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माटी की खुशबू पूरी दुनिया में बिखेरता धाकड़ पहलवान
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शिक्षक दिवस वाली खबर में - कुश्ती कोच चंद्र विजय सिंह।
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माटी की खुशबू पूरी दुनिया में बिखेरता धाकड़ पहलवान
गोरखपुर। चाहे कॉमनवेल्थ गेम्स हो, ओलंपिक या एशियन गेम्स भारतीय पहलवान लगातार देश के साथ साथ विदेशों में भी अपनी धाकड़ पहलवानी का जलवा बिखेर रहे हैं। गले में पदक लटकाए जब ये पहलवान तिरंगे को सलामी दे रहे होते हैं, उस समय इन्हें प्रशिक्षण देने वाले कोच का सीना भी गर्व से फूल जाता है। शिक्षक दिवस के मौके पर ऐसे ही एक अंतरराष्ट्रीय पहलवान और कोच चंद्रविजय सिंह से हम आपकी मुलाकात करवा रहे हैं।
2011 से लगातार भारतीय कुश्ती टीम में द्रोणाचार्य की भूमिका निभा रहे कोच चंद्रविजय ने देश को कई अर्जुन दिए हैं। जकार्ता में आयोजित एशियन गेम्स में बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट ने गोल्ड मेडल और दिव्या काकरन ने कांस्य पदक हासिल कर देश का नाम रोशन किया है। चंद्रविजय को कुश्ती विरासत में अपने पिता आर्मी के जवान और पहलवान हरेंद्र सिंह और चाचा गिरिजा शंकर से मिली है। मूलरूप सेे बड़हलगंज के डेरवा निवासी चंद्रविजय की प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई। उसके बाद वीर बहादुर सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज के 1989 प्रथम बैच के छात्र रहे। 1994 मेें मेरठ स्पोर्ट्स कॉलेज से बीए की पढ़ाई पूरी करने साथ ही तमाम कुश्ती प्रतियोगिताओं में पदक हासिल किए। इस दौरान पूर्वोत्तर रेलवे में टीसी की नौकरी मिली, मेहनत को तवज्जोे मिली तो 1995 से लेकर 2000 तक तमाम सीनियर और जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश के लिए पदक हासिल किए। दूसरी पारी की शुरूआत 2011 से हुई जो आज तक जारी है।
::: कजाखिस्तान में भारतीय टीम के साथ हैं चंद्रविजय
भारतीय कुश्ती टीम के कोच और पूर्वोत्तर रेलवे के क्रीड़ाधिकारी चंद्रविजय सिंह फिलहाल कजाखिस्तान में आयोजित सीनियर विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने वाली भारतीय कुश्ती टीम के साथ बतौर कोच 30 अगस्त को कजाखिस्तान गए हैं। 14 से 22 सितंबर तक होने वाली इस प्रतियोगिता में फ्रीस्टाइल वर्ग में 10, ग्रीकोरोमन में 10 और महिला वर्ग में 10 पहलवान हिस्सा लेंगे। भारतीय दल में पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर के मनीष 60 किलोग्राम ग्रीकोरोमन वर्ग में भाग लेंगे। प्रतियोगिता में पहले छह स्थान पर आने वाले पहलवान टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए क्वालीफाई करेंगे।
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ग्राउंड न सुविधाएं, फिर भी बिखेर रहे चमक
0 राज्य स्तरीय स्कूली स्केटिंग प्रतियोगिताओं में पिछले चार साल से गोरखपुर का कब्जा
0 बेलगांव में आयोजित नेशनल प्रतियोगिताओं में यूपी की टीम में गोरखपुर के सात खिलाड़ी
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। राज्य स्तरीय स्कूली स्केटिंग प्रतियोगिताओं में पिछले साल से ओवर आल चैंपियन के खिताब पर कब्जे के अलावा व्यक्तिगत स्पर्धा की अंडर-14, अंडर-17 और अंडर-19 वर्ग में पदकों की झड़ी। बार बार नेशनल स्कूली प्रतियोगिताओं में यूपी टीम से चयन। ये उपलब्धियां हैं गोरखपुर की स्केटिंग टीम की। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अक्सर थक कर हार मानने वाले लोगों के लिए शहर के स्केटिंग खिलाड़ियों की टीम और उनके कोच केके जायसवाल एक नजीर हैं। इन खिलाड़ियों ने ग्राउंड और सुविधाएं न होने का रोना रोने के बजाय, खुद के विकसित विकल्पों में ही सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पूरे प्रदेश में शहर का नाम रोशन किया है।
