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पीपल पर दी गई थी 4 सपूतों को फांसी

Tue, 10 May 2016 12:59 AM IST
अमर उजाला/ब्यूरो, हापुड़
अमर उजाला/ब्यूरो, हापुड़ Updated Tue, 10 May 2016 12:59 AM IST
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the Ficus tree are witness of Freedom fighiting
स्वतंत्रता संग्राम - फोटो : अमर उजाला

देश को आजादी दिलाने के लिए 10 मई 1857 को शुरू प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हापुड़ के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। दिल्ली रोड पर रामलीला मैदान के बाहर स्थित पीपल का पेड़ आजादी की लड़ाई का गवाह है, जहां वर्ष 1857 में अंग्रेजों ने धौलाना के चार देशभक्तों को फांसी पर लटका दिया था। आज भी यह पीपल का पेड़ शहीदों की शहादत का साक्षी है।

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यह पेड़ वर्ष 1975 तक उपेक्षित रहा। 10 मई 1975 को पत्रकार स्वर्गीय कैलाश आजाद ने अपने कुछ साथियों के साथ इस पेड़ के नीचे शहीद दिवस मनाया और शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए। वर्ष 1976 में देश में जब आपातकाल लागू था, तब यहां दस मई से शहीद मेला एवं प्रदर्शनी का आयोजन शुरू किया गया।
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मेले को प्रदेश के गजट में भी शामिल कर दिया गया। तब से अब तक हर साल दस मई को जिले में सरकारी अवकाश घोषित किया जाता है। उधर, 10 मई 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में चर्बी लगे कारतूसों को आधार बनाकर विद्रोह की आग सुलगाने में मेरठ छावनी के 85 सैनिकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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इनमें एक वीर सैनिक हापुड़ के मोहल्ला भंडा पट्टी निवासी चौधरी जबरदस्त खां थे। अंग्रेजों ने बाद में जबरदस्त खां और उनके भाई को झूठे मुकदमे में फंसा कर फांसी दे दी थी। आज भी चौधरी जबरदस्त खां की शहादत को याद किया जाता है।

चौधरी जबरदस्त खां 10 मई 1857 को अंग्रेज अफसर का विरोध कर दिल्ली की ओर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को देश का शासक बनाने की सोच कर निकल पड़े। हालांकि बाद में उन्हें और उनके भाई नवाबउल्त खां को पकड़कर 14 सितंबर 1857 को हुसलन नामक अंग्रेज अफसर ने फांसी पर चढ़ा दिया। उनके पूरे परिवार को कत्ल करने का आदेश दे दिया गया।

अंग्रेजों ने जब्त कर ली जबरदस्त खां की जायदाद
जबरदस्त खां के परिवार का एक कारिंदा अब्दुल रहमान उनके चार साल के बच्चे अब्दुल्ला को लेकर कश्मीर चला गया। जबरदस्त खां की जायदाद जब्त कर ली गई, जो बुलंदशहर रोड पर थी। उधर रहमान ने अब्दुल्ला का पालन पोषण कर उसे बैरिस्टर बनाया और अपने अंतिम दिनों में अब्दुल्ला को पूरे मामले से अवगत कराया।


अंग्रेजों से मुकदमा लड़कर वापस ली जमीन
 इसके बाद अब्दुल्ला हापुड़ आए और मेरठ में बैरिस्टर हुए। अंग्रेजों से मुकदमा लड़कर खानदानी जमीन वापस ले ली। जमीन ग्राम इमटौरी में है। चौधरी जबरदस्त खां के परपौत्र लेखक और साहित्यकार फसीह चौधरी (बंदूक वालों) व डॉ. मरगूभ ने बताया कि आज भी वे लोग शहीदों की याद में में फ्रीडम फाइटर्स मेमोरियल सोसायटी हापुड़ के माध्यम से कार्यक्रम आयोजित कर शहीदों को याद करते हैं। सिकंदरगेट पर प्रतिवर्ष 10 मई को कार्यक्रम का आयोजन कर शहीदों को नमन किया जाता है।

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