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Hardoi News: आईफ्लू में आई ड्राॅप का इस्तेमाल दे रहा ग्लूकोमा का दर्द
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हरदोई। पिछले लगभग एक माह से आईफ्लू जिले के बाशिंदों के लिए मुसीबत बना हुआ है। आईफ्लू से निजात पाने वाले लोग बड़ी संख्या में एक नई मुसीबत का सामना कर रहे हैं। दरअसल, आईफ्लू जल्द सही करने के लिए बिना चिकित्सकों की सलाह के ही लोगों ने स्टेरायड आई ड्राॅप का इस्तेमाल किया है। इसके साइड इफैक्ट में लोगों की आंखों की रोशनी कम हो रही है और लोग ग्लूकोमा से पीड़ित हो रहे हैं।
मेडिकल काॅलेज से संबद्ध जिला चिकित्सालय के नेत्र रोग विभाग में बीते एक माह से हर रोज औसतन 200 मरीज आई फ्लू के आ रहे हैं। नगरीय इलाकों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में आई फ्लू फैला हुआ है। बड़ी संख्या में आईफ्लू के मरीज प्राइवेट अस्पतालों और चिकित्सकों के पास भी पहुंच रहे हैं। आलम यह है कि अच्छी आई ड्राॅप भी बाजार में नहीं मिल पा रही हैं। कुछ लोग अपनी मर्जी से तो कुछ लोग झोलाछाप की सलाह पर मेडिकल स्टोर से कोई भी आई ड्राॅप लेकर इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे आई ड्राॅप स्टेरायड बेस्ड हैं। इससे फौरी तौर पर आंखों में राहत मिल जा रही है, लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही रोशनी भी कम हो रही है।
दरअसल, यह स्टेरायड बेस्ड आईड्राप का साइड इफैक्ट है। इसके अधिक इस्तेमाल से आंखों में ग्लूकोमा भी हो रहा है।
जिला अस्पताल के नेत्र परीक्षण अधिकारी प्रतिवेंद्र वर्मा ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से हर रोज औसतन 30 मरीज ऐसे आ रहे हैं जो आई फ्लू का सामना करने के बाद इससे उबर भी चुके हैं। बावजूद इसके इन लोगों की आंखों की रोशनी कम हो रही है और इनमें से अधिकतर ग्लूकोमा का शिकार हैं। आई फ्लू के इलाज के बारे में पूछने पर यह लोग जो आई ड्राॅप बताते या दिखाते हैं वह स्टेरायड बेस्ड हैं। अधिकतर लोगों ने सीधे मेडिकल स्टोर से या फिर किसी झोलाछाप की सलाह पर यह आई ड्रॉप लिए थे।
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जिला चिकित्सालय के पूर्व अधीक्षक और नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ. आरके मिश्रा कहते हैं कि आई फ्लू में किसी को भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। उनका दावा है कि सिर्फ 40 फीसदी मरीज चिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। 60 फीसदी लोग या झोलाछाप से इलाज करा रहे हैं या फिर मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने सलाह दी है कि आईफ्लू होने पर चिकित्सक से परामर्श लें। जिला अस्पताल में भी चिकित्सक उपलब्ध हैं।
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मेडिकल काॅलेज से संबद्ध जिला चिकित्सालय के नेत्र रोग विभाग में बीते एक माह से हर रोज औसतन 200 मरीज आई फ्लू के आ रहे हैं। नगरीय इलाकों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में आई फ्लू फैला हुआ है। बड़ी संख्या में आईफ्लू के मरीज प्राइवेट अस्पतालों और चिकित्सकों के पास भी पहुंच रहे हैं। आलम यह है कि अच्छी आई ड्राॅप भी बाजार में नहीं मिल पा रही हैं। कुछ लोग अपनी मर्जी से तो कुछ लोग झोलाछाप की सलाह पर मेडिकल स्टोर से कोई भी आई ड्राॅप लेकर इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे आई ड्राॅप स्टेरायड बेस्ड हैं। इससे फौरी तौर पर आंखों में राहत मिल जा रही है, लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही रोशनी भी कम हो रही है।
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दरअसल, यह स्टेरायड बेस्ड आईड्राप का साइड इफैक्ट है। इसके अधिक इस्तेमाल से आंखों में ग्लूकोमा भी हो रहा है।
जिला अस्पताल के नेत्र परीक्षण अधिकारी प्रतिवेंद्र वर्मा ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से हर रोज औसतन 30 मरीज ऐसे आ रहे हैं जो आई फ्लू का सामना करने के बाद इससे उबर भी चुके हैं। बावजूद इसके इन लोगों की आंखों की रोशनी कम हो रही है और इनमें से अधिकतर ग्लूकोमा का शिकार हैं। आई फ्लू के इलाज के बारे में पूछने पर यह लोग जो आई ड्राॅप बताते या दिखाते हैं वह स्टेरायड बेस्ड हैं। अधिकतर लोगों ने सीधे मेडिकल स्टोर से या फिर किसी झोलाछाप की सलाह पर यह आई ड्रॉप लिए थे।
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जिला चिकित्सालय के पूर्व अधीक्षक और नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ. आरके मिश्रा कहते हैं कि आई फ्लू में किसी को भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। उनका दावा है कि सिर्फ 40 फीसदी मरीज चिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। 60 फीसदी लोग या झोलाछाप से इलाज करा रहे हैं या फिर मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने सलाह दी है कि आईफ्लू होने पर चिकित्सक से परामर्श लें। जिला अस्पताल में भी चिकित्सक उपलब्ध हैं।