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Gonda News: आजादी की पहली सुबह शहर से गांव तक था उल्लास
Thu, 14 Aug 2025 11:26 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Thu, 14 Aug 2025 11:26 PM IST
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करनैलगंज (गोंडा)। वह दौर ही दूसरा था। 15 अगस्त 1947 की सुबह हर कोई खुशी से चहक रहा था। बस एक ही गूंज थी कि हम आजाद हो गए। अब देश हमारा है। लोग गले मिलकर एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। हर चेहरा खुशी से चमक रहा था। लोग मिठाई बांट रहे थे। एक गांव से दूसरे गांव तक प्रभातफेरी निकाली गई थी। ये कहना है कि स्वतंत्रता दिवस के साक्षी वरिष्ठ नागरिकों का। पेश है रिपोर्ट...
कन्हैयालाल इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रवक्ता गणेश प्रसाद तिवारी (83) कहते हैं कि 15 अगस्त 1947 की सुबह कुछ खास थी। हर कोई खुशी से झूम रहा था। त्योहार जैसा माहौल था। गांव के बड़े बुजुर्ग से लेकर हर कोई उत्साह में था। वह जीवन का सबसे आनंदित करने वाला क्षण था।
पंडित शांतिलाल त्रिवेदी (88) का कहना है कि उन्होंने दस वर्ष की आयु में आजादी का आंदोलन देखा है। जब देश आजाद हुआ तो उस दिन कुछ और था ही नहीं। लगता था कि हमने सब कुछ पा लिया। हम आजाद हो गए, बस यही गूंज थी।
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पंडित तिलकराम तिवारी (84) का कहना है कि आजादी के समय में बाल्यकाल था। आज जिस गायत्री शक्तिपीठ मंदिर में हम पुजारी हैं वह स्थान अंग्रेजों की तहसील थी। आजादी के जश्न का वह आनंद किसी त्योहार, शादी या बड़े आयोजन में नहीं देखा। गांव-गांव प्रभातफेरी निकाली गई। लोग भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे।
सरदार अवतार सिंह (90) का कहना है कि जब आजादी के लिए आंदोलन चल रहा था तब वे सब पंजाब से करनैलगंज आए। उनके ताऊ, पिता, चाचा ने पंजाब में आंदोलन में भाग लिया। उनका कहना है कि आजादी मिलने के बाद जश्न में शामिल हुआ। उस तरह की देशभक्ति और खुशी आज तक नहीं देखी।
अंग्रेजी हुकूमत याद करके भर आईं आंखें
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम अचल द्विवेदी आचार्य (90) की आंखें ब्रिटिश हुकूमत को याद करके भर आईं। ग्राम पतिसा निवासी राम अचल ने बताया कि वे हिंदू महासभा की बैनर के तले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में चंदा वसूलने का काम करते थे। उसी समय सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत आंदोलनकारियों द्वारा की जा चुकी थी जिसमें उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी की लड़ाई में काफी कुछ संघर्ष किया। जेल तक गए। बताया कि देश की आजादी से बढ़कर कुछ नहीं था। उस लक्ष्य को हासिल करना ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
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कन्हैयालाल इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रवक्ता गणेश प्रसाद तिवारी (83) कहते हैं कि 15 अगस्त 1947 की सुबह कुछ खास थी। हर कोई खुशी से झूम रहा था। त्योहार जैसा माहौल था। गांव के बड़े बुजुर्ग से लेकर हर कोई उत्साह में था। वह जीवन का सबसे आनंदित करने वाला क्षण था।
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पंडित शांतिलाल त्रिवेदी (88) का कहना है कि उन्होंने दस वर्ष की आयु में आजादी का आंदोलन देखा है। जब देश आजाद हुआ तो उस दिन कुछ और था ही नहीं। लगता था कि हमने सब कुछ पा लिया। हम आजाद हो गए, बस यही गूंज थी।
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पंडित तिलकराम तिवारी (84) का कहना है कि आजादी के समय में बाल्यकाल था। आज जिस गायत्री शक्तिपीठ मंदिर में हम पुजारी हैं वह स्थान अंग्रेजों की तहसील थी। आजादी के जश्न का वह आनंद किसी त्योहार, शादी या बड़े आयोजन में नहीं देखा। गांव-गांव प्रभातफेरी निकाली गई। लोग भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे।
सरदार अवतार सिंह (90) का कहना है कि जब आजादी के लिए आंदोलन चल रहा था तब वे सब पंजाब से करनैलगंज आए। उनके ताऊ, पिता, चाचा ने पंजाब में आंदोलन में भाग लिया। उनका कहना है कि आजादी मिलने के बाद जश्न में शामिल हुआ। उस तरह की देशभक्ति और खुशी आज तक नहीं देखी।
अंग्रेजी हुकूमत याद करके भर आईं आंखें
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम अचल द्विवेदी आचार्य (90) की आंखें ब्रिटिश हुकूमत को याद करके भर आईं। ग्राम पतिसा निवासी राम अचल ने बताया कि वे हिंदू महासभा की बैनर के तले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में चंदा वसूलने का काम करते थे। उसी समय सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत आंदोलनकारियों द्वारा की जा चुकी थी जिसमें उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी की लड़ाई में काफी कुछ संघर्ष किया। जेल तक गए। बताया कि देश की आजादी से बढ़कर कुछ नहीं था। उस लक्ष्य को हासिल करना ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी।