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आजादी के मतवालों की आज भी है गूंज

Fri, 14 Aug 2020 10:00 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 14 Aug 2020 10:00 PM IST
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There is still an echo of freedom fighters today
गोंडा के जिगना स्थित राजा देबी बक्श सिंह के महल का बचा अवशेष। - फोटो : GONDA
गोंडा। जिले में स्वतंत्रता आंदोलन की धार को तेज करने वाले मतवालों के शौर्य से गांव की गलियां खिली हैं। गांवों के नाम उनके उन्हीं के नाम पर रखे गए लेकिन ऐसे आजादी के जंग के नायकों की याद में कोई प्रमुख स्थान नहीं बना। यहां तक अंग्रेजी के विरुद्ध आंदोलन की अलख जगाने और मुंहतोड़ जवाब देने वाले महराज देवी बख्श सिंह का जिगना स्थित महल के सिर्फ अवशेष बचे हैं। राजा ने अंग्रेजों के विरुद्ध लमती लोलपुर में सबसे लंबी लड़ाई लड़ी थी, राजपाठ गंवाने के बाद भी वह नहीं झुके और अंत में उन्हें नेपाल में शरण लेनी पड़ी। यहां पर उनके साथ अंग्रेजों के विरुद्ध जंग छेड़ने वाले जाबांज लोगों के लिए एक मिसाल हैं।
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जिले के वीरपुर विसेन गांव के गुलाब सिंह महराजा देवी बख्श सिंह के साथ अंतिम सांस तक रहे। लमती लोलपुर के युद्ध में उन्होंने अपनी जान को दांव पर रखकर राजा की मदद की, फिर उन्हीं के साथ नेपाल चले गए। वह भी लौटकर नहीं आए, लेकिन अंग्रेजों के सामने समर्पण नहीं किया। उनका जहां घर है उस पुरवे का नाम गुलाब सिंह पुरवा है। इसी तरह मझगवां के वीर सपूत भगवत सिंह राजा के अभिन्न साथी थे। लमती लोलपुर के मैदान में वह शहीद हो गए थे। उन्होंने देश के लिए जान दे दी और अंतिम सांस तक वह राजा के कदम से कदम मिलाकर चलते रहे। वीरपुर विसेन के अजय कुमार सिंह कहते हैं कि इन शहीदों की बातों से सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, लेकिन उनकी याद में कोई स्थान विकसित न होना चिंताजनक है। इसी तरह वह बताते हैं कि नवाबों की सेना के कैप्टन गजोधर पांडे सरैया गांव के रहने वाले थे। वह बेगम हजरत महल का पैगात लेकर राजा देवी बख्श सिंह के पास आए थे। लमती लोलपुर की लड़ाई में उनका योगदान रहा और वह सेतु का काम करते थे। बेलसर के डिडसिया कला गांव में मुठभेड़ में वह देश के लिए शहीद हो गए थे। इसी तरह सरैंया गांव के ही मेजर राम दयाल मिश्र, मुन्नू व जगन्नाथ मिश्र भी रेजीडेंसी की लड़ाई में शहीद हो गए थे। अनभुला गांव के शिवा सिंह भी लमती लोलपुर के युद्ध में शहीद हो गए थे और उनकी पत्नी भी उनके शव के साथ सती हो गई थीं। आज भी चौरा बुआ का स्थान है और नवविवाहिताएं वहां परिक्रमा करती हैं। धनौली गांव के काले खां, मशीयत खां, हुसैन खां तीनों सगे भाई ने राजा देवी बख्श सिंह के साथ लमती लोलपुर की लड़ाई में साथ दिया और देश के लिए कुर्बान हो गए।
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आजादी के रणबांकुरों की कहानी से गुलजार है गोनार्द की माटी
स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर का विद्रोह हुआ था। उनके साथ जिले के कई क्षेत्रों से क्रांतिकारी मुक्ति संग्राम में शामिल हुए। अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्जा करने के बाद बेगम हजरत महल की मदद के लिए राजा देवी बख्श सिंह के साथ 3000 सैनिकों ने रेजीडेंसी लखनऊ घेर लिया था। लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने जिन दस तालुकेदारों की सूची जारी की उनमें राजा देवी बख्श सिंह का नाम प्रमुख था। लमती लोलपुर के युद्ध में अंग्रेजी सेना के बड़े अफसर भी आठ महीने तक राजा की किलेबंदी नहीं तोड़ पाए। ओबरी बाराबंकी की लड