगों का मानना है कि मुकाबला सपा और भाजपा के बीच एक पर एक होकर रह गया।
हरदोई सदर विस क्षेत्र
सदर में नरेश के रिश्तों की अग्निपरीक्षा
हरदोई। सदर सीट का चुनाव भाजपा एवं सियासत के महारथी नरेश अग्रवाल दोनों के लिए ही अहम रहा है। सदर सीट पर नरेश के परिवार से कोई पहली बार भाजपा से चुनाव लड़ा है, तो यहां से पूर्व में कभी भाजपा को जीत नसीब नहीं हुई है।
50 साल से नरेश परिवार के रिश्तों का जादू इस सीट पर चलता रहा है। ऐसे में पहली बार भाजपा के लिए अवसर बना है तो नरेश अग्रवाल के लिए रिश्तों की अग्निपरीक्षा भी हुई है।
नरेश के परिवार की रिश्तों की डोर से जुड़े यहां के लोगों की हुई इस चुनावी अग्निपरीक्षा में वोटरों ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में इस सीट पर भाजपा एवं सपा के बीच मुकाबला हुआ है।
भाजपा से चुनाव लड़ रहे नरेश के बेटे पूर्व मंत्री नितिन अग्रवाल एवं सपा प्रत्याशी अनिल वर्मा के बीच जातीय समीकरणों एवं दलगत वोटों के समीकरणों के बीच कड़ा मुकाबला रहा।
मतदान के बाद समाज के हर वर्ग जाति के बीच नरेश और नितिन के नाम चर्चा में रहे। यह अलग बात है कि जातीय समीकरणों के गुणाभाग में सपा प्रत्याशी का नाम तेजी से लिया गया।
लोग मानते हैं कि रिश्तों की डोर से नरेश का जादू यहां कायम रह सकता है। इसी सीट से चुनाव लड़ बसपा प्रत्याशी एवं पूर्व सांसद पुत्र शोभित पाठक सनी ने भी काडर वोट एवं व्यक्तिगत व्यवहार से चुनाव लड़ा, तो कांग्रेस से आशीष सिंह भी चुनाव में लगे रहे।
सांडी विस क्षेत्र-
दो राजनीतिक घरानों के बीच सीधी चुनावी जंग
हरदोई। सांडी सुरक्षित सीट पर भाजपा एवं सपा में सीधा मुकाबला हुआ है, जबकि यहां से बसपा ने चुनावी लड़ाई में आखिरी तक पूरी दमदारी से चुनावी मुकाबले में बने रहने की कोशिश की ह्रै।
सपा प्रत्याशी पूर्व सांसद ऊषा वर्मा पासी समाज के बड़े नेता रहे पूर्व मंत्री स्वर्गीय बाबू परमाईलाल की बहू हैं।
इस लिहाज से सियासत में उनकी गिनती पुराने राजनीतिक घराने के तौर पर होती है, जबकि पासी समाज के ही बड़े नेता रहे स्वर्गीय कुबेर पासी के घराने से ताल्लुख रखने वाले प्रभाष कुमार सिटिंग विधायक के तौर पर भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं।
भाजपा के सीट पर वापसी के आसार के समीकरण जातिगत समीकरणों में उलझते नजर आए, तो सपा प्रत्याशी के लिए भी जातीय समीकरणों पर परिणाम तय नहीं हो पाए।
इन दोनों के बीच कड़े मुकाबले में स्थानीय मुद्दे एवं दलगत मुद्दे भी रहे। इन सबके बीच हरदोई शहर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली का फैक्टर भी चुनाव में असर डाल गया। शहर की सीमाओं के आसपास लगी सांड्री सीट पर सदर सीट का भी असर पड़ता देखा गया है।
हालांकि, यहां व्यक्तिगत फैक्टर भी बड़े अहम कारक माने जाते रहे हैं। बसपा प्रत्याशी कमल वर्मा अपना चुनाव लड़ रहे हैं। इसके बाद भी चुनाव भाजपा एवं सपा के बीच सिमट कर रह गया।
गोपामऊ विस क्षेत्र---
भाजपा, सपा में संघर्ष, बसपा को भी मिला समर्थन
हरदोई। गोपामऊ सुरक्षित विस सीट पर अपने सिटिंग विधायक श्याम प्रकाश के साथ चुनावी मैदान में डटी रही भाजपा का मुकाबला सीधे सपा से हुआ। सपा प्रत्याशी राजेश्वरी देवी पासी समाज के बडे़ नेता रहे पूर्व मंत्री स्व: बाबू परमाई लाल की बहू हैं।
जातीय समीकरणों में सपा की राजेश्वरी और भाजपा के श्याम प्रकाश दोनों ही पासी समाज के आते हैं। दोनों को अपने समाज में दखल होने के साथ इलाके में घर-घर तक लोगों से संपर्क के चलते मुकाबला काफी दिलचस्प रहा।
