{"_id":"620a9521a8a9b97a6e1a9ca0","slug":"one-character-changed-yet-triangular-contest-hardoi-news-knp6806409176","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक किरदार बदला फिर भी त्रिकोणीय मुकाबला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
एक किरदार बदला फिर भी त्रिकोणीय मुकाबला
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरदोई। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद शाहाबाद क्षेत्र के जातीय समीकरण की तस्वीर अबकी नया मोड़ ले चुकी है। मुकाबला इस बार भी त्रिकोणीय है, लेकिन एक किरदार के बदल जाने से पूरा खेल बदल हुआ है।
यहां के सियासी महाभारत में पूर्व विधायक बाबू खां का हथियार डालना और भाजपा के उपाध्यक्ष अखिलेश पाठक का अपनी ही सेना के विरोध में गांडीव उठा लेना नए जातीय समीकरण तय कर रहा है।
खास बात यह है कि इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम और ब्राह्मण वोट लगभग बराबर हैं। ऐसे में त्रिकोणीय मुकाबले में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो चेहरों के आमने-सामने होने से मुस्लिम वर्ग के प्रतिनिधि को इसका लाभ मिलने की संभावना है।
विज्ञापन
इस सीट पर इस बार अखिलेश पाठक ही भाजपा के लिए चुनौती हैं। वे ब्राह्मण वोटरों के बीच अच्छी पैठ रखते हैं। 2012 में भाजपा से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
ऐसे में भाजपा ब्राह्मण वोटरों को साधने के साथ ही गैर जाटव दलित व अति पिछड़ा वोटों के गठजोड़ से जीत की राह तलाश रही है। यहां विधानसभा चुनावों में ज्यादातर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला है।
हालांकि, पिछले चुनाव में रजनी तिवारी और आसिफ खां के बीच मुकाबला हुआ था। 1962 में अस्तित्व में आई शाहाबाद सीट से पहली बार जनसंघ के प्यारेलाल ने 50.93 फीसदी वोट हासिल कर कांग्रेस की विद्यावती को 9759 वोट से करारी शिकस्त दी थी।
1967 में कांग्रेस के हरिहरबक्श सिंह ने 20,664 वोट हासिल कर प्यारेलाल को 2,456 वोट के अंतर से हराकर जीत का स्वाद चखा था। 1969 में हरिहरबक्श सिंह और प्यारेलाल के बीच कांटे की टक्कर हुई, जिसमें हरिहरबक्श सिंह ने 421 वोट से जीत दर्ज की।
1974 में जनसंघ के धधीच सिंह ने हरिहरबक्श सिंह को 837 वोट से हराया था। 1977 में निर्दलीय बृजबल्लभ सिंह ने कांग्रेस के रामऔतार दीक्षित को 276 वोट से हराया था।
1980 में कांग्रेस ने कब्जाई थी सीट
1980 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े बृज बल्लभ सिंह को कांग्रेस के रामऔतार दीक्षित ने 12,766 वोट के हराया। 1985 में रामऔतार दीक्षित ने जनता पार्टी के बाबू खां को 1,114 वोट से हराया।
1989 में रामऔतार दीक्षित ने 47,961 वोट हासिल कर जनता दल से मैदान में उतरे बाबू खां को 13,691 वोट के हराकर जीत की हैट्रिक लगाई। 1991 में निर्दलीय बाबू खां ने 3,448 वोट से जीत हासिल की।
भाजपा के गंगा सिंह चौहान को हार का मुंह देखना पड़ा। राजनीतिक पंडितों की माने तो इस चुनाव में कम वोट प्रतिशत भी भाजपा की हार का कारण रहा था। इस चुनाव में शाहाबाद में 49.30 फीसदी ही मतदान हुआ था, जो पिछले विस चुनाव के मुकाबले 7.74 फीसदी कम था।
