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व्यवस्था तंग, हार रहे रोगी जिंदगी की जंग
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Tue, 24 Mar 2015 12:42 AM IST
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टीबी एक खतरनाक रोग तो है, पर जान लेवा नहीं है।
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डाट्स के माध्यम से नियमित इलाज करवाकर रोगी पूर्णतया स्वस्थ हो सकता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में संदिग्ध क्षयरोगियों की संख्या 23 हजार
के पार हो चुकी है तो उनके पॉजीटिव पाए गए रोगी लगभग चार हजार बताए गए
हैं।
क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के जिम्मेदारों का खुद ही कहना है कि टीबी लाइलाज नहीं, पर एमडीआर की श्रेणी में आने के बाद 50 फीसदी रोगी दम तोड़ जाते हैं। इसके बाद यह कहना कठिन नहीं होगा कि टीबी हमारे समाज के लिए कितनी घातक है और नियंत्रण की हदें क्या हैं।
इस बाबत जिला क्षय रोग अधिकारी डा. आरपी रावत वर्तमान में क्षय रोग की बीमारी का उपचार संभव है। डाट्स पद्धति से निर्धारित समय तक इलाज कराकर इस बीमारी से निजात पाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय से खासी आ रही हो तो वह उसे गंभीरता से ले और पास के सरकारी या जिला अस्पताल में आकर अपनी जांच कराए और यदि जांच में टीबी मिले, तो उसका पूरा इलाज कराए।
उन्होंने उपस्थित समाजसेवियों और अन्य लोगों से कहा कि लोगों को जागरूक किया जाए कि टीबी की बीमारी को छिपाए नहीं इसका डाट्स पद्धति द्वारा नि:शुल्क किया जा रहा है। रात को बुखार, वजन घटना, भूख न लगना, छाती में दर्द, टीबी हो सकती है।
इसके लिए अपने पास के किसी भी सरकारी अस्पताल में नि:शुल्क बलगम जांच के बाद डाट्स पद्धति से नि:शुल्क उपचार का लाभ उठा सकते है। यह सुविधा जिले के समस्त सीएचसी, पीएचसी और नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर नि:शुल्क मुहैया है। जिले में वर्तमान समय में सात हजार के करीब रोगियों का नियमित इलाज चल रहा है।
डाट्स पद्धति से इलाज के दौरान मरीजों को छह माह की दवा दी जाती है। अगर उसको लाभ नहीं े होता है तो उसको आठ माह के लिए दवा दी जाती है। दवा वितरित करने के लिए गांव में डाट्स प्रोवाइडर नियुक्त है। उनका भी कहना है कि किसी कारण यदि रोगी दवाएं लेना छोड़ देते हैं।
उदाहरण के तौर पर यदि रोगी चार में से दो दवाएं लेना बंद कर देता है, तो इससे रोगी को एमडीआर टीबी हो जाती है। 50 फीसदी एमडीआर मरीज दम तोड़ जाते हैं। इससे इलाज 12 माह से बढ़कर 27 माह का हो जाता है।
क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के जिम्मेदारों का खुद ही कहना है कि टीबी लाइलाज नहीं, पर एमडीआर की श्रेणी में आने के बाद 50 फीसदी रोगी दम तोड़ जाते हैं। इसके बाद यह कहना कठिन नहीं होगा कि टीबी हमारे समाज के लिए कितनी घातक है और नियंत्रण की हदें क्या हैं।
इस बाबत जिला क्षय रोग अधिकारी डा. आरपी रावत वर्तमान में क्षय रोग की बीमारी का उपचार संभव है। डाट्स पद्धति से निर्धारित समय तक इलाज कराकर इस बीमारी से निजात पाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय से खासी आ रही हो तो वह उसे गंभीरता से ले और पास के सरकारी या जिला अस्पताल में आकर अपनी जांच कराए और यदि जांच में टीबी मिले, तो उसका पूरा इलाज कराए।
उन्होंने उपस्थित समाजसेवियों और अन्य लोगों से कहा कि लोगों को जागरूक किया जाए कि टीबी की बीमारी को छिपाए नहीं इसका डाट्स पद्धति द्वारा नि:शुल्क किया जा रहा है। रात को बुखार, वजन घटना, भूख न लगना, छाती में दर्द, टीबी हो सकती है।
इसके लिए अपने पास के किसी भी सरकारी अस्पताल में नि:शुल्क बलगम जांच के बाद डाट्स पद्धति से नि:शुल्क उपचार का लाभ उठा सकते है। यह सुविधा जिले के समस्त सीएचसी, पीएचसी और नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर नि:शुल्क मुहैया है। जिले में वर्तमान समय में सात हजार के करीब रोगियों का नियमित इलाज चल रहा है।
डाट्स पद्धति से इलाज के दौरान मरीजों को छह माह की दवा दी जाती है। अगर उसको लाभ नहीं े होता है तो उसको आठ माह के लिए दवा दी जाती है। दवा वितरित करने के लिए गांव में डाट्स प्रोवाइडर नियुक्त है। उनका भी कहना है कि किसी कारण यदि रोगी दवाएं लेना छोड़ देते हैं।
उदाहरण के तौर पर यदि रोगी चार में से दो दवाएं लेना बंद कर देता है, तो इससे रोगी को एमडीआर टीबी हो जाती है। 50 फीसदी एमडीआर मरीज दम तोड़ जाते हैं। इससे इलाज 12 माह से बढ़कर 27 माह का हो जाता है।