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अरहर में नहीं आईं फलियां
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
Updated Sun, 19 Apr 2015 12:16 AM IST
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प्राकृतिक आपदा से तबाह किसानों की दास्तां दिल दहला देने वाली है। फफक-फफक
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कर जब किसान अपने दु:ख बयां करते हैं तो रौंगटे खडे़ हो जाते हैं। किसी को
बेटी के हाथ पीले करने की चिंता खाए जा रही है, तो कोई साल भर के भरण पोषण
व कर्ज चुकाने को परेशान हैं। किसी को कैंसर जैसी बीमारी के वज्रपात से भी
जूझना है। क्षेत्र के धौहल गांव के किसानों की बदकिस्मती की हकीकत पेश
करते हैं हमारे संवाददाता
मई में कैसे निपटेगी बहन की शादी
गांव का 25 वर्षीय किसान आशीष के पिता पांच साल पूर्व गुजर चुके हैं। आशीष अपनी दो बहनों में एक की शादी पिछले साल 50 हजार रुपये कर्ज लेकर की है। साथ ही छोटी बहन के हाथ 30 मई को पीले करने है। लेकिन प्राकृतिक आपदा ने बर्बाद कर दिया। नम आंखों से आशीष ने बताया कि उसके व उसकी मां किरन के नाम डेढ़-डेढ़ एकड़ जमीन है। उसने ढाई एकड़ में चना बोया था, जो आज भी खेत में खड़ा है। मजदूरी से भी कम चना निकलने के कारण कटाई नहीं करवा पाए। मजदूर बटाई पर भी काटने को तैयार नहीं हैं। उसके पास नगद मजदूरी देकर कटाई कराने के लिए रुपये भी नहीं हैं।
तबाही का ऐसा मंजर जीवन में पहली बार देखा
धौहल गांव निवासी राजबहादुर (50) ने कहा है कि फसलों की तबाही का ऐसा मंजर जीवन में पहली बार देखा है। चना व मटर की फसल पहले ही 80 फीसदी से अधिक नष्ट हो चुकी है। सात बीघे में अरहर बोई थी, उसमें न तो फूल आया और न ही फल। उसने खेतों की ओर जाना ही छोड़ दिया है। फसल अन्ना जानवर चर रहे हैं। उसे समझ में नहीं आ रहा कि इस साल कैसे गुजारा होगा। परिवार में दो बेटे और पत्नी है। बेटों की पढ़ाई भी हो पाना संभव नहीं है। अपनी दास्तां किसे सुनाए कुछ समझ नहीं आ रहा है, आर्थिक सहायता किसी काम की नहीं है। सबसे ज्यादा समस्या जानवरों की है, कि उनके लिए भूसा कहां से लाएंगे।
अरहर की फसल में नहीं दे रहे मुआवजा
गंाव निवासी कैलाश नारायाण (60) बताते हैं कि वह बड़े किसान हैं। उनकी सात बेटियां और एक बेटा है। पांच बेटियों की शादी कर चुके हैं, दो की और करनी है। 2 लाख का केसीसी से बैंक का कर्ज लिए हैं। चना व मटर पहले ही नष्ट हो गया था। अब गेहूं से भी उम्मीद खत्म हो गई है। आठ बीघे का गेहूं बारिश से गीला हो गया था, जो अभी भी सूख नहीं पाया है। सात बीघे की अरहर बिना फलियों के खड़ी है। जिन पर अब जानवर चर रहे हैं। उनका कहना है कि अरहर पर तो मुआवजा भी नहीं मिल रहा है। इस साल रोटी व दाल पर भारी संकट है।
बेटे को कैंसर है, कैसे कराएं इलाज