अगर इन्हें थोड़ी सुविधाएं मिल जाएं, तो शहर के ये लाल नेशनल प्रतियोगिताओं में पूर्वांचल का नाम पूरे देश में रोशन कर सकते हैं। इस सफर की शुरूआत सात साल पहले प्रदेश सरकार की ओर से राज्य स्तरीय स्कूली प्रतियोगिताओं में स्केटिंग को शामिल कर की गई। पहले साल स्केटिंग के जिला स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजन की जिम्मेदारी डीएवी इंटर कॉलेज के क्रीड़ाधिकारी केके जायसवाल को मिली। उन्होंने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया, कई विद्यार्थियों को इस खेल में शामिल होने के लिए तैयार किया, मगर महंगे स्केटिंग शू समेत आवश्यक उपकरणों के चलते तैयारी प्रभावित हुई। लेकिन केके जायसवाल ने हार मानने के बजाय दूसरे साल चार खिलाड़ियों को लेकर बनारस में आयोजित राज्य स्तरीय स्केटिंग प्रतियोगिताओं में ले गए। बनारस में खिलाड़ियों ने तीन पदक जीते तो थोड़ा हौसला बढ़ा। बस फिर क्या था, तब से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। हर साल राज्य स्तरीय स्केटिंग प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर, नेशनल प्रतियोगिताओं में चयनित किए जाने वाले खिलाड़ियों की संख्या बढ़ रही है।
नौका विहार रोड पर प्रैक्टिस, कई बार होते हैं चुटहिल
पूरे प्रदेश में स्केटिंग का कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का ग्राउंड नहीं हैं। मजबूरी में स्केटिंग के ये उदीयमान खिलाड़ी सर्किट हाउस रोड पर रोज सुबह प्रैक्टिस करते हुए देखे जा सकते हैं। कई बार सड़क पर प्रैक्टिस के दौरान गड्ढे, या पत्थर के टुकड़े स्केटिंग शू में अटकने की वजह से खिलाड़ी चुटहिल भी हो जाते हैं। इससे उनकी प्रैक्टिस प्रभावित होने के साथ ही, स्केटिंग के महंगे शू भी खराब हो जाते हैं।
डेढ़ लाख तक के हैं स्केटिंग शूज
कोच निखिल सिंह राठौर ने बताया कि स्केटिंग प्रतियोगिता के लिए आने वाले उपकरण बेहद महंगे हैं। ये 10 हजार से शुरू होकर डेढ़ लाख तक की रेंज के होतेे हैं। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों को कम से कम 40 हजार से ऊपर वाले स्केटिंग शूज के साथ अन्य उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ता है।
नेशनल में सात खिलाड़ियों का चयन
कर्नाटक के बेलगांव में 26-29 अक्तूबर तक आयोजित राष्ट्रीय स्कूली स्केटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए यूपी टीम में गोरखपुर के सात खिलाड़ियों का चयन हुआ है। इन खिलाड़ियों ने सत्र 2018-19 में आगरा में आयोजित राज्य स्तरीय स्कूली प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल कर गोरखपुर का नाम रोशन किया है। उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर आदर्श ,वैभव, सन्नी, दर्शन, अमन, शुभम और सुमित का चयन नेशनल प्रतियोगिताओं के लिए हुआ है।
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स्कूल आने से कतराने वालों को सैनिक स्कूल पहुंचाया
- शिक्षक धर्मेंद्र चौधरी प्राथमिक विद्यालय लौकीहवां की तस्वीर बदलकर गढ़ रहे बच्चों की तकदीर
- अच्छी शिक्षा के साथ दी प्रेरणा तो सैनिक स्कूल के एडमिशन टेस्ट में सफल हुए छह मेधावी
