{"_id":"627aab1684fe3459e0316e97","slug":"172-acres-of-land-missing-in-47-years-hamirpur-news-knp6960568190","type":"story","status":"publish","title_hn":"47 साल में 172 एकड़ जमीन हुई लापता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
47 साल में 172 एकड़ जमीन हुई लापता
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भरुआ सुमेरपुर (हमीरपुर)। क्षेत्र के अतरैया गांव में 1975 में हुई चकबंदी के बाद नये चकों पर काश्तकार काबिज हो गए। इस दौरान 198 एकड़ जमीन ग्राम समाज के लिए छोड़ी गई थी, लेकिन 47 साल बाद यह जमीन 26 एकड़ रह गई है। 172 एकड़ जमीन लापता हो गई। वर्तमान प्रधान व पूर्व प्रधान ने जमीन की पैमाइश कराकर कब्जा धारकों को ग्राम समाज की जमीन से हटाए जाने की मांग मुख्यमंत्री से की है।
पूर्व प्रधान अरुण सिंह ने बताया कि गांव में वर्ष 1972 में चकबंदी शुरू हुई थी। जिसमें गोसवारा में सार्वजनिक भूमि 198 एकड़ दर्शाई गई थी। जिसमें एक ही जगह पर 153 व 16 एकड़ जमीन जंगल, जलाशय के नाम से सुरक्षित की गई थी। शेष जमीन मरघट, होलिका दहन, कुम्हारी मिट्टी, अस्पताल, खलिहान, सेक्टर चकरोड, तालाब, नवीन परती आदि के लिए सुरक्षित थी।
47 साल में जितने भी प्रधान निर्वाचित हुए सभी चकबंदी विभाग व उच्चाधिकारियों से समय-समय पर जमीन की पैमाइश कराने की मांग करते रहे हैं। उनकी याचिका पर उच्च न्यायालय ने चकबंदी विभाग को आदेशित किया था कि गांव की समस्या का छह माह में निस्तारण कर कोर्ट को अवगत कराया जाए। लेकिन समस्या बरकार है। 172 एकड़ जमीन का कोई पता नहीं है।
विज्ञापन
चकबंदी अधिकारी विमल कुमार ने बताया कि जब चकबंदी हुई थी उस समय सिर्फ एक प्रतिशत कटौती की गई थी। जबकि अमूमन तीन से चार प्रतिशत की कटौती कर सार्वजनिक हित की जमीन निकाली जाती है। मामला संज्ञान में है। भूमि प्रबंध समिति की बैठक करके मामले को हल किया जाएगा।
विज्ञापन
पूर्व प्रधान अरुण सिंह ने बताया कि गांव में वर्ष 1972 में चकबंदी शुरू हुई थी। जिसमें गोसवारा में सार्वजनिक भूमि 198 एकड़ दर्शाई गई थी। जिसमें एक ही जगह पर 153 व 16 एकड़ जमीन जंगल, जलाशय के नाम से सुरक्षित की गई थी। शेष जमीन मरघट, होलिका दहन, कुम्हारी मिट्टी, अस्पताल, खलिहान, सेक्टर चकरोड, तालाब, नवीन परती आदि के लिए सुरक्षित थी।
विज्ञापन
47 साल में जितने भी प्रधान निर्वाचित हुए सभी चकबंदी विभाग व उच्चाधिकारियों से समय-समय पर जमीन की पैमाइश कराने की मांग करते रहे हैं। उनकी याचिका पर उच्च न्यायालय ने चकबंदी विभाग को आदेशित किया था कि गांव की समस्या का छह माह में निस्तारण कर कोर्ट को अवगत कराया जाए। लेकिन समस्या बरकार है। 172 एकड़ जमीन का कोई पता नहीं है।
विज्ञापन
चकबंदी अधिकारी विमल कुमार ने बताया कि जब चकबंदी हुई थी उस समय सिर्फ एक प्रतिशत कटौती की गई थी। जबकि अमूमन तीन से चार प्रतिशत की कटौती कर सार्वजनिक हित की जमीन निकाली जाती है। मामला संज्ञान में है। भूमि प्रबंध समिति की बैठक करके मामले को हल किया जाएगा।