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सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक मीरा मजार पर लगा मेला
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सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक मीरा मजार पर लगा मेला
गढ़मुक्तेश्वर। क्षेत्र की मीरा बाबा की मजार इस दौर में भी सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल बनी हुई है, जिस पर कार्तिक माह में पौराणिक गंगा मेले के दौरान मेला प्रारंभ हो गया। जहां हाजिरी लगाने के बाद ही व्यापारी और पशु पालक गंगा मेले को जाते हैं।
महाभारत कालीन तीर्थनगरी में ऐसे अनेकों धर्मस्थल हैं, जो यहां के पौराणिक महत्व का आज भी जीवंत प्रमाण बने हुए हैं। अयोध्या विवाद को लेकर भले ही समूचा देश सांप्रदायिकता की आग में जल उठा था, लेकिन गढ़ के उत्तरी छोर पर स्थित मुस्लिम फकीर मीरा बाबा की मजार इस सबसे पूरी तरह अछूती रही थी। कार्तिक मास में पौराणिक गंगा मेले के दौरान मीरा मजार पर भी मेला भरता है। वैसे तो सभी धर्म-संप्रदाय के अनुयायी मजार पर आकर मन्नतें मांगते हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक संख्या अश्वीय मेले में आने वाले कुम्हार समुदाय के लोगों की रहती है। जो मजार पर एक रात का पड़ाव डालकर मेले में पहुंचते हैं। नवविवाहित जोड़े संतान प्राप्ति के लिए जात लगाते हैं, जो मनोकामना पूरी होने पर अगले वर्ष यहां आकर नारियल, बताशे, लड्डू आदि का प्रसाद एवं चादर चढ़ाकर बाबा का आभार जताते हैं। सुखबीरी, रामपाल, मनोहर, राकेश, मोहन का कहना है कि बाबा के दरबार पर आकर सभी मनोकामना पूरी होती हैं। मजार की देखरेख यामीन शेख के परिजन पुश्तैनी रूप में करते आ रहे हैं।
गरीब-निराश्रितों को बंटता है प्रसाद
मीरा मजार पर आने वाले श्रद्धालु मिट्टी की हांडी में गुड़ एवं चावल डालकर उसे उपले (कंडों) की आंच पर पकाते हैं। जिसे गरीब-निराश्रितों को वितरित कर बाबा को प्रसन्न किया जाता है।
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गढ़मुक्तेश्वर। क्षेत्र की मीरा बाबा की मजार इस दौर में भी सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल बनी हुई है, जिस पर कार्तिक माह में पौराणिक गंगा मेले के दौरान मेला प्रारंभ हो गया। जहां हाजिरी लगाने के बाद ही व्यापारी और पशु पालक गंगा मेले को जाते हैं।
महाभारत कालीन तीर्थनगरी में ऐसे अनेकों धर्मस्थल हैं, जो यहां के पौराणिक महत्व का आज भी जीवंत प्रमाण बने हुए हैं। अयोध्या विवाद को लेकर भले ही समूचा देश सांप्रदायिकता की आग में जल उठा था, लेकिन गढ़ के उत्तरी छोर पर स्थित मुस्लिम फकीर मीरा बाबा की मजार इस सबसे पूरी तरह अछूती रही थी। कार्तिक मास में पौराणिक गंगा मेले के दौरान मीरा मजार पर भी मेला भरता है। वैसे तो सभी धर्म-संप्रदाय के अनुयायी मजार पर आकर मन्नतें मांगते हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक संख्या अश्वीय मेले में आने वाले कुम्हार समुदाय के लोगों की रहती है। जो मजार पर एक रात का पड़ाव डालकर मेले में पहुंचते हैं। नवविवाहित जोड़े संतान प्राप्ति के लिए जात लगाते हैं, जो मनोकामना पूरी होने पर अगले वर्ष यहां आकर नारियल, बताशे, लड्डू आदि का प्रसाद एवं चादर चढ़ाकर बाबा का आभार जताते हैं। सुखबीरी, रामपाल, मनोहर, राकेश, मोहन का कहना है कि बाबा के दरबार पर आकर सभी मनोकामना पूरी होती हैं। मजार की देखरेख यामीन शेख के परिजन पुश्तैनी रूप में करते आ रहे हैं।
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गरीब-निराश्रितों को बंटता है प्रसाद
मीरा मजार पर आने वाले श्रद्धालु मिट्टी की हांडी में गुड़ एवं चावल डालकर उसे उपले (कंडों) की आंच पर पकाते हैं। जिसे गरीब-निराश्रितों को वितरित कर बाबा को प्रसन्न किया जाता है।
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