65 वर्षीय राजेंद्र द्विवेदी की दास्तां और भी दर्दभरी है। उन्होंने बताया कि उनके चार बेटे हैं। मंझले बेटे राजू को कैंसर है। जिसके इलाज पर वह पांच लाख से अधिक रुपये खर्च कर चुके हैं। बैंक का करीब पौने दो लाख रुपये का कर्ज है तथा 2.70 लाख रुपये नाते रिश्तेदारों का है। इस साल बहुत उम्मीद थी। इन सब पर पानी फिर गया है। उसने नम आंखों से बताया कि जिसका जवान बेटा कैंसर से जूझ रहा हो, उसके दिल पर क्या गुजर रही होगी। वैसे गुजर बसर के लिए हर लड़के को दो-दो एकड़ जमीन दी है। जिससे साल भर का गुजारा हो जाता था। लेकिन अब उनके बेटे मेहनत मजदूरी के लिए बाहर जाने की ठान चुके हैं और कोई चारा भी नजर नहीं आ रहा है।
मई में कैसे निपटेगी बहन की शादी
गांव का 25 वर्षीय किसान आशीष के पिता पांच साल पूर्व गुजर चुके हैं। आशीष अपनी दो बहनों में एक की शादी पिछले साल 50 हजार रुपये कर्ज लेकर की है। साथ ही छोटी बहन के हाथ 30 मई को पीले करने है। लेकिन प्राकृतिक आपदा ने बर्बाद कर दिया। नम आंखों से आशीष ने बताया कि उसके व उसकी मां किरन के नाम डेढ़-डेढ़ एकड़ जमीन है। उसने ढाई एकड़ में चना बोया था, जो आज भी खेत में खड़ा है। मजदूरी से भी कम चना निकलने के कारण कटाई नहीं करवा पाए। मजदूर बटाई पर भी काटने को तैयार नहीं हैं। उसके पास नगद मजदूरी देकर कटाई कराने के लिए रुपये भी नहीं हैं।
तबाही का ऐसा मंजर जीवन में पहली बार देखा
धौहल गांव निवासी राजबहादुर (50) ने कहा है कि फसलों की तबाही का ऐसा मंजर जीवन में पहली बार देखा है। चना व मटर की फसल पहले ही 80 फीसदी से अधिक नष्ट हो चुकी है। सात बीघे में अरहर बोई थी, उसमें न तो फूल आया और न ही फल। उसने खेतों की ओर जाना ही छोड़ दिया है। फसल अन्ना जानवर चर रहे हैं। उसे समझ में नहीं आ रहा कि इस साल कैसे गुजारा होगा। परिवार में दो बेटे और पत्नी है। बेटों की पढ़ाई भी हो पाना संभव नहीं है। अपनी दास्तां किसे सुनाए कुछ समझ नहीं आ रहा है, आर्थिक सहायता किसी काम की नहीं है। सबसे ज्यादा समस्या जानवरों की है, कि उनके लिए भूसा कहां से लाएंगे।
अरहर की फसल में नहीं दे रहे मुआवजा
गंाव निवासी कैलाश नारायाण (60) बताते हैं कि वह बड़े किसान हैं। उनकी सात बेटियां और एक बेटा है। पांच बेटियों की शादी कर चुके हैं, दो की और करनी है। 2 लाख का केसीसी से बैंक का कर्ज लिए हैं। चना व मटर पहले ही नष्ट हो गया था। अब गेहूं से भी उम्मीद खत्म हो गई है। आठ बीघे का गेहूं बारिश से गीला हो गया था, जो अभी भी सूख नहीं पाया है। सात बीघे की अरहर बिना फलियों के खड़ी है। जिन पर अब जानवर चर रहे हैं। उनका कहना है कि अरहर पर तो मुआवजा भी नहीं मिल रहा है। इस साल रोटी व दाल पर भारी संकट है।
बेटे को कैंसर है, कैसे कराएं इलाज
65 वर्षीय राजेंद्र द्विवेदी की दास्तां और भी दर्दभरी है। उन्होंने बताया कि उनके चार बेटे हैं। मंझले बेटे राजू को कैंसर है। जिसके इलाज पर वह पांच लाख से अधिक रुपये खर्च कर चुके हैं। बैंक का करीब पौने दो लाख रुपये का कर्ज है तथा 2.70 लाख रुपये नाते रिश्तेदारों का है। इस साल बहुत उम्मीद थी। इन सब पर पानी फिर गया है। उसने नम आंखों से बताया कि जिसका जवान बेटा कैंसर से जूझ रहा हो, उसके दिल पर क्या गुजर रही होगी। वैसे गुजर बसर के लिए हर लड़के को दो-दो एकड़ जमीन दी है। जिससे साल भर का गुजारा हो जाता था। लेकिन अब उनके बेटे मेहनत मजदूरी के लिए बाहर जाने की ठान चुके हैं और कोई चारा भी नजर नहीं आ रहा है।