दरअसल यहां बसपा से चुनाव लड़े सर्वेश जनसेवा ने जातीय समीकरणों में सेंधमारी का प्रयास किया। जनसेवा जाटव समाज से हैं। उन्होंने पार्टी के काडर वोटों के साथ अपने व्यक्तिगत प्रभावों को लेकर चुनाव जोरदारी से लड़ा।
चुनाव में दलगत मुद्दे यहां हावी रहे। सपा मुखिया अखिलेश यादव की शहर में हुई जनसभा ने यहां सपा के पक्ष माहौल बनाया, तो अगले ही दिन शहर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली ने जातीय समीकरणों का खेल बिगाड़ दिया।
भाजपा के लिए माहौल बनाने में प्रधानमंत्री की शहर में हुई रैली ने बड़ा संदेश दिया था। शहर से लगी सीट होने के नाते कहीं न कहंी इस सीट के चुनावी माहौल के रंग शहर से जोड़ कर देखे जाते हैं। जानकारों का कहना है कि तमाम फैक्टरों के बाद भी मुकाबला भाजपा-सपा के बीच रहा है।
बालामऊ विस क्षेत्र---
भाजपा, सपा और बसपा के बीच मुकाबला
हरदोई। बालामऊ सुरक्षित विस सीट पर भाजपा से चुनाव लड़े सिंटिंग विधायक एवं पूर्व मंत्री रामपाल वर्मा को फिर से महाबली बनने से रोकने को सपा के रामबली ने कड़ी टक्कर दी, तो बसपा के तिलक चंद्र भी चुनावी महाबली बनने से पीछे नहीं रहे।
इस सीट पर भाजपा एवं सपा के बीच रहे मुख्य मुकाबले में बसपा भी जोरदारी से लगी रही। ऐसे में चुनाव परिणामों को लेकर फिलहाला मतगणना होने तक कयासबाजी ज्यादा रहेगी।
सियासत के लंबे तजुर्बे एवं क्षेत्र का लंबा अनुभव भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में रहा है। जातीय समीकरणों में कमोवेश तीनों प्रत्याशी पासी समाज से आते है। ऐसे में जातीय वोटों का ध्रुवीकरण तो होगा, मगर बड़ा हिस्सा रामपाल वर्मा की ओर रहने का अनुमान मतदान के बाद से लगाया जा रहा है।
काडर वोट के लिहाज बसपा का पक्ष भी मजबूत रहा, मगर दलगत होते रहने वाले बदलावों से इस बार चुनाव में वोटरों ने कुछ स्थानों पर उलटफेर भी किया है। यही कारण है कि चुनावी मुकाबला महामुकाबले में बदल गया है।
मुख्य मुकाबले में भाजपा एवं सपा के बीच हुए कांटे के संघर्ष में बसपा भी पीछे नहीं रही, जबकि कांग्रेस सहित कुछ अन्य ने यहां पर चुनावी समीकरणों के गणित में सेंधमारी की है।
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यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलवा प्रमुख रूप से केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के सहयोगी दल अपना दल की अनुप्रिया पटेल की चुनावी सभा हुई थी।
वोटों के जातीय ध्रुवीकरण से भाजपा ने यहां प्रचार अभियान काफी तेज रखा था, जबकि सपा ने यहां स्टार प्रचारकों के मसले में कोई खास प्रचार अभियान नहीं चलाया।
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यहां कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी की सभा कराकर सीट को लेकर इरादे जता दिए थे। बसपा ने यहां सपा की तरह स्टार प्रचारकों के प्रचार पर तो बहुत जोर नहीं दिया, लेकिन काडर वोटों एवं जातीय समीकरणों पर ज्यादा ध्यान दिया।
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इन सभी फैक्टरों के बाद कुर्मी बहुल क्षेत्र में बसपा बड़े उलटफेर की संभावना देख रही है। मतदान के रुझानों को लेकर स्पष्ट रूप से कोई कुछ नहीं कह रहा है।
इसके बाद भी बसपा के बड़े उलटफेर की संभावना लोग देख रहे हैं। बसपा से दो बार विधायक रह चुके कुर्मी जाति के सतीश वर्मा पर दांव लगाना भाजपा की राह में सबसे बड़ी मुश्किल माना जा रहा है।
