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शत्रु का हलवा-पूड़ी भी विष जैसा लगता : संतोष
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बेहटागोकुल। ग्राम मानपुर में सोमवार को आचार्य संतोष भाई के मुखार बिंदु से श्रोताओं ने कथा का रसपान किया। उन्होंने श्रीकृष्ण का प्रसंग सुनाया। बताया कि श्रीकृष्ण हस्तिनापुर द्वारिकाधीश की हैसियत से नहीं, पांडवों के दूत बन कर पहुंचे। जहां दुर्योधन ने उनका अपमान कर दिया।
दुर्योधन ने कहा कि भीख मांगने से राज्य नहीं मिलता। वह सुई की नोक जितनी भूमि भी पांडवों को नहीं देगा और वह युद्ध के लिए तैयार है।
धृतराष्ट्र ने प्रभु को भाइयों के झगड़े से दूर रहकर भोजन ग्रहण करने के लिए कहा, लेकिन श्रीकृष्ण ने यह सोच कर कि पापियों के घर का अन्न खाने से उनकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाएगी, भोजन करने से इनकार कर दिया।
द्रोणाचार्य सहित अनेक राजाओं ने भगवान से अपने घर चलने को कहा, परंतु प्रभु ने यह कहकर कि उनका एक प्रिय भक्त गंगा किनारे उनका इंतजार कर रहा है, सभी को मना कर दिया।
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सुलभा भी भगवान की प्रतीक्षा कर रही हैं। प्रेम के वशीभूत हो श्रीकृष्ण का विदुर के घर पहुंचे तो विदुर-सुलभा भगवान के नाम का कीर्तन कर रहे थे। कहा कि प्रभु को प्रतीक्षा करते दो घंटे बीत गए, लेकिन यह कीर्तन तो पूर्ण होने में ही न आता था।
व्याकुल होकर कन्हैया ने द्वार खटखटाया। खुशी में विदुर सुलभा आसन भी न दे सके तो प्रभु ने स्वयं अपने हाथों से आसन बिछाया व उन्हें भी पास में बिठा लिया। भगवान ने कहा, चाचाजी मैं भूखा हूं, पति पत्नी को संकोच हुआ कि प्रभु को भाजी कैसे खिलाएं।
इतने में द्वारिकानाथ ने चूल्हे से भाजी का बर्तन उतारा और खाने भी लगे। स्वादिष्टता और मित्रता वस्तु में नहीं, प्रेम में है। शत्रु की हलवा पूड़ी भी विष जैसी लगती है।
भगवान को दुर्योधन के छप्पन भोग, मिष्ठान अच्छे नहीं लगे, परंतु प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने विदुर जी की भाजी खाई। इस मौके पर धर्मेंद्र सिंह, राकेश सिंह, जंग बहादुर सिंह, कन्हैया बक्स सोमवंशी, रामभजन राठौर, मशाल सिंह, रामू सिंह आदि रहे।
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दुर्योधन ने कहा कि भीख मांगने से राज्य नहीं मिलता। वह सुई की नोक जितनी भूमि भी पांडवों को नहीं देगा और वह युद्ध के लिए तैयार है।
धृतराष्ट्र ने प्रभु को भाइयों के झगड़े से दूर रहकर भोजन ग्रहण करने के लिए कहा, लेकिन श्रीकृष्ण ने यह सोच कर कि पापियों के घर का अन्न खाने से उनकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाएगी, भोजन करने से इनकार कर दिया।
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द्रोणाचार्य सहित अनेक राजाओं ने भगवान से अपने घर चलने को कहा, परंतु प्रभु ने यह कहकर कि उनका एक प्रिय भक्त गंगा किनारे उनका इंतजार कर रहा है, सभी को मना कर दिया।
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सुलभा भी भगवान की प्रतीक्षा कर रही हैं। प्रेम के वशीभूत हो श्रीकृष्ण का विदुर के घर पहुंचे तो विदुर-सुलभा भगवान के नाम का कीर्तन कर रहे थे। कहा कि प्रभु को प्रतीक्षा करते दो घंटे बीत गए, लेकिन यह कीर्तन तो पूर्ण होने में ही न आता था।
व्याकुल होकर कन्हैया ने द्वार खटखटाया। खुशी में विदुर सुलभा आसन भी न दे सके तो प्रभु ने स्वयं अपने हाथों से आसन बिछाया व उन्हें भी पास में बिठा लिया। भगवान ने कहा, चाचाजी मैं भूखा हूं, पति पत्नी को संकोच हुआ कि प्रभु को भाजी कैसे खिलाएं।
इतने में द्वारिकानाथ ने चूल्हे से भाजी का बर्तन उतारा और खाने भी लगे। स्वादिष्टता और मित्रता वस्तु में नहीं, प्रेम में है। शत्रु की हलवा पूड़ी भी विष जैसी लगती है।
भगवान को दुर्योधन के छप्पन भोग, मिष्ठान अच्छे नहीं लगे, परंतु प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने विदुर जी की भाजी खाई। इस मौके पर धर्मेंद्र सिंह, राकेश सिंह, जंग बहादुर सिंह, कन्हैया बक्स सोमवंशी, रामभजन राठौर, मशाल सिंह, रामू सिंह आदि रहे।