{"_id":"8b70f06566d28a0478b4c2882ed8507d","slug":"desperate-farmers-from-crop-waste-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"फसलों की बर्बादी से किसान हताश","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
फसलों की बर्बादी से किसान हताश
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
Updated Mon, 06 Apr 2015 12:32 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रकृति के कहर से बर्बाद हुई फसलों से जहां किसान हताश हैं। वहीं इसका
विज्ञापन
ज्यादा असर बच्चों की सेहत पर पड़ना शुरू हो गया है। किसान अपनी पीड़ा घर
परिवार में साझा करने से गुरेज कर रहे हैं। लेकिन परिवार के रहन-सहन को देख
उनकी माली हालत खुद व खुद बयां कर रही है। ऐसा ही कुछ नजारा सिकरी गांव
में देखने को मिला। फसल बर्बादी के बीच परिवार चलाने के लिए किसान बच्चों
को दूध घी खिलाने पिलाने में कंजूसी कर रहे है। घर का खर्च चलाने के लिए
दूध, घी, गोबर के उपले बेच रहे है। गांव के ज्यादातर परिवार कर्ज के बोझ
तले दबे है। इसी बीच कइयों ने गांव छोड़ दिया है। परदेश में मेहनत मजदूरी
करने चले गए है। सिकरी गांव में फसल बर्बादी की पड़ताल करने अमर उजाला की
टीम पहुंची, पेश है एक रिपोर्ट-
दैव तो दैव मड़ई हैरान करे है
सिकरी गांव पहुंचे तो शिवचरन प्रजापति से भेंट हो गई। वह घर के दरवाजे सिर पर हाथ रखे बैठा कुछ सोच विचार में था। बाइक रोकते ही तपाक से बोला बतावा भईया का बात ही, जैसे ही कहा कि फसल बर्बादी की जानकारी लेने आए है। कहने लगा भइया दैव तो जऊन करत है वा तौ ठीक है, हमका तौ मड़ई हैरान करे है। कुरेदने पर कहता है कि दो एकड़ खेत का पट्टा उसे 30 साल पहले मिला था। तबसे वह कृषि कार्य करता चला आ रहा है। लेकिन पिछले साल सिकरी और धर्मपुर गांव को मिलाने के लिए बनाया गया संपर्क मार्ग में उसका एक बीघा पट्टा चला गया है। अधिकारियों से शिकायतें कीं लेकिन आज तक पट्टा नापा नहीं गया है। तीन बच्चे है, खर्च कैसे चलता है पूछने पर मकान के बाहर बंधी भैंस की ओर इशारा करते हुए बताया कि लाला हमका या आय जियाये है। येसेे जौन दूध और घी निकरत है वही का बेच लेत हन। कंडा भी बिक जात हैं। कहता है जहां कहूं काम लाग जात है मेहनत मजदूरी कर लेत हौं।
फसल बर्बादी के साथ बेटी की शादी की चिंता
गांव के रामफल कुशवाहा की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। एक बेटी वंदना को बीए तक शिक्षा दिला चुका है। उसकी शादी तय कर चुका है। बताता है कि 10 बीघे जमीन है। पांच बीघे में गेहूं व साढ़े तीन बीघे में चना और डेढ़ बीघे में अरहर बोई है। बरसात से फसल बेकार हो चुकी है। बिटिया की शादी एक मई को कानपुर में तय है एक तरफ शादी की तैयारी तो दूसरी तरफ फसल की कटाई मड़ाई की चिंता सता रही है। शादी के लिए डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लेने के लिए ओबीसी बैंक पौथिया में खसरा खतौनी जमा कर चुका है। नोड्यूज बनवाने के लिए दौड़ लगा रहा है। वहीं नाते रिश्तेदारों से संपर्क कर रहा है ताकि शादी का ठीक-ठाक इंतजाम हो सके। किसान ने कहा कि बीते दिसंबर में उसने लहलहाती फसल देखकर शादी करने की ठान ली। लेकिन अब तो स्थिति बदतर हो गई है।
बैंक का कैसे अदा करें कर्जा
गांव के अंदर बस्ती में घुसते ही हाथ में हंसिया लेकर खेत में फसल की कटाई करने जा रहा गंगाचरन मिला। बदन में फटा कुर्ता पहने इस किसान की हालत देख लगा की इसकी माली हालत कुछ अच्छी नहीं है। पूछने पर उसने बताया कि वह 16 बीघे जमीन का काश्तकार है। चार लड़के दो बेटियों का परिवार है। दोनो बेटियों की शादी किए पांच साल हो गए हैं। इन दोनों शादियों में रिश्तेदारों और साहूकारों से कर्ज लिया। जिसे चुकता करने के लिए 2011 में एक लाख रुपये का बैंक से केसीसी लिया। 2012 में इधर उधर से जुगाड़ कर बैंक का कर्ज जमा करते ही निकाल लिया। इधर दो साल से फसलें धोखा दे रही हैं इतनी कम पैदावार हो रही है कि वह बैंक का ब्याज भी नहीं भर पा रहा है। कहता है कि कांग्रेस ने जैसे कई साल पहले किसानों का कर्ज माफ कर दिया था इसी तरह सरकार कोई स्क ीम निकाले तभी उसकी गाड़ी पटरी पर आएगी।
दैव तो दैव मड़ई हैरान करे है
सिकरी गांव पहुंचे तो शिवचरन प्रजापति से भेंट हो गई। वह घर के दरवाजे सिर पर हाथ रखे बैठा कुछ सोच विचार में था। बाइक रोकते ही तपाक से बोला बतावा भईया का बात ही, जैसे ही कहा कि फसल बर्बादी की जानकारी लेने आए है। कहने लगा भइया दैव तो जऊन करत है वा तौ ठीक है, हमका तौ मड़ई हैरान करे है। कुरेदने पर कहता है कि दो एकड़ खेत का पट्टा उसे 30 साल पहले मिला था। तबसे वह कृषि कार्य करता चला आ रहा है। लेकिन पिछले साल सिकरी और धर्मपुर गांव को मिलाने के लिए बनाया गया संपर्क मार्ग में उसका एक बीघा पट्टा चला गया है। अधिकारियों से शिकायतें कीं लेकिन आज तक पट्टा नापा नहीं गया है। तीन बच्चे है, खर्च कैसे चलता है पूछने पर मकान के बाहर बंधी भैंस की ओर इशारा करते हुए बताया कि लाला हमका या आय जियाये है। येसेे जौन दूध और घी निकरत है वही का बेच लेत हन। कंडा भी बिक जात हैं। कहता है जहां कहूं काम लाग जात है मेहनत मजदूरी कर लेत हौं।
फसल बर्बादी के साथ बेटी की शादी की चिंता
गांव के रामफल कुशवाहा की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। एक बेटी वंदना को बीए तक शिक्षा दिला चुका है। उसकी शादी तय कर चुका है। बताता है कि 10 बीघे जमीन है। पांच बीघे में गेहूं व साढ़े तीन बीघे में चना और डेढ़ बीघे में अरहर बोई है। बरसात से फसल बेकार हो चुकी है। बिटिया की शादी एक मई को कानपुर में तय है एक तरफ शादी की तैयारी तो दूसरी तरफ फसल की कटाई मड़ाई की चिंता सता रही है। शादी के लिए डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लेने के लिए ओबीसी बैंक पौथिया में खसरा खतौनी जमा कर चुका है। नोड्यूज बनवाने के लिए दौड़ लगा रहा है। वहीं नाते रिश्तेदारों से संपर्क कर रहा है ताकि शादी का ठीक-ठाक इंतजाम हो सके। किसान ने कहा कि बीते दिसंबर में उसने लहलहाती फसल देखकर शादी करने की ठान ली। लेकिन अब तो स्थिति बदतर हो गई है।
बैंक का कैसे अदा करें कर्जा
गांव के अंदर बस्ती में घुसते ही हाथ में हंसिया लेकर खेत में फसल की कटाई करने जा रहा गंगाचरन मिला। बदन में फटा कुर्ता पहने इस किसान की हालत देख लगा की इसकी माली हालत कुछ अच्छी नहीं है। पूछने पर उसने बताया कि वह 16 बीघे जमीन का काश्तकार है। चार लड़के दो बेटियों का परिवार है। दोनो बेटियों की शादी किए पांच साल हो गए हैं। इन दोनों शादियों में रिश्तेदारों और साहूकारों से कर्ज लिया। जिसे चुकता करने के लिए 2011 में एक लाख रुपये का बैंक से केसीसी लिया। 2012 में इधर उधर से जुगाड़ कर बैंक का कर्ज जमा करते ही निकाल लिया। इधर दो साल से फसलें धोखा दे रही हैं इतनी कम पैदावार हो रही है कि वह बैंक का ब्याज भी नहीं भर पा रहा है। कहता है कि कांग्रेस ने जैसे कई साल पहले किसानों का कर्ज माफ कर दिया था इसी तरह सरकार कोई स्क ीम निकाले तभी उसकी गाड़ी पटरी पर आएगी।