{"_id":"62f684fac5874b79c1001ea9","slug":"cultural-hardoi-news-knp7125743200","type":"story","status":"publish","title_hn":"हरोदईः अंग्रेजों की यातनाओं से नहीं मानी थी हार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हरोदईः अंग्रेजों की यातनाओं से नहीं मानी थी हार
विज्ञापन
फोटो-11- स्वर्गीय श्रीकृष्ण त्यागी
- फोटो : HARDOI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरदोई । टड़ियांवा क्षेत्र के ग्राम रमदानकुईं के मजरा अयारी के मूल निवासी रहे पं. श्रीकृष्ण दीक्षित ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की यातनाओं के सामने हार नहीं मानी। वह अंग्रेजों से मोर्चा लेते रहे। जेल में यातानाओं का विरोध कर हाहाकार मचाने पर अंग्रेजी हुकूमत उन पर खूब जुल्म करती, लेकिन वे जान की परवाह किए बिना भोजन-पानी त्याग देते थे। इस तरह के आंदोलन के चलते उनके क्रांतिकारी साथी उन्हें त्यागी कहकर बुलाते थे। इसके कारण उनका नाम श्रीकृष्ण त्यागी पड़ गया ।
किशोरावस्था में ही वह स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने लगे और हैदराबाद में आंदोलन किया। उनके पुत्र शिक्षक नेता योगेश त्यागी के अनुसार पहली बार पिता जी को डीआई आर मीसा में दोषी मानते हुए अंग्रेजी शासन ने आठ महीने का कठोर दंड और 25 रुपये का जुर्माना लगाते हुए सजा सुनाई थी। इसके लिए उन्हें सात दिसंबर 1940 को जिला जेल हरदोई से जिला जेल बाराबंकी भेज दिया गया। बाराबंकी जेल से चार जनवरी 1941 को जिला जेल बस्ती भेज दिया गया।
योगेश त्यागी बताते हैं कि पिता जी बताते थे कि 3 अप्रैल 1941 को बहुत गर्मी थी। सुबह सभी क्रांतिकारी बैरक से बाहर निकाले गए, शाम को सभी क्रांतिकारियों ने बैरक में जाने से मना कर दिया। इस पर भरी संख्या में पुलिस बल को जेल में बुला लिया गया। जेलर ने एक से 10 तक गिनती गिनी और चेतावनी दी। सभी लोग अंदर चले गए, लेकिन वो नहीं गए और विरोध में अन्न-जल त्याग दिया। इसको लेकर पहले उनकी खूब पिटाई हुई। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। अंग्रेजी शासन ने 4 अप्रैल 1941 को कैंप जेल लखनऊ स्थानांतरित कर दिया। 24 अक्तूबर 1941 को कैंप जेल लखनऊ से रिहा कर दिए गए।
विज्ञापन
9 अगस्त 1942 के आंदोलन के लिए उन्हें डीआईआर मीसा में फिर अंग्रेजी शासन ने नौ महीने की सजा सुनाई। यह सजा 31 मई 1943 को सुनाई गई। इसके विरुद्ध श्रीकृष्ण त्यागी की पत्नी विद्यावती ने अपील की। अपील मंजूर होने पर उन्हें 4 अगस्त 1943 को रिहा कर दिया गया। आजादी मिलने के बाद श्रीकृष्ण त्यागी ने जमीदारी उन्मूलन की लड़ाई लड़ी। इस दौरान उन पर जमीदारों ने एक फर्जी मुकदमा लिखा दिया। इसमें उन्हें पांच वर्ष की सजा हुई। सीतापुर जेल में पांच वर्ष सजा काटी। 15 अक्टूबर 2003 को स्वर्गवास हो गया। 1952 से 1995 तक निर्विरोध ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान रहे। उनके दूसरे पुत्र अविनाश अब गांव के प्रधान हैं । आजादी के 25 वर्ष पूर्ण होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। गांधी भवन में उनका बड़ा चित्र लगा हुआ है।
विज्ञापन
किशोरावस्था में ही वह स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने लगे और हैदराबाद में आंदोलन किया। उनके पुत्र शिक्षक नेता योगेश त्यागी के अनुसार पहली बार पिता जी को डीआई आर मीसा में दोषी मानते हुए अंग्रेजी शासन ने आठ महीने का कठोर दंड और 25 रुपये का जुर्माना लगाते हुए सजा सुनाई थी। इसके लिए उन्हें सात दिसंबर 1940 को जिला जेल हरदोई से जिला जेल बाराबंकी भेज दिया गया। बाराबंकी जेल से चार जनवरी 1941 को जिला जेल बस्ती भेज दिया गया।
विज्ञापन
योगेश त्यागी बताते हैं कि पिता जी बताते थे कि 3 अप्रैल 1941 को बहुत गर्मी थी। सुबह सभी क्रांतिकारी बैरक से बाहर निकाले गए, शाम को सभी क्रांतिकारियों ने बैरक में जाने से मना कर दिया। इस पर भरी संख्या में पुलिस बल को जेल में बुला लिया गया। जेलर ने एक से 10 तक गिनती गिनी और चेतावनी दी। सभी लोग अंदर चले गए, लेकिन वो नहीं गए और विरोध में अन्न-जल त्याग दिया। इसको लेकर पहले उनकी खूब पिटाई हुई। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। अंग्रेजी शासन ने 4 अप्रैल 1941 को कैंप जेल लखनऊ स्थानांतरित कर दिया। 24 अक्तूबर 1941 को कैंप जेल लखनऊ से रिहा कर दिए गए।
विज्ञापन
9 अगस्त 1942 के आंदोलन के लिए उन्हें डीआईआर मीसा में फिर अंग्रेजी शासन ने नौ महीने की सजा सुनाई। यह सजा 31 मई 1943 को सुनाई गई। इसके विरुद्ध श्रीकृष्ण त्यागी की पत्नी विद्यावती ने अपील की। अपील मंजूर होने पर उन्हें 4 अगस्त 1943 को रिहा कर दिया गया। आजादी मिलने के बाद श्रीकृष्ण त्यागी ने जमीदारी उन्मूलन की लड़ाई लड़ी। इस दौरान उन पर जमीदारों ने एक फर्जी मुकदमा लिखा दिया। इसमें उन्हें पांच वर्ष की सजा हुई। सीतापुर जेल में पांच वर्ष सजा काटी। 15 अक्टूबर 2003 को स्वर्गवास हो गया। 1952 से 1995 तक निर्विरोध ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान रहे। उनके दूसरे पुत्र अविनाश अब गांव के प्रधान हैं । आजादी के 25 वर्ष पूर्ण होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। गांधी भवन में उनका बड़ा चित्र लगा हुआ है।