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Hapur News: नलकूप के बिलों में राहत की आस, ऊर्जा निगम ने शासन को भेजा पत्र
Sun, 01 Sep 2024 10:41 PM IST
गाजियाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हापुड़
संवाद न्यूज एजेंसी, हापुड़
Updated Sun, 01 Sep 2024 10:41 PM IST
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हापुड़। नलकूप बिल घोटाले से जिले के 25 हजार किसानों के बिलों में जुड़ी करीब 1200 करोड़ की बकायेदारी पर ऊर्जा निगम की ओर से शासन में पत्र लिखा गया है। जिसमें इस तरह के बिलों का निस्तारण और संशोधन कैसे करें, इसका दिशा निर्देश मांगा गया है। एसआईटी गठित होने की भी चर्चा हैं, किसानों के लिए यह राहत की बात है।
शासन ने नलकूप उपभोक्ताओं को निशुल्क बिजली मुहैया कराने की योजना शुरू की है। इसके लिए एक फार्म किसानों से भरवाया जा रहा है, जिसमें पुराने बिल जमा होने अनिवार्य हैं। लेकिन हापुड़ के करीब 25 हजार किसानों के नलकूप बिलों में लाखों की गलत बकायेदारी जुड़कर आ रही है।
इस कारण निशुल्क बिजली के लिए किसान ऑनलाइन आवेदन भी नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय स्तर से इस तरह के बिल संशोधित नहीं किए जा सकते। ऐसे में ऊर्जा निगम की ओर से शासन में पत्राचार किया गया है। इसमें बिलों को संशोधित कैसे किया जाए, इस पर दिशा निर्देश मांगा है। बता दें कि वर्ष 2019 में तत्कालीन डीएम ने भी शासन में पत्र भेजा था। जिसके बाद एमडी कार्यालय से गठित टीम हापुड़ से अहम दस्तावेज ले गई थी। इस मामले में अभी कोई निर्णय नहीं हो सका है। लेकिन इस बार चर्चा है कि शासन से इस मामले में एसआईटी गठित हो रही है।
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वर्ष 2004 में सिर्फ 120 करोड़ थी घोटाले की राशि-
ऊर्जा निगम के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004 में जब इस घपले की परतें खुली थी तब घोटाला महज 120 करोड़ का था। इसमें 85 लाख रुपये मूल था और 35 लाख रुपये ब्याज बन रहा था। उस समय सकारात्मक जांच कर कार्रवाई होती तो किसानों को अब तक राहत मिल चुकी होती।
अब बोर्ड ऑफ डायरेक्टर या कैबिनेट से ही राहत की उम्मीद-
घोटाले की राशि 600 करोड़ से अधिक हो गई है। इतनी राशि को संशोधित करना या खत्म करना किसी स्थानीय अधिकारी के बस की बात नहीं है। ऊर्जा निगम के अधिकारी मानते हैं कि इस राशि को बिलों से हटाने के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर या कैबिनेट को ही फैसला लेना होगा।
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वर्ष 2006 में बिलों को संशोधित करने का हुआ था प्रयास
वर्ष 2006 में ऐसे बिलों को संशोधित करने का प्रयास हुआ था। उस समय ओटीएस योजना लागू थी, बहुत से किसानों की पेनल्टी और जुड़कर आ रही बकायेदारी को खातों से हटाया गया लेकिन, मामला बढ़ा तो फिर से अधिकारियों ने हटाई गई राशि को खातों में जोड़ दिया।
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इस तरह बिगड़ते चले गए बिल-
ऊर्जा निगम कार्यालय में मैनुअल बिल जमा होने की समयावधि में वर्ष 2000 के ईर्द गिर्द बिलों में घपला शुरू हुआ। किसानों से पैसा जमा कराया गया, लेकिन इसे राजस्व कोष में जमा नहीं कराया। रसीदें नाले में बहा दी गई, लेजर भी गायब कर दिए। यही कारण है कि घोटाला करने वाले पकड़ में नहीं आ सके है।