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। परिषदीय विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का रोना रोने वाले शिक्षकों के लिए धर्मेंद्र चौधरी एक नजीर हैं। जिस गांव में अज्ञानता का अंधकार फैला था, वहीं के प्राइमरी स्कूल में धर्मेंद्र शिक्षा का उजाला बिखेर रहे हैं। उनकी मेहनत ही है कि पिछड़े इलाके के साधन विहीन विद्यालय के अब तक 16 विद्यार्थी सैनिक स्कूल, नवोदय, आश्रम पद्धति, विद्या ज्ञान स्कूल में प्रवेश करा चुके हैं।
कैंपियरगंज के प्राथमिक विद्यालय लौकीहवां में 2008 में प्रधानाध्यापक के रूप में धमेंद्र ने चार्ज संभाला। उस समय अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहते थे। जो भेजते थे वो कान्वेंट स्कूलों को बेहतर मानते थे। संतोषजनक परिणाम नहीं निकलने पर मन में ललक हुई की कुछ ऐसा करें, जिससे अभिभावक खुद बच्चों को विद्यालय तक लेकर आएं। बस फिर क्या था, 2012 में सहायक अध्यापक वीर बहादुर सहानी के साथ मिलकर कुछ होनहारों को स्कूल में नियमित पढ़ाई से अलग भी पढ़ाना शुरू किया। खास बात थी कि उन्हें कॉपी और किताब भी शिक्षकों ने अपने जेब से ही मुहैया कराई। कड़ी मेहनत का फल भी अच्छा रहा। दोनों नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूल और विद्या ज्ञान स्कूल की प्रवेश परीक्षाओं में एक साथ सफल हुए। मेहनत का बेहतर परिणाम मिला तो अगले वर्ष विद्यार्थियों की संख्या को बढ़ाया। 2014-15 में दो आश्रम पद्धति और एक बच्चे को विद्या ज्ञान स्कूल में प्रवेश मिला। उसके बाद से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है।
:: किस वर्ष में कहां मिला प्रवेश
2014-15- दो विद्यार्थी- एक सैनिक स्कूल, दूसरा विद्या ज्ञान स्कूल
2015-16- तीन विद्यार्थी- दो नवोदय विद्यालय, एक विद्या ज्ञान स्कूल
2017-18- तीन- आश्रम पद्धति के विद्यालय
2018-19- आठ- सैनिक स्कूल
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गोरखपुर। चाहे कॉमनवेल्थ गेम्स हो, ओलंपिक या एशियन गेम्स भारतीय पहलवान लगातार देश के साथ साथ विदेशों में भी अपनी धाकड़ पहलवानी का जलवा बिखेर रहे हैं। गले में पदक लटकाए जब ये पहलवान तिरंगे को सलामी दे रहे होते हैं, उस समय इन्हें प्रशिक्षण देने वाले कोच का सीना भी गर्व से फूल जाता है। शिक्षक दिवस के मौके पर ऐसे ही एक अंतरराष्ट्रीय पहलवान और कोच चंद्रविजय सिंह से हम आपकी मुलाकात करवा रहे हैं।
2011 से लगातार भारतीय कुश्ती टीम में द्रोणाचार्य की भूमिका निभा रहे कोच चंद्रविजय ने देश को कई अर्जुन दिए हैं। जकार्ता में आयोजित एशियन गेम्स में बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट ने गोल्ड मेडल और दिव्या काकरन ने कांस्य पदक हासिल कर देश का नाम रोशन किया है। चंद्रविजय को कुश्ती विरासत में अपने पिता आर्मी के जवान और पहलवान हरेंद्र सिंह और चाचा गिरिजा शंकर से मिली है। मूलरूप सेे बड़हलगंज के डेरवा निवासी चंद्रविजय की प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई। उसके बाद वीर बहादुर सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज के 1989 प्रथम बैच के छात्र रहे। 1994 मेें मेरठ स्पोर्ट्स कॉलेज से बीए की पढ़ाई पूरी करने साथ ही तमाम कुश्ती प्रतियोगिताओं में पदक हासिल किए। इस दौरान पूर्वोत्तर रेलवे में टीसी की नौकरी मिली, मेहनत को तवज्जोे मिली तो 1995 से लेकर 2000 तक तमाम सीनियर और जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश के लिए पदक हासिल किए। दूसरी पारी की शुरूआत 2011 से हुई जो आज तक जारी है।
