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सब्र पर भारी पड़ रहा अकीदत का हौसला 

Tue, 14 Jun 2016 12:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Updated Tue, 14 Jun 2016 12:58 AM IST
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child have their first fast in ramzan
रोजे के दौरान इफ्तारी करते रोजेदार - फोटो : amar ujala
रमजान में रोजा रखना यानी तमाम बुराइयों से परहेज करते हुए सब्र का इम्तिहान देना। लेकिन जब उसम भरी गर्मी के बीच यह कठिन इम्तिहान बड़े-बुजुर्गों के साथ-साथ बच्चे भी देने लगें तो उनके इस जज्बे को लेकर तमाम सवाल सभी के जेहन में उठने लगते हैं। कुछ ऐसे ही सवालों को लेकर ‘अमर उजाला’ ने कुछ नन्हें रोजेदारों से बातचीत की तो जो नजरिया उन्होंने बयां किया, उससे साफ लगा कि रोजे के सब्र पर इन नन्हों के अकीदत का हौसला भारी है। इनमें न केवल रोजे के लिए जिद और जुनून है बल्कि शौक भी। कुछ यूं रहा नन्हें रोजेदारों का नजरिया।
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इस बार नहीं चला किसी का बस
घर में सब रोजा रखते थे लेकिन जब भी मैं रोजे की बात करता तो कुछ डांटने लगते तो कुछ समझाने। पिछले रमजान में मैं मान गया लेकिन इस बार मैं किसी की सुनने को तैयार नहीं था। मदरसे की दुहाई देकर घर वालों ने रोका लेकिन जुमे के दिन उनका यह बस भी नहीं चला और मैंने रोजा रख ही लिया। लोग बस ऐसे ही कह रहे थे मुझे तो कोई मुश्किल ही नहीं आई। शाम को इफ्तार का आनंद अलग मिला।
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- हुजैफा नसीर (नौ साल),  कुंतीनगर कॉलोनी, गोरखनाथ

शिद्दत की प्यास का बहाना नहीं माना
पिछले दो साल से जब भी मैं रोजे की बात करता, लोग गर्मी के मौसम की दुहाई देकर मना कर देते। कहते- शिद्दत की प्यास को बर्दाश्त करना आसान नहीं। रोजा नहीं रखता था लेकिन इफ्तारी में जरूरत शिरकत करता। इस बार रमजान में घर के लोगों ने वही दलील दी, लेकिन इस बार मैं नहीं माना। लोगों का लगा कि अब रोकना ठीक नहीं सो इजाजत मिल गई और रोजे से हूं। कहीं कोई शिद्दत की प्यास नहीं है।
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- अली अख्तर (12 साल), काजीपुर कलां

किसी से कम नहीं है मेरी इबादत
जब से होश संभाला रोजा रखने की ख्वाहिश हो गई। मेरी उम्र काफी कम थी, सो अब्बू-अम्मी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे रोजे की इजाजत देने की, लेकिन इस बार मैंने उन्हें मना लिया। जब इजाजत मिली तो मैंने भी दिखा दिया है कि रमजान में मेरी इबादत किसी से कम नहीं। सबके साथ ही नमाज तिलावत करती हूं। अब तो मेरी बस अल्लाह से यही दुआ है कि मुझे अंतिम रमजान तक रोजा बख्शे।

- नाएमा बुशरा (11 साल), इलाहीबाग

परिवार साथ है तो फिर कैसी दिक्कत 
दस्तरखान पर शरबत के साथ लजीज व्यंजन देख किस बच्चे को रोजा रखने की ख्वाहिश नहीं होगी। मैंने भी सोच लिया कि इस बार हल हाल में रोजा रहूंगा। मेरी जिद के आगे परिवार वाले मान गए और रोजे के साथ इफ्तार में शामिल होने का हक मुझे भी मिल गया। इस भीषण गर्मी में साढ़े 15 घंटे के रोजे की वजह से पहले दिन तो लगा कि मुश्किल आएगी, लेकिन मां और बड़ी बहन के प्यार ने हौसला टूटने नहीं दिया।
- अली तारिक (10 साल), इस्माइलपुर
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