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समानता दिवस : बंदिशों में जीने को मजबूर आधुनिक नारी
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राठ। महिला सशक्तीकरण, सम्मान व समानता के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। इसके दावे भी किए जा रहे हैं। मगर हकीकत आज भी धुंधली है। 21वीं सदी में भी आधी आबादी मानसिक गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। ज्यादातर महिलाएं खुली हवा में सांस लेने को तरस रहीं हैं।
कामकाजी व आर्थिक रूप से सक्षम महिलाओं की स्थिति भी ज्यादा अलग नहीं है। कहने को भले ही वह स्वावलंबी हों मगर उन्हें घर का काम करने के साथ ही पैसे कमाने की मशीन समझा जाता है। वह खुद के लिए छोटे-छोटे निर्णय लेने में पुरुषों पर आश्रित हैं। आधुनिक युग की महिलाएं भी पुरुष प्रधान मानसिकता की शिकार बनकर अपनी इच्छाओं का दमन करने पर मजबूर हैं।
सामाजिक समानता, सम्मान व महिला अधिकारों की वकालत करने वाले अनेकों महिला संगठन मिल जाएंगे। मगर हकीकत में देखा जाए तो इनमें से अधिकांश संगठन पुरुषों के इशारे पर ही चलते हैं। इन संगठनों की कार्यशैली अधिकांश पुरुष ही तय करते हैं। संगठनों के कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनकर बैठने से भी गुरेज नहीं करते। पुरुष मानसिकता पर चलने वाले यह संगठन अपने उद्देश्य में कितने सफल हो रहे हैं यह कहने की आवश्यकता नहीं है।
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कार्यस्थल पर भेदभाव का शिकार महिलाएं
कामकाजी महिलाओं को आज भी अपने कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। कार्यस्थल के किसी भी कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत सत्कार करने की जिम्मेदारी महिला कर्मचारियों की होती है। जबकि महिला व पुरुष समान शिक्षा व समान प्रतिभा के बाद समान पद पाते हैं। महिला सशक्तीकरण के कार्यक्रमों में विद्यालयों में शिक्षक अतिथियों के साथ बैठते हैं, जबकि शिक्षिकाएं उनके लिए नाश्ते के प्रबंध में लगीं रहतीं हैं। अपनी योग्यता से नौकरी पाने वाली महिलाएं कार्यस्थल में भी भेदभाव से मुक्त नहीं हैं।
गृहणी यामिनी द्विवेदी ने बताया सामाजिक मान-मर्यादाओं के नाम पर घर के पुरुषों की ओर से महिलाओं पर ढेर सारे नियम, कायदे, कानून थोप दिए गए हैं। अपने लिए निर्णय लेने में उन्हें आजादी नहीं है। अब महिलाओं को न कहना सीखना होगा।
शिक्षिका नीलम कौशल ने बताया सम्मान मांगने से नहीं लेने से मिलता है। पुरुष प्रधान मानसिकता से सम्मान की उम्मीद करना बेकार है। खुद को सशक्त बना कर अपने सम्मान व स्वाभिमान की रक्षा खुद करनी होगी। तभी आजादी की सांस लेना संभव है।
गृहणी अंजू त्रिपाठी ने कहा, भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का दर्जा दिया गया है। जबकि आज के दौर में नारी सम्मान के नाम पर दिखावा ज्यादा हो रहा है। हकीकत में महिलाओं को अपनी मर्जी से अपनी खुशी के लिए कोई निर्णय नहीं लेने दिया जाता।
पति के साथ खेती में हाथ बंटाने वाली नौरंगा गांव की उर्मिला देवी ने कहा, महिलाएं हर काम में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलतीं हैं। इसके बावजूद निर्णय लेने का अधिकार घर के पुरुषों को होता है। इस मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।
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कामकाजी व आर्थिक रूप से सक्षम महिलाओं की स्थिति भी ज्यादा अलग नहीं है। कहने को भले ही वह स्वावलंबी हों मगर उन्हें घर का काम करने के साथ ही पैसे कमाने की मशीन समझा जाता है। वह खुद के लिए छोटे-छोटे निर्णय लेने में पुरुषों पर आश्रित हैं। आधुनिक युग की महिलाएं भी पुरुष प्रधान मानसिकता की शिकार बनकर अपनी इच्छाओं का दमन करने पर मजबूर हैं।
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सामाजिक समानता, सम्मान व महिला अधिकारों की वकालत करने वाले अनेकों महिला संगठन मिल जाएंगे। मगर हकीकत में देखा जाए तो इनमें से अधिकांश संगठन पुरुषों के इशारे पर ही चलते हैं। इन संगठनों की कार्यशैली अधिकांश पुरुष ही तय करते हैं। संगठनों के कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनकर बैठने से भी गुरेज नहीं करते। पुरुष मानसिकता पर चलने वाले यह संगठन अपने उद्देश्य में कितने सफल हो रहे हैं यह कहने की आवश्यकता नहीं है।
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कार्यस्थल पर भेदभाव का शिकार महिलाएं
कामकाजी महिलाओं को आज भी अपने कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। कार्यस्थल के किसी भी कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत सत्कार करने की जिम्मेदारी महिला कर्मचारियों की होती है। जबकि महिला व पुरुष समान शिक्षा व समान प्रतिभा के बाद समान पद पाते हैं। महिला सशक्तीकरण के कार्यक्रमों में विद्यालयों में शिक्षक अतिथियों के साथ बैठते हैं, जबकि शिक्षिकाएं उनके लिए नाश्ते के प्रबंध में लगीं रहतीं हैं। अपनी योग्यता से नौकरी पाने वाली महिलाएं कार्यस्थल में भी भेदभाव से मुक्त नहीं हैं।
गृहणी यामिनी द्विवेदी ने बताया सामाजिक मान-मर्यादाओं के नाम पर घर के पुरुषों की ओर से महिलाओं पर ढेर सारे नियम, कायदे, कानून थोप दिए गए हैं। अपने लिए निर्णय लेने में उन्हें आजादी नहीं है। अब महिलाओं को न कहना सीखना होगा।
शिक्षिका नीलम कौशल ने बताया सम्मान मांगने से नहीं लेने से मिलता है। पुरुष प्रधान मानसिकता से सम्मान की उम्मीद करना बेकार है। खुद को सशक्त बना कर अपने सम्मान व स्वाभिमान की रक्षा खुद करनी होगी। तभी आजादी की सांस लेना संभव है।
गृहणी अंजू त्रिपाठी ने कहा, भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का दर्जा दिया गया है। जबकि आज के दौर में नारी सम्मान के नाम पर दिखावा ज्यादा हो रहा है। हकीकत में महिलाओं को अपनी मर्जी से अपनी खुशी के लिए कोई निर्णय नहीं लेने दिया जाता।
पति के साथ खेती में हाथ बंटाने वाली नौरंगा गांव की उर्मिला देवी ने कहा, महिलाएं हर काम में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलतीं हैं। इसके बावजूद निर्णय लेने का अधिकार घर के पुरुषों को होता है। इस मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।