1991 में 5.83 फीसदी वोट रिजेक्ट भी हुए थे। इस चुनाव में चार प्रत्याशियों के बीच हुए कड़े संघर्ष को भी भाजपा की हार का बड़ा कारण माना जाता है।
इसमें बाबू खां को 22,894, भाजपा के गंगा सिंह चौहान को 19,446, कांग्रेस के रामऔतार दीक्षित को 17,074 और बसपा के श्यामसुंदर को 14418 मत मिले थे।
1993 में सपा ने भाजपा को हरा जीती थी सीट
1993 में सपा के झंडे तले मैदान में उतरे बाबू खां ने भाजपा के गंगाभक्त सिंह को 12,655 वोट से करारी शिकस्त दी थी। 1996 में बाबू खां और गंगाभक्त सिंह के बीच कांटे की टक्कर हुई।
बाबू खां ने 45,706 वोट हासिल कर गंगाभक्त को 219 वोट से हराकर जीत की हैट्रिक लगाई। 2002 में गंगाभक्त सिंह ने बाबू खां को 6,350 वोट से हराकर भाजपा को पहली जीत दिलाई।
2007 में बसपा के आसिफ खां ने बाबू खां को 4,006 वोट के अंतर से हराया। 2012 में बाबू खां ने 89,947 वोट हासिल कर आसिफ खां को 11,134 वोट से हराया था।
इस चुनाव में भाजपा के अखिलेश पाठक 12,993 वोट हासिल कर तीसरे व कांग्रेस की रामदुलारी 11,370 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहीं। 2017 में भाजपा की रजनी तिवारी अखाड़ा बदल सवायजपुर से शाहाबाद आ गईं।
उन्होंने 99,624 वोट हासिल कर बसपा के आसिफ खां को 4260 वोटों से हराया। सपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। सपा से बाबू खां की विरासत संभालने उतरे उनके पुत्र सरताज खां को 7.26 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा।
वोटरों ने सबको दिया मौका, कांग्रेस ने लगाया चौका
शाहाबाद की जनता ने सभी प्रमुख दलों के प्रत्याशियों को समर्थन देकर माननीय बनाया, जिसमें सबसे ज्यादा चार बार जीत दर्ज कर कांग्रेस ने जीत का चौका लगाया है।
कांग्रेस के टूटने पर बनी कांग्रेस (आई) को एक बार, जनसंघ व भाजपा कोे दो-दो बार, सपा को तीन बार, निर्दलीय को दो बार व बसपा को एक बार जीत हासिल हुई है।
कई बार हुए त्रिकोणीय मुकाबले
विस चुनाव में यहां कई बार त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिले हैं। 1991 के चुनाव में चार प्रत्याशियों के बीच कड़े संघर्ष के बाद यहां कई बार त्रिकोणीय मुकाबले में प्रत्याशियों के बीच उठापटक देखने को मिली है।
1993 में बाबू खां, गंगाभक्त सिंह व रामऔतार दीक्षित के बीच मुकाबला हुआ था। 1996 में दोबारा तीनों प्रत्याशियों के बीच दिलचस्प चुनाव हुआ था, जिसमें बाबू खां ने 45,706, गंगाभक्त सिंह ने 45,487 व रामऔतार दीक्षित ने 42,152 वोट हासिल किए थे।
2002 में हुए त्रिकोणीय मुकाबले में गंगाभक्त सिंह को 41,602, बाबू खां को 35,252 और आसिफ खां को 32,469 वोट मिले थे।
ये प्रत्याशी हैं मैदान में
भाजपा से रजनी तिवारी, सपा से आसिफ अली बब्बू, बसपा से एबी सिंह, कांग्रेस से डॉ. अजीमुश्शान, निर्दलीय में अखिलेश पाठक, आप से कमल शुक्ला हैं। इसके अलावा छह अन्य भी निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं।