दरअसल बसपा प्रत्याशी सतीश वर्मा की पत्नी अंजूबाला भाजपा से सांसद रह चुकी हैं। ऐसे में कुछ स्थानों पर भाजपा के वोटों में सेंधमारी के भी आसार दिखे हैं, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष पाल यहां से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। पिछड़ी जाति के वोटों में उनकी पकड़ मानी जाती है।
संडीला विस क्षेत्र---
हरदोई। संडीला विस सीट से सिटिंग विधायक का टिकट काटकर नए चेहरे के साथ चुनाव लड़ी भाजपा की राह जातीय समीकरणों ने कठिन कर दी है, जबकि भाजपा ने यहां नए प्रत्याशी के रूप में अलका अर्कवंशी को जातीय समीकरणों के मद्देनजर ही चुनाव लड़ाया, लेकिन यहां सुभासपा एवं सपा के गठबंधन में यहां चुनाव लड़ रहे सुभासपा प्रत्याशी सुनील अर्कवंशी ने जातीय समीकरणों का खेल बिगाड़ दिया।
ऐसे में यहां बसपा से चुनाव लड़ रहे चार बार के विधायक एवं दो बार मंत्री रह चुके अब्दुल मन्नान ने चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है।
इस सीट पर बसपा प्रत्याशी के रूप में सियासत के बड़े चेहरे माने जाने वाले अब्दुल मन्नान जातिगत के अलावा पार्टी के काडर वोटों एवं अन्य फैक्टरों के साथ बड़ी खामोशी से चुनाव के नई पटकथा लि
ख दी। एक-एक गांव और मोहल्ले से कांटे की टक्कर के अंदाजे के बीच यहां के लोगों ने चुनाव परिणाम ईवीएम में लाक करा दिया है।
जानकारों की मानें तो गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले हुई कांटे की टक्कर में कई स्थानों पर हाथी की चिंघाड़ ने छड़ी और कमल के फूल को पस्त किया है, तो कई स्थानों पर छड़ी का जादू चला है।
इसी तरह से कई स्थानों पर कमल का फूल खिला है। ऐसे में इस सीट पर बसपा के अब्दुल मन्नान, भाजपा की अलका अर्कवंशी एवं सुभासपा के सुनील अर्कवंशी के बीच त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष रहा।
सवायजपुर विस क्षेत्र
भाजपा का सीधा मुकाबला सपा से
हरदोई। सवायजपुर सामान्य विधानसभा सीट से सिटिंग विधायक माधवेंद्र प्रताप सिंह रानू के साथ चुनाव मैदान में उतरी भाजपा की राह में कांग्रेस ने कांटे बो दिए हैं, जिससे मुकाबला दिलचस्प मोड़ से निकलकर सीधे-सीधे सपा के साथ में हो गया।
चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। जातिगत समीकरणों में हमेशा कुछ अलग सा निर्णय करने वाले यहां के वोटरों के बीच इस बार नए फैक्टर आ गए। दरअसल क्षेत्र में कांग्रेस के नन्हे भीठा के बाद पहली बार प्रत्याशी का जोर गांव-गांव में देखा गया।
नन्हे भीठा 20 साल पहले चुनाव लड़े थे। उसके बाद से कांग्रेस इस क्षेत्र में हर गांव तक हर बूथ तक चुनावी बस्ते तक नहीं लगवा पाई। इस बार कांग्रेस प्रत्याशी बनकर चुनावी महाभारत में उतरे राजवर्धन सिंह राजू ने सबसे ज्यादा फोकस ब्राह्मणों पर किया।
इसके अलावा वे काफी समय से यहां से तैयारी कर रहे थे और गांव-गांव संपर्क कर किया था। मतदान के दौरान ऐसे गांवों में भी कांग्रेस के लिए वोट सपोर्ट की बातें हुई, जहां पिछले लंबे समय से भाजपा, बसपा, सपा तक ही चर्चाओं में रहती थी।
यहां से सपा प्रत्याशी पदमराग सिंह पम्मू और भाजपा प्रत्याशी के बीच सीधा मुकाबला है, जबकि कांग्रेस के साथ बसपा प्रत्याशी राहुल तिवारी ने भी पकड़ बनाए रखी है।
शाहाबाद विस क्षेत्र
सपा के आसिफ, भाजपा की रजनी के बीच संग्राम
