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रामलीला एक ऐसा आदर्श परक सांस्कृतिक कार्यक्रम
अमर उजाला ब्यूरो, हमीरपुर
Updated Mon, 26 Sep 2016 12:36 AM IST
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जनक के रूप में सजे मातादीन
- फोटो : अमर उजाला
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रामलीला एक ऐसा मंचन है जिसे कालातीत नहीं कहा जा सकता। यह अवश्य है कि आज के बदलते परिवेश में दर्शकों की संख्या कम हो गई है। रामलीला एक ऐसा आदर्श परक सांस्कृतिक कार्यक्रम है, जिसमें किरदारों की जीवंतता की प्रमुख भूमिका होती है। आज के कंप्यूटरीकरण तथा नव तकनीकी युग में आकर्षण की भूख ने रामलीला की लोकप्रियता में ग्रहण लगा दिया है।
वहीं आर्केस्ट्रा, डीजे तथा नौटंकियों के गिरते स्तर के बीच भौड़े गीतों ने युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ऐसे में संभ्रांत घरों की महिलाएं चाहकर भी रामलीला देखने से परहेज करती हैं। पात्र एवं संवाद संस्कृति तथा रामलीला प्रबंधन में समितियों की भी अहम भूमिका होती है। परशुराम, लक्ष्मण, जनक संवाद व रामचरित्र की स्तरीयता आज भी दर्शकों को बांधे है। रामलीला की महत्ता एक कालजयी संस्कृति है। यह मंचन मरेगा नहीं।
करीब सवा सौ वर्ष पुरानी सहुरापुर गांव की रामलीला आज भी जीवंत है। इसके पीछे गांव में गठित रामलीला कमेटी के पास साढे़ आठ बीघे जमीन है। 36 वर्ष पूर्व गांव के नि:संतान श्याम सिंह ने रामलीला कमेटी के नाम यह जमीन दान कर दी थी। तब से रामलीला का मंचन आसानी से कराया जाने लगा।
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सर्द रातों में रामलीला को देखने कभी दूरदराज से लोग आते रहे हैं लेकिन इधर कई वर्षों से दर्शकों में कमी आई है। गांव के रामबिहारी सिंह रामलीला मंचन के व्यवस्थापक हैं। कहते हैं कि बढ़ती महंगाई के बीच किरदार अदा करने वालों के मेहनताने में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हो गई है। रामलीला कमेटी की जमीन के ऊबड़-खाबड़ होने से पैदावार नहीं हो पाती है। ऐेसे में गांव में चंदा करना पड़ता है। मंच और दर्शकों की सुविधाओं में अच्छा खासा खर्च उठाना पड़ता है।
डांसर व हास्य कलाकार भी जरूरी है। ताकि मंचन के बीच-बीच में दर्शकों का मनोरंजन भी हो सके। पिपरौंदा निवासी मातादीन ने बताया कि बेटी बचाओ के तहत वह ढाई घंटे का मंचन करते हैं। इसमें दहेज प्रथा को समाप्त करना उनकी प्राथमिकता में होता है। रावण का अभिनय करने वाले नदेहरा निवासी संतराम आचार्य कहते हैं कि वह बचपन से अभिनय करते आ रहे हैं। लेकिन अब कई वर्षो से रावण का अभिनय कर रहे हैं।
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वहीं आर्केस्ट्रा, डीजे तथा नौटंकियों के गिरते स्तर के बीच भौड़े गीतों ने युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ऐसे में संभ्रांत घरों की महिलाएं चाहकर भी रामलीला देखने से परहेज करती हैं। पात्र एवं संवाद संस्कृति तथा रामलीला प्रबंधन में समितियों की भी अहम भूमिका होती है। परशुराम, लक्ष्मण, जनक संवाद व रामचरित्र की स्तरीयता आज भी दर्शकों को बांधे है। रामलीला की महत्ता एक कालजयी संस्कृति है। यह मंचन मरेगा नहीं।
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करीब सवा सौ वर्ष पुरानी सहुरापुर गांव की रामलीला आज भी जीवंत है। इसके पीछे गांव में गठित रामलीला कमेटी के पास साढे़ आठ बीघे जमीन है। 36 वर्ष पूर्व गांव के नि:संतान श्याम सिंह ने रामलीला कमेटी के नाम यह जमीन दान कर दी थी। तब से रामलीला का मंचन आसानी से कराया जाने लगा।
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सर्द रातों में रामलीला को देखने कभी दूरदराज से लोग आते रहे हैं लेकिन इधर कई वर्षों से दर्शकों में कमी आई है। गांव के रामबिहारी सिंह रामलीला मंचन के व्यवस्थापक हैं। कहते हैं कि बढ़ती महंगाई के बीच किरदार अदा करने वालों के मेहनताने में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हो गई है। रामलीला कमेटी की जमीन के ऊबड़-खाबड़ होने से पैदावार नहीं हो पाती है। ऐेसे में गांव में चंदा करना पड़ता है। मंच और दर्शकों की सुविधाओं में अच्छा खासा खर्च उठाना पड़ता है।
डांसर व हास्य कलाकार भी जरूरी है। ताकि मंचन के बीच-बीच में दर्शकों का मनोरंजन भी हो सके। पिपरौंदा निवासी मातादीन ने बताया कि बेटी बचाओ के तहत वह ढाई घंटे का मंचन करते हैं। इसमें दहेज प्रथा को समाप्त करना उनकी प्राथमिकता में होता है। रावण का अभिनय करने वाले नदेहरा निवासी संतराम आचार्य कहते हैं कि वह बचपन से अभिनय करते आ रहे हैं। लेकिन अब कई वर्षो से रावण का अभिनय कर रहे हैं।