विस क्षेत्र के जातीय आंकड़े
कुल मतदाता-3,46,500, ब्राह्मण-57,500, मुस्लिम-57,000, ठाकुर-30,000, लोधी-30,000, जाटव-30,000, पासी-22,000, कुशवाहा/शाक्य/मौर्य/सैनी-20,000
यादव-17,000, निशाद/कश्यप/केवट-15,000, वैश्य-12000, तेली मतदाता-12,000, धोबी-10,500 और अन्य मतदाता-33,500
विज्ञापन
यहां के सियासी महाभारत में पूर्व विधायक बाबू खां का हथियार डालना और भाजपा के उपाध्यक्ष अखिलेश पाठक का अपनी ही सेना के विरोध में गांडीव उठा लेना नए जातीय समीकरण तय कर रहा है।
विज्ञापन
खास बात यह है कि इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम और ब्राह्मण वोट लगभग बराबर हैं। ऐसे में त्रिकोणीय मुकाबले में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो चेहरों के आमने-सामने होने से मुस्लिम वर्ग के प्रतिनिधि को इसका लाभ मिलने की संभावना है।
विज्ञापन
इस सीट पर इस बार अखिलेश पाठक ही भाजपा के लिए चुनौती हैं। वे ब्राह्मण वोटरों के बीच अच्छी पैठ रखते हैं। 2012 में भाजपा से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
ऐसे में भाजपा ब्राह्मण वोटरों को साधने के साथ ही गैर जाटव दलित व अति पिछड़ा वोटों के गठजोड़ से जीत की राह तलाश रही है। यहां विधानसभा चुनावों में ज्यादातर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला है।
हालांकि, पिछले चुनाव में रजनी तिवारी और आसिफ खां के बीच मुकाबला हुआ था। 1962 में अस्तित्व में आई शाहाबाद सीट से पहली बार जनसंघ के प्यारेलाल ने 50.93 फीसदी वोट हासिल कर कांग्रेस की विद्यावती को 9759 वोट से करारी शिकस्त दी थी।
1967 में कांग्रेस के हरिहरबक्श सिंह ने 20,664 वोट हासिल कर प्यारेलाल को 2,456 वोट के अंतर से हराकर जीत का स्वाद चखा था। 1969 में हरिहरबक्श सिंह और प्यारेलाल के बीच कांटे की टक्कर हुई, जिसमें हरिहरबक्श सिंह ने 421 वोट से जीत दर्ज की।
1974 में जनसंघ के धधीच सिंह ने हरिहरबक्श सिंह को 837 वोट से हराया था। 1977 में निर्दलीय बृजबल्लभ सिंह ने कांग्रेस के रामऔतार दीक्षित को 276 वोट से हराया था।
1980 में कांग्रेस ने कब्जाई थी सीट
1980 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े बृज बल्लभ सिंह को कांग्रेस के रामऔतार दीक्षित ने 12,766 वोट के हराया। 1985 में रामऔतार दीक्षित ने जनता पार्टी के बाबू खां को 1,114 वोट से हराया।
1989 में रामऔतार दीक्षित ने 47,961 वोट हासिल कर जनता दल से मैदान में उतरे बाबू खां को 13,691 वोट के हराकर जीत की हैट्रिक लगाई। 1991 में निर्दलीय बाबू खां ने 3,448 वोट से जीत हासिल की।
भाजपा के गंगा सिंह चौहान को हार का मुंह देखना पड़ा। राजनीतिक पंडितों की माने तो इस चुनाव में कम वोट प्रतिशत भी भाजपा की हार का कारण रहा था। इस चुनाव में शाहाबाद में 49.30 फीसदी ही मतदान हुआ था, जो पिछले विस चुनाव के मुकाबले 7.74 फीसदी कम था।
1991 में 5.83 फीसदी वोट रिजेक्ट भी हुए थे। इस चुनाव में चार प्रत्याशियों के बीच हुए कड़े संघर्ष को भी भाजपा की हार का बड़ा कारण माना जाता है।
