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अदब में कोई चोर रास्ता नहीं - प्रो. वसीम बरेलवी
आशुतोष मिश्र
Updated Sun, 22 Oct 2017 01:47 AM IST
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प्रो. वसीम बरेलवी
- फोटो : amar ujala
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गोरखपुर। ‘खुल के मिलने का स़लीका आपको आता नहीं और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं।’ 50 बरस से अदबी मंचों को अपने अशआर से तर करने वाले प्रो. वसीम बरेलवी ने तब और अब पर जो कहा उसे सुनकर उनका ये शेर याद आ गया। एक कार्यक्रम के सिलसिले में वो शनिवार को फिराक के शहर गोरखपुर में थे। इस मौके पर फिराक इंटरनेशनल अवार्ड से सम्मानित मशहूर शायर प्रो. वसीम बरेलवी अपने अंदाज में अदबी दुनिया की नई पीढ़ी को मुकाम पाने के लिए साधना और समर्पण की सीख दे गए। उन्होंने मंच के अतीत से लेकर वर्तमान पर तफसील से बात की।
प्रो. वसीम बरेलवी बोले, वक्त हमेशा एक सा नहीं होता। तकाजे बदलते रहते हैं। जिस तरह से तब और अब में समाजिक सरोकार के तकाजे बदले हैं उसी तरह से मंच में भी फर्क आया है। उस वक्त लोग जबान और बयान की खूबसूरती पर निगाह रखते थे। सुनने वाले इल्म़ी और अदबी होते थे।
उन्होंने अदबी साहित्य के बेहतर भविष्य की उम्मीद जताई। कहा, मुशायरों में हजार से डेढ़ हजार युवाओं की मौजूदगी बताती है कि अच्छी फजा बन रही है। बड़ी तादाद में युवाओं का जुटना बताता है कि नई नस्ल शायरी में खुद को पहचानने की कोशिश कर रही है, यह उम्मीद भरी बात है। जरूरत है कि वो इंटरनेट के साथ किताबें भी पढ़े।
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प्रो. बरेलवी बोले, तीन नस्लों ने मुझे सुना है। जिन नस्लों ने भी सुना उसी मोहब्बत से सुना। अगर वक्त के साथ आप पूरी ईमानदारी से शायरी कर रहे हैं तो कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। आज की नस्ल में जल्दबाजी है। नए कहने वाले जल्द वो मकाम हासिल करना चाहते हैं जो उन्हें प्रेरणा देने वालों का है। साहित्य, कला और अदब में कोई चोर रास्ता नहीं है। जरूरत है अदब का मुताअला करें। देखें बुजुर्गों का रास्ता क्या था? और बात खत्म होती है...
‘जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,
समंदरों ही के लहजे में बात करता है।’
उर्दू पर सरकारों के ध्यान न देने के सवाल पर बोले, हुकूमत की सरपरस्ती से कोई जबान नहीं चलती। ये कोई तालाब नहीं नदी है। जिस जबान में जिंदा रहने की ताकत होती है वो जीती है। अपने रचनाकारों के दम पर, अपने चाहने वालों के दम पर।
प्रो. वसीम बरेलवी बोले, वक्त हमेशा एक सा नहीं होता। तकाजे बदलते रहते हैं। जिस तरह से तब और अब में समाजिक सरोकार के तकाजे बदले हैं उसी तरह से मंच में भी फर्क आया है। उस वक्त लोग जबान और बयान की खूबसूरती पर निगाह रखते थे। सुनने वाले इल्म़ी और अदबी होते थे।
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उन्होंने अदबी साहित्य के बेहतर भविष्य की उम्मीद जताई। कहा, मुशायरों में हजार से डेढ़ हजार युवाओं की मौजूदगी बताती है कि अच्छी फजा बन रही है। बड़ी तादाद में युवाओं का जुटना बताता है कि नई नस्ल शायरी में खुद को पहचानने की कोशिश कर रही है, यह उम्मीद भरी बात है। जरूरत है कि वो इंटरनेट के साथ किताबें भी पढ़े।
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प्रो. बरेलवी बोले, तीन नस्लों ने मुझे सुना है। जिन नस्लों ने भी सुना उसी मोहब्बत से सुना। अगर वक्त के साथ आप पूरी ईमानदारी से शायरी कर रहे हैं तो कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। आज की नस्ल में जल्दबाजी है। नए कहने वाले जल्द वो मकाम हासिल करना चाहते हैं जो उन्हें प्रेरणा देने वालों का है। साहित्य, कला और अदब में कोई चोर रास्ता नहीं है। जरूरत है अदब का मुताअला करें। देखें बुजुर्गों का रास्ता क्या था? और बात खत्म होती है...
‘जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,
समंदरों ही के लहजे में बात करता है।’