हरदोई। शाहाबाद सामान्य सीट से सिटिंग विधायक रजनी तिवारी के साथ चुनावी मुकाबले उतरी भाजपा की चुनावी नइया को अपनों ने भंवर में पहुंचा दिया, जिसके चलते सपा और भाजपा के बीच मुकाबला एक पर एक होकर रह गया।
सपा से चुनाव लड़ रहे पूर्व विधायक आसिफ अली बब्बू के लिए भी राहें आसान न थी, तो भाजपा के लिए उसके अपनों ने ही राहें कठिन कर दी हैं। भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे अखिलेश पाठक ने भाजपा की राह में कांटे बिछाने का काम किया है।
पिछला चुनाव बसपा से लड़ने वाले आसिफ के लिए सपा में आने के बाद भितरघात में साइकिल पंक्चर करने की जुगाड़ में लगे लोगों में बहुत से लोग चुनावी सभाओं के बाद एक ओर लामबंद हो गए।
सीएम योगी समेत भाजपा के स्टार प्रचारकों ने चुनावी सभाएं कर माहौल बनाया, जिसके चलते भाजपा के प्रति लोगों में लामबंदी हुई तो उधर सपा में भितरघात के कयास लगाने के बीच हुई इन सभाओं ने पक्ष को लामबंद कर दिया।
सपा प्रत्याशी ने जातीय समीकरण साधते हुए ब्राह्मणों पर भी फोकस किया। चुनाव लड़ बसपा के एबी सिंह एवं कांग्रेस के डॉ. अजीमुश्शान ने भी जातीय समीकरणों को बनाने-बिगाडने का कार्य किया है। लोगों का मानना है कि मुकाबला सपा और भाजपा के बीच एक पर एक होकर रह गया।
हरदोई सदर विस क्षेत्र
सदर में नरेश के रिश्तों की अग्निपरीक्षा
हरदोई। सदर सीट का चुनाव भाजपा एवं सियासत के महारथी नरेश अग्रवाल दोनों के लिए ही अहम रहा है। सदर सीट पर नरेश के परिवार से कोई पहली बार भाजपा से चुनाव लड़ा है, तो यहां से पूर्व में कभी भाजपा को जीत नसीब नहीं हुई है।
50 साल से नरेश परिवार के रिश्तों का जादू इस सीट पर चलता रहा है। ऐसे में पहली बार भाजपा के लिए अवसर बना है तो नरेश अग्रवाल के लिए रिश्तों की अग्निपरीक्षा भी हुई है।
नरेश के परिवार की रिश्तों की डोर से जुड़े यहां के लोगों की हुई इस चुनावी अग्निपरीक्षा में वोटरों ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में इस सीट पर भाजपा एवं सपा के बीच मुकाबला हुआ है।
भाजपा से चुनाव लड़ रहे नरेश के बेटे पूर्व मंत्री नितिन अग्रवाल एवं सपा प्रत्याशी अनिल वर्मा के बीच जातीय समीकरणों एवं दलगत वोटों के समीकरणों के बीच कड़ा मुकाबला रहा।
मतदान के बाद समाज के हर वर्ग जाति के बीच नरेश और नितिन के नाम चर्चा में रहे। यह अलग बात है कि जातीय समीकरणों के गुणाभाग में सपा प्रत्याशी का नाम तेजी से लिया गया।
लोग मानते हैं कि रिश्तों की डोर से नरेश का जादू यहां कायम रह सकता है। इसी सीट से चुनाव लड़ बसपा प्रत्याशी एवं पूर्व सांसद पुत्र शोभित पाठक सनी ने भी काडर वोट एवं व्यक्तिगत व्यवहार से चुनाव लड़ा, तो कांग्रेस से आशीष सिंह भी चुनाव में लगे रहे।
सांडी विस क्षेत्र-
दो राजनीतिक घरानों के बीच सीधी चुनावी जंग
हरदोई। सांडी सुरक्षित सीट पर भाजपा एवं सपा में सीधा मुकाबला हुआ है, जबकि यहां से बसपा ने चुनावी लड़ाई में आखिरी तक पूरी दमदारी से चुनावी मुकाबले में बने रहने की कोशिश की ह्रै।
सपा प्रत्याशी पूर्व सांसद ऊषा वर्मा पासी समाज के बड़े नेता रहे पूर्व मंत्री स्वर्गीय बाबू परमाईलाल की बहू हैं।
इस लिहाज से सियासत में उनकी गिनती पुराने राजनीतिक घराने के तौर पर होती है, जबकि पासी समाज के ही बड़े नेता रहे स्वर्गीय कुबेर पासी के घराने से ताल्लुख रखने वाले प्रभाष कुमार सिटिंग विधायक के तौर पर भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं।