इसमें बाबू खां को 22,894, भाजपा के गंगा सिंह चौहान को 19,446, कांग्रेस के रामऔतार दीक्षित को 17,074 और बसपा के श्यामसुंदर को 14418 मत मिले थे।
1993 में सपा ने भाजपा को हरा जीती थी सीट
1993 में सपा के झंडे तले मैदान में उतरे बाबू खां ने भाजपा के गंगाभक्त सिंह को 12,655 वोट से करारी शिकस्त दी थी। 1996 में बाबू खां और गंगाभक्त सिंह के बीच कांटे की टक्कर हुई।
बाबू खां ने 45,706 वोट हासिल कर गंगाभक्त को 219 वोट से हराकर जीत की हैट्रिक लगाई। 2002 में गंगाभक्त सिंह ने बाबू खां को 6,350 वोट से हराकर भाजपा को पहली जीत दिलाई।
2007 में बसपा के आसिफ खां ने बाबू खां को 4,006 वोट के अंतर से हराया। 2012 में बाबू खां ने 89,947 वोट हासिल कर आसिफ खां को 11,134 वोट से हराया था।
इस चुनाव में भाजपा के अखिलेश पाठक 12,993 वोट हासिल कर तीसरे व कांग्रेस की रामदुलारी 11,370 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहीं। 2017 में भाजपा की रजनी तिवारी अखाड़ा बदल सवायजपुर से शाहाबाद आ गईं।
उन्होंने 99,624 वोट हासिल कर बसपा के आसिफ खां को 4260 वोटों से हराया। सपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। सपा से बाबू खां की विरासत संभालने उतरे उनके पुत्र सरताज खां को 7.26 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा।
वोटरों ने सबको दिया मौका, कांग्रेस ने लगाया चौका
शाहाबाद की जनता ने सभी प्रमुख दलों के प्रत्याशियों को समर्थन देकर माननीय बनाया, जिसमें सबसे ज्यादा चार बार जीत दर्ज कर कांग्रेस ने जीत का चौका लगाया है।
कांग्रेस के टूटने पर बनी कांग्रेस (आई) को एक बार, जनसंघ व भाजपा कोे दो-दो बार, सपा को तीन बार, निर्दलीय को दो बार व बसपा को एक बार जीत हासिल हुई है।
कई बार हुए त्रिकोणीय मुकाबले
विस चुनाव में यहां कई बार त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिले हैं। 1991 के चुनाव में चार प्रत्याशियों के बीच कड़े संघर्ष के बाद यहां कई बार त्रिकोणीय मुकाबले में प्रत्याशियों के बीच उठापटक देखने को मिली है।
1993 में बाबू खां, गंगाभक्त सिंह व रामऔतार दीक्षित के बीच मुकाबला हुआ था। 1996 में दोबारा तीनों प्रत्याशियों के बीच दिलचस्प चुनाव हुआ था, जिसमें बाबू खां ने 45,706, गंगाभक्त सिंह ने 45,487 व रामऔतार दीक्षित ने 42,152 वोट हासिल किए थे।
2002 में हुए त्रिकोणीय मुकाबले में गंगाभक्त सिंह को 41,602, बाबू खां को 35,252 और आसिफ खां को 32,469 वोट मिले थे।
ये प्रत्याशी हैं मैदान में
भाजपा से रजनी तिवारी, सपा से आसिफ अली बब्बू, बसपा से एबी सिंह, कांग्रेस से डॉ. अजीमुश्शान, निर्दलीय में अखिलेश पाठक, आप से कमल शुक्ला हैं। इसके अलावा छह अन्य भी निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं।
विस क्षेत्र के जातीय आंकड़े
कुल मतदाता-3,46,500, ब्राह्मण-57,500, मुस्लिम-57,000, ठाकुर-30,000, लोधी-30,000, जाटव-30,000, पासी-22,000, कुशवाहा/शाक्य/मौर्य/सैनी-20,000
यादव-17,000, निशाद/कश्यप/केवट-15,000, वैश्य-12000, तेली मतदाता-12,000, धोबी-10,500 और अन्य मतदाता-33,500