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‘मित्रता करो तो कृष्ण सुदामा जैसी’
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
Updated Mon, 20 Apr 2015 12:27 AM IST
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क्षेत्र के लहरा गांव में श्रीमद्भागवत कथा के आखिरी दिन कृष्ण सुदामा की कथा सुनाकर व्यास राममिलन शास्त्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि मित्रता करो तो कृष्ण सुदामा जैसी।
वृंदावनधाम से आए कथा व्यास राममिलन शास्त्री ने कृष्ण सुदामा की मित्रता का बखान कर कहा कि मित्र कैसा भी हो। हर परिस्थिति में मित्र को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। मित्र के दु:ख को देखकर अगर मित्र दुखी नहीं होता तो उसे मित्र समझना जीवन की सबसे बड़ी भूल है। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे।
फि र भी कृष्ण अपने मित्र को दरवाजे से नंगे पैर लेने भागे और अपने नेत्रों के जल से पग धो डाले। सुदामा की पत्नी ने भगवान कृष्ण को भेंट के रूप में दो मुठ्ठी चावल पोटली में बांधकर सुदामा को दिए थे कि अपने बाल सखा कृष्ण को भेंट के रूप में दे देना। सुदामा यह सोचकर चिंतित थे कि कृष्ण इतने बड़े राजा हैं उन्हें पोटली के चावल भेंट कैसे दूं।
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भगवान कृष्ण ने देखा कि मित्र कुछ छिपा रहा है। तभी उन्होंने सुदामा की कांख से पोटली निकाली और पोटली से चावल निकालकर खाने लगे और गरीब मित्र को अमीर बना दिया। अंत में श्रद्धालुओं को परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई।
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वृंदावनधाम से आए कथा व्यास राममिलन शास्त्री ने कृष्ण सुदामा की मित्रता का बखान कर कहा कि मित्र कैसा भी हो। हर परिस्थिति में मित्र को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। मित्र के दु:ख को देखकर अगर मित्र दुखी नहीं होता तो उसे मित्र समझना जीवन की सबसे बड़ी भूल है। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे।
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फि र भी कृष्ण अपने मित्र को दरवाजे से नंगे पैर लेने भागे और अपने नेत्रों के जल से पग धो डाले। सुदामा की पत्नी ने भगवान कृष्ण को भेंट के रूप में दो मुठ्ठी चावल पोटली में बांधकर सुदामा को दिए थे कि अपने बाल सखा कृष्ण को भेंट के रूप में दे देना। सुदामा यह सोचकर चिंतित थे कि कृष्ण इतने बड़े राजा हैं उन्हें पोटली के चावल भेंट कैसे दूं।
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भगवान कृष्ण ने देखा कि मित्र कुछ छिपा रहा है। तभी उन्होंने सुदामा की कांख से पोटली निकाली और पोटली से चावल निकालकर खाने लगे और गरीब मित्र को अमीर बना दिया। अंत में श्रद्धालुओं को परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई।