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इस बार मौसम से लखपेड़ा मेला मंदा
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सांडी। कस्बे के लखपेड़ा में दो साल बाद लगे प्रसिद्ध पशु मेले में मवेशियों की संख्या न के बराबर है। ऊपर से मौसम भी खराब है। खरीद मंदी होने से तमाम राज्यों से आए कारोबारियों में मायूसी है।
कस्बा के सांडी तिराहा स्थित प्रसिद्ध लखपेड़ा और आदमपुर के ब्रह्मावर्त में हर साल में 15 दिन पशु मेला लगता है। जिसमें करीब 10 हजार मवेशी क्रय-विक्रय के लिए लाए जाते थे। दो साल से कोरोना के चलते मेला नहीं लग सका है। इस बार प्रबंधक भयन्नू ने 17 जनवरी से मेले की शुरुआत की। जो इस बार सिर्फ लखपेड़ा में हो रहा है लेकिन मेला शुरू होने के बाद से मौसम खराब है। पहले सर्दी फिर बारिश से यहां मवेशी लेकर आए व्यापारियों को मायूस होना पड़ रहा है। इस बार मवेशियों की तादात भी बेहद कम है। अभी तक करीब तीन सौ घोड़े, खच्चर और टट्टू व करीब दौ सौ भैंस ही बिक्री के लिए आई हैं।
कस्बा के लोगों का कहना है कि जब अधिक संख्या में यहां मवेशी आते थे तो क्षेत्रीय लोगों को रोजगार भी मिल जाता था। बताया इस बार भी महाराष्ट्र, राजस्थान, मुरादाबाद, संभल, अलीगढ़, मथुरा से व्यापारी आए हैं। मवेशी व्यापारी विन्नानी, चुनमुन, राजवीर, नन्हूमल का कहना है कि मौसम सही हो तो मवेशियों के क्रय विक्रय की संख्या बढ़ेेगी।
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कस्बा के सांडी तिराहा स्थित प्रसिद्ध लखपेड़ा और आदमपुर के ब्रह्मावर्त में हर साल में 15 दिन पशु मेला लगता है। जिसमें करीब 10 हजार मवेशी क्रय-विक्रय के लिए लाए जाते थे। दो साल से कोरोना के चलते मेला नहीं लग सका है। इस बार प्रबंधक भयन्नू ने 17 जनवरी से मेले की शुरुआत की। जो इस बार सिर्फ लखपेड़ा में हो रहा है लेकिन मेला शुरू होने के बाद से मौसम खराब है। पहले सर्दी फिर बारिश से यहां मवेशी लेकर आए व्यापारियों को मायूस होना पड़ रहा है। इस बार मवेशियों की तादात भी बेहद कम है। अभी तक करीब तीन सौ घोड़े, खच्चर और टट्टू व करीब दौ सौ भैंस ही बिक्री के लिए आई हैं।
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कस्बा के लोगों का कहना है कि जब अधिक संख्या में यहां मवेशी आते थे तो क्षेत्रीय लोगों को रोजगार भी मिल जाता था। बताया इस बार भी महाराष्ट्र, राजस्थान, मुरादाबाद, संभल, अलीगढ़, मथुरा से व्यापारी आए हैं। मवेशी व्यापारी विन्नानी, चुनमुन, राजवीर, नन्हूमल का कहना है कि मौसम सही हो तो मवेशियों के क्रय विक्रय की संख्या बढ़ेेगी।
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