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::: कजाखिस्तान में भारतीय टीम के साथ हैं चंद्रविजय
भारतीय कुश्ती टीम के कोच और पूर्वोत्तर रेलवे के क्रीड़ाधिकारी चंद्रविजय सिंह फिलहाल कजाखिस्तान में आयोजित सीनियर विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने वाली भारतीय कुश्ती टीम के साथ बतौर कोच 30 अगस्त को कजाखिस्तान गए हैं। 14 से 22 सितंबर तक होने वाली इस प्रतियोगिता में फ्रीस्टाइल वर्ग में 10, ग्रीकोरोमन में 10 और महिला वर्ग में 10 पहलवान हिस्सा लेंगे। भारतीय दल में पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर के मनीष 60 किलोग्राम ग्रीकोरोमन वर्ग में भाग लेंगे। प्रतियोगिता में पहले छह स्थान पर आने वाले पहलवान टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए क्वालीफाई करेंगे।
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ग्राउंड न सुविधाएं, फिर भी बिखेर रहे चमक
0 राज्य स्तरीय स्कूली स्केटिंग प्रतियोगिताओं में पिछले चार साल से गोरखपुर का कब्जा
0 बेलगांव में आयोजित नेशनल प्रतियोगिताओं में यूपी की टीम में गोरखपुर के सात खिलाड़ी
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। राज्य स्तरीय स्कूली स्केटिंग प्रतियोगिताओं में पिछले साल से ओवर आल चैंपियन के खिताब पर कब्जे के अलावा व्यक्तिगत स्पर्धा की अंडर-14, अंडर-17 और अंडर-19 वर्ग में पदकों की झड़ी। बार बार नेशनल स्कूली प्रतियोगिताओं में यूपी टीम से चयन। ये उपलब्धियां हैं गोरखपुर की स्केटिंग टीम की। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अक्सर थक कर हार मानने वाले लोगों के लिए शहर के स्केटिंग खिलाड़ियों की टीम और उनके कोच केके जायसवाल एक नजीर हैं। इन खिलाड़ियों ने ग्राउंड और सुविधाएं न होने का रोना रोने के बजाय, खुद के विकसित विकल्पों में ही सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पूरे प्रदेश में शहर का नाम रोशन किया है।
अगर इन्हें थोड़ी सुविधाएं मिल जाएं, तो शहर के ये लाल नेशनल प्रतियोगिताओं में पूर्वांचल का नाम पूरे देश में रोशन कर सकते हैं। इस सफर की शुरूआत सात साल पहले प्रदेश सरकार की ओर से राज्य स्तरीय स्कूली प्रतियोगिताओं में स्केटिंग को शामिल कर की गई। पहले साल स्केटिंग के जिला स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजन की जिम्मेदारी डीएवी इंटर कॉलेज के क्रीड़ाधिकारी केके जायसवाल को मिली। उन्होंने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया, कई विद्यार्थियों को इस खेल में शामिल होने के लिए तैयार किया, मगर महंगे स्केटिंग शू समेत आवश्यक उपकरणों के चलते तैयारी प्रभावित हुई। लेकिन केके जायसवाल ने हार मानने के बजाय दूसरे साल चार खिलाड़ियों को लेकर बनारस में आयोजित राज्य स्तरीय स्केटिंग प्रतियोगिताओं में ले गए। बनारस में खिलाड़ियों ने तीन पदक जीते तो थोड़ा हौसला बढ़ा। बस फिर क्या था, तब से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। हर साल राज्य स्तरीय स्केटिंग प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर, नेशनल प्रतियोगिताओं में चयनित किए जाने वाले खिलाड़ियों की संख्या बढ़ रही है।
नौका विहार रोड पर प्रैक्टिस, कई बार होते हैं चुटहिल