भाजपा के सीट पर वापसी के आसार के समीकरण जातिगत समीकरणों में उलझते नजर आए, तो सपा प्रत्याशी के लिए भी जातीय समीकरणों पर परिणाम तय नहीं हो पाए।
इन दोनों के बीच कड़े मुकाबले में स्थानीय मुद्दे एवं दलगत मुद्दे भी रहे। इन सबके बीच हरदोई शहर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली का फैक्टर भी चुनाव में असर डाल गया। शहर की सीमाओं के आसपास लगी सांड्री सीट पर सदर सीट का भी असर पड़ता देखा गया है।
हालांकि, यहां व्यक्तिगत फैक्टर भी बड़े अहम कारक माने जाते रहे हैं। बसपा प्रत्याशी कमल वर्मा अपना चुनाव लड़ रहे हैं। इसके बाद भी चुनाव भाजपा एवं सपा के बीच सिमट कर रह गया।
गोपामऊ विस क्षेत्र---
भाजपा, सपा में संघर्ष, बसपा को भी मिला समर्थन
हरदोई। गोपामऊ सुरक्षित विस सीट पर अपने सिटिंग विधायक श्याम प्रकाश के साथ चुनावी मैदान में डटी रही भाजपा का मुकाबला सीधे सपा से हुआ। सपा प्रत्याशी राजेश्वरी देवी पासी समाज के बडे़ नेता रहे पूर्व मंत्री स्व: बाबू परमाई लाल की बहू हैं।
जातीय समीकरणों में सपा की राजेश्वरी और भाजपा के श्याम प्रकाश दोनों ही पासी समाज के आते हैं। दोनों को अपने समाज में दखल होने के साथ इलाके में घर-घर तक लोगों से संपर्क के चलते मुकाबला काफी दिलचस्प रहा।
दरअसल यहां बसपा से चुनाव लड़े सर्वेश जनसेवा ने जातीय समीकरणों में सेंधमारी का प्रयास किया। जनसेवा जाटव समाज से हैं। उन्होंने पार्टी के काडर वोटों के साथ अपने व्यक्तिगत प्रभावों को लेकर चुनाव जोरदारी से लड़ा।
चुनाव में दलगत मुद्दे यहां हावी रहे। सपा मुखिया अखिलेश यादव की शहर में हुई जनसभा ने यहां सपा के पक्ष माहौल बनाया, तो अगले ही दिन शहर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली ने जातीय समीकरणों का खेल बिगाड़ दिया।
भाजपा के लिए माहौल बनाने में प्रधानमंत्री की शहर में हुई रैली ने बड़ा संदेश दिया था। शहर से लगी सीट होने के नाते कहीं न कहंी इस सीट के चुनावी माहौल के रंग शहर से जोड़ कर देखे जाते हैं। जानकारों का कहना है कि तमाम फैक्टरों के बाद भी मुकाबला भाजपा-सपा के बीच रहा है।
बालामऊ विस क्षेत्र---
भाजपा, सपा और बसपा के बीच मुकाबला
हरदोई। बालामऊ सुरक्षित विस सीट पर भाजपा से चुनाव लड़े सिंटिंग विधायक एवं पूर्व मंत्री रामपाल वर्मा को फिर से महाबली बनने से रोकने को सपा के रामबली ने कड़ी टक्कर दी, तो बसपा के तिलक चंद्र भी चुनावी महाबली बनने से पीछे नहीं रहे।
इस सीट पर भाजपा एवं सपा के बीच रहे मुख्य मुकाबले में बसपा भी जोरदारी से लगी रही। ऐसे में चुनाव परिणामों को लेकर फिलहाला मतगणना होने तक कयासबाजी ज्यादा रहेगी।
सियासत के लंबे तजुर्बे एवं क्षेत्र का लंबा अनुभव भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में रहा है। जातीय समीकरणों में कमोवेश तीनों प्रत्याशी पासी समाज से आते है। ऐसे में जातीय वोटों का ध्रुवीकरण तो होगा, मगर बड़ा हिस्सा रामपाल वर्मा की ओर रहने का अनुमान मतदान के बाद से लगाया जा रहा है।
काडर वोट के लिहाज बसपा का पक्ष भी मजबूत रहा, मगर दलगत होते रहने वाले बदलावों से इस बार चुनाव में वोटरों ने कुछ स्थानों पर उलटफेर भी किया है। यही कारण है कि चुनावी मुकाबला महामुकाबले में बदल गया है।
मुख्य मुकाबले में भाजपा एवं सपा के बीच हुए कांटे के संघर्ष में बसपा भी पीछे नहीं रही, जबकि कांग्रेस सहित कुछ अन्य ने यहां पर चुनावी समीकरणों के गणित में सेंधमारी की है।