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कोट -
नलकूप बिलों में जुड़कर आ रही बकायेदारी के संबंध में शासन में पत्राचार किया है। बिलों को संशोधित करने या अन्य विकल्प के बारे में दिशा निर्देश मांगे गए हैं, शासन से जैसा आदेश आएगा उसी के अनुसार किसानों को राहत दिलाई जाएगी। - आरपी वर्मा, अधिशासी अभियंता।
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शासन ने नलकूप उपभोक्ताओं को निशुल्क बिजली मुहैया कराने की योजना शुरू की है। इसके लिए एक फार्म किसानों से भरवाया जा रहा है, जिसमें पुराने बिल जमा होने अनिवार्य हैं। लेकिन हापुड़ के करीब 25 हजार किसानों के नलकूप बिलों में लाखों की गलत बकायेदारी जुड़कर आ रही है।
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इस कारण निशुल्क बिजली के लिए किसान ऑनलाइन आवेदन भी नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय स्तर से इस तरह के बिल संशोधित नहीं किए जा सकते। ऐसे में ऊर्जा निगम की ओर से शासन में पत्राचार किया गया है। इसमें बिलों को संशोधित कैसे किया जाए, इस पर दिशा निर्देश मांगा है। बता दें कि वर्ष 2019 में तत्कालीन डीएम ने भी शासन में पत्र भेजा था। जिसके बाद एमडी कार्यालय से गठित टीम हापुड़ से अहम दस्तावेज ले गई थी। इस मामले में अभी कोई निर्णय नहीं हो सका है। लेकिन इस बार चर्चा है कि शासन से इस मामले में एसआईटी गठित हो रही है।
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वर्ष 2004 में सिर्फ 120 करोड़ थी घोटाले की राशि-
ऊर्जा निगम के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004 में जब इस घपले की परतें खुली थी तब घोटाला महज 120 करोड़ का था। इसमें 85 लाख रुपये मूल था और 35 लाख रुपये ब्याज बन रहा था। उस समय सकारात्मक जांच कर कार्रवाई होती तो किसानों को अब तक राहत मिल चुकी होती।
अब बोर्ड ऑफ डायरेक्टर या कैबिनेट से ही राहत की उम्मीद-
घोटाले की राशि 600 करोड़ से अधिक हो गई है। इतनी राशि को संशोधित करना या खत्म करना किसी स्थानीय अधिकारी के बस की बात नहीं है। ऊर्जा निगम के अधिकारी मानते हैं कि इस राशि को बिलों से हटाने के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर या कैबिनेट को ही फैसला लेना होगा।
वर्ष 2006 में बिलों को संशोधित करने का हुआ था प्रयास
वर्ष 2006 में ऐसे बिलों को संशोधित करने का प्रयास हुआ था। उस समय ओटीएस योजना लागू थी, बहुत से किसानों की पेनल्टी और जुड़कर आ रही बकायेदारी को खातों से हटाया गया लेकिन, मामला बढ़ा तो फिर से अधिकारियों ने हटाई गई राशि को खातों में जोड़ दिया।
इस तरह बिगड़ते चले गए बिल-
ऊर्जा निगम कार्यालय में मैनुअल बिल जमा होने की समयावधि में वर्ष 2000 के ईर्द गिर्द बिलों में घपला शुरू हुआ। किसानों से पैसा जमा कराया गया, लेकिन इसे राजस्व कोष में जमा नहीं कराया। रसीदें नाले में बहा दी गई, लेजर भी गायब कर दिए। यही कारण है कि घोटाला करने वाले पकड़ में नहीं आ सके है।
कोट -
नलकूप बिलों में जुड़कर आ रही बकायेदारी के संबंध में शासन में पत्राचार किया है। बिलों को संशोधित करने या अन्य विकल्प के बारे में दिशा निर्देश मांगे गए हैं, शासन से जैसा आदेश आएगा उसी के अनुसार किसानों को राहत दिलाई जाएगी। - आरपी वर्मा, अधिशासी अभियंता।