पूरे प्रदेश में स्केटिंग का कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का ग्राउंड नहीं हैं। मजबूरी में स्केटिंग के ये उदीयमान खिलाड़ी सर्किट हाउस रोड पर रोज सुबह प्रैक्टिस करते हुए देखे जा सकते हैं। कई बार सड़क पर प्रैक्टिस के दौरान गड्ढे, या पत्थर के टुकड़े स्केटिंग शू में अटकने की वजह से खिलाड़ी चुटहिल भी हो जाते हैं। इससे उनकी प्रैक्टिस प्रभावित होने के साथ ही, स्केटिंग के महंगे शू भी खराब हो जाते हैं।
डेढ़ लाख तक के हैं स्केटिंग शूज
कोच निखिल सिंह राठौर ने बताया कि स्केटिंग प्रतियोगिता के लिए आने वाले उपकरण बेहद महंगे हैं। ये 10 हजार से शुरू होकर डेढ़ लाख तक की रेंज के होतेे हैं। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों को कम से कम 40 हजार से ऊपर वाले स्केटिंग शूज के साथ अन्य उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ता है।
नेशनल में सात खिलाड़ियों का चयन
कर्नाटक के बेलगांव में 26-29 अक्तूबर तक आयोजित राष्ट्रीय स्कूली स्केटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए यूपी टीम में गोरखपुर के सात खिलाड़ियों का चयन हुआ है। इन खिलाड़ियों ने सत्र 2018-19 में आगरा में आयोजित राज्य स्तरीय स्कूली प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल कर गोरखपुर का नाम रोशन किया है। उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर आदर्श ,वैभव, सन्नी, दर्शन, अमन, शुभम और सुमित का चयन नेशनल प्रतियोगिताओं के लिए हुआ है।
(3)
स्कूल आने से कतराने वालों को सैनिक स्कूल पहुंचाया
- शिक्षक धर्मेंद्र चौधरी प्राथमिक विद्यालय लौकीहवां की तस्वीर बदलकर गढ़ रहे बच्चों की तकदीर
- अच्छी शिक्षा के साथ दी प्रेरणा तो सैनिक स्कूल के एडमिशन टेस्ट में सफल हुए छह मेधावी
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। परिषदीय विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का रोना रोने वाले शिक्षकों के लिए धर्मेंद्र चौधरी एक नजीर हैं। जिस गांव में अज्ञानता का अंधकार फैला था, वहीं के प्राइमरी स्कूल में धर्मेंद्र शिक्षा का उजाला बिखेर रहे हैं। उनकी मेहनत ही है कि पिछड़े इलाके के साधन विहीन विद्यालय के अब तक 16 विद्यार्थी सैनिक स्कूल, नवोदय, आश्रम पद्धति, विद्या ज्ञान स्कूल में प्रवेश करा चुके हैं।
कैंपियरगंज के प्राथमिक विद्यालय लौकीहवां में 2008 में प्रधानाध्यापक के रूप में धमेंद्र ने चार्ज संभाला। उस समय अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहते थे। जो भेजते थे वो कान्वेंट स्कूलों को बेहतर मानते थे। संतोषजनक परिणाम नहीं निकलने पर मन में ललक हुई की कुछ ऐसा करें, जिससे अभिभावक खुद बच्चों को विद्यालय तक लेकर आएं। बस फिर क्या था, 2012 में सहायक अध्यापक वीर बहादुर सहानी के साथ मिलकर कुछ होनहारों को स्कूल में नियमित पढ़ाई से अलग भी पढ़ाना शुरू किया। खास बात थी कि उन्हें कॉपी और किताब भी शिक्षकों ने अपने जेब से ही मुहैया कराई। कड़ी मेहनत का फल भी अच्छा रहा। दोनों नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूल और विद्या ज्ञान स्कूल की प्रवेश परीक्षाओं में एक साथ सफल हुए। मेहनत का बेहतर परिणाम मिला तो अगले वर्ष विद्यार्थियों की संख्या को बढ़ाया। 2014-15 में दो आश्रम पद्धति और एक बच्चे को विद्या ज्ञान स्कूल में प्रवेश मिला। उसके बाद से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है।
:: किस वर्ष में कहां मिला प्रवेश
2014-15- दो विद्यार्थी- एक सैनिक स्कूल, दूसरा विद्या ज्ञान स्कूल
2015-16- तीन विद्यार्थी- दो नवोदय विद्यालय, एक विद्या ज्ञान स्कूल
2017-18- तीन- आश्रम पद्धति के विद्यालय
2018-19- आठ- सैनिक स्कूल