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Hardoi News: गृहस्थ रहकर तप व त्याग कर समाज की कर रहीं सेवा
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संवाद न्यूज एजेंसी
हरदोई। सुधा विद्यावाचस्पति नाम व पहचान का मोहताज नहीं है। शहर के मोहल्ला अशराफ टोला में उनका घर वेद सुधा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वह गृहस्थ रहकर भी तप व त्याग कर समाज की सेवा कर रहीं हैं।
वैसे तो सुधा विद्यावाचस्पति की पहचान शिक्षिका के रूप में थी, उन्होंने अपने समाज सेवा के कामों से एक अलग ही पहचान बना ली है। उनके घर पर वेद सुधा मंदिर में शादी के साथ ही अन्य वैदिक संस्कार निशुल्क कराए जाते हैं। उन्होंने बताया कि वैदिक संस्कार व समाजसेवा की आदत परिवार में पिता व अन्य के कार्यों से बचपन से ही आ गई थी। वह आर्यकन्या इंटर कॉलेज में संस्कृत की शिक्षिका रहीं।
उन्होंने छात्राओं में संस्कृत के साथ संस्कृति व संस्कार को बढ़ावा देने काम किया जो सेवानिवृति के बाद भी जारी है। अभी भी वह विद्यालय जातीं हैं और वहां पर छात्राओं को संस्कृति व संस्कार का पाठ पढ़ाने के साथ ही हवन-यज्ञ करातीं हैं।
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बताया कि बात साल 1971 की है, जब वह उन्नाव से बीएड कर रही थीं। घर से नाश्ता व खाने के लिए मिलने वाले रुपयों में से बचत कर समाज के असहाय लोगों को भोजन कराना व वस्त्र वितरण करतीं थीं। रेल विभाग के अधिकारी आरबी सक्सेना से शादी के बाद लगा था कि शायद समाजसेवा, संस्कृति को बढ़ावा देने पर विराम लग जाएगा।
जब पति को यह बात बताई तो उनकी सहमति मिल गई। पति ने समाजसेवा व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सहमति ही नहीं दी बल्कि, वेद मंदिर का निर्माण भी कराया। अब यहीं पर प्रतिदिन दोनों वक्त यज्ञ-हवन होता है।
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साहित्य प्रचार पर रहता जोर
सुधा विद्यावाचस्पति ने बताया कि किसी भी क्षेत्र में विजय पाने के लिए हमें लक्ष्य के साथ उसके प्रचार-प्रसार पर भी ध्यान देना चाहिए। समाज में संस्कृति, संस्कार को बढ़ावा देने, आज की पीढ़ी को वेद, गीता व रामायण के ज्ञान की जानकारी कराने के लिए साहित्य वितरण भी आवश्यक है। बताया कि साहित्य वितरण के साथ ही नियमित पढ़ने का संकल्प भी लिया जाता है।
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हरदोई। सुधा विद्यावाचस्पति नाम व पहचान का मोहताज नहीं है। शहर के मोहल्ला अशराफ टोला में उनका घर वेद सुधा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वह गृहस्थ रहकर भी तप व त्याग कर समाज की सेवा कर रहीं हैं।
वैसे तो सुधा विद्यावाचस्पति की पहचान शिक्षिका के रूप में थी, उन्होंने अपने समाज सेवा के कामों से एक अलग ही पहचान बना ली है। उनके घर पर वेद सुधा मंदिर में शादी के साथ ही अन्य वैदिक संस्कार निशुल्क कराए जाते हैं। उन्होंने बताया कि वैदिक संस्कार व समाजसेवा की आदत परिवार में पिता व अन्य के कार्यों से बचपन से ही आ गई थी। वह आर्यकन्या इंटर कॉलेज में संस्कृत की शिक्षिका रहीं।
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उन्होंने छात्राओं में संस्कृत के साथ संस्कृति व संस्कार को बढ़ावा देने काम किया जो सेवानिवृति के बाद भी जारी है। अभी भी वह विद्यालय जातीं हैं और वहां पर छात्राओं को संस्कृति व संस्कार का पाठ पढ़ाने के साथ ही हवन-यज्ञ करातीं हैं।
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बताया कि बात साल 1971 की है, जब वह उन्नाव से बीएड कर रही थीं। घर से नाश्ता व खाने के लिए मिलने वाले रुपयों में से बचत कर समाज के असहाय लोगों को भोजन कराना व वस्त्र वितरण करतीं थीं। रेल विभाग के अधिकारी आरबी सक्सेना से शादी के बाद लगा था कि शायद समाजसेवा, संस्कृति को बढ़ावा देने पर विराम लग जाएगा।
जब पति को यह बात बताई तो उनकी सहमति मिल गई। पति ने समाजसेवा व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सहमति ही नहीं दी बल्कि, वेद मंदिर का निर्माण भी कराया। अब यहीं पर प्रतिदिन दोनों वक्त यज्ञ-हवन होता है।
साहित्य प्रचार पर रहता जोर
सुधा विद्यावाचस्पति ने बताया कि किसी भी क्षेत्र में विजय पाने के लिए हमें लक्ष्य के साथ उसके प्रचार-प्रसार पर भी ध्यान देना चाहिए। समाज में संस्कृति, संस्कार को बढ़ावा देने, आज की पीढ़ी को वेद, गीता व रामायण के ज्ञान की जानकारी कराने के लिए साहित्य वितरण भी आवश्यक है। बताया कि साहित्य वितरण के साथ ही नियमित पढ़ने का संकल्प भी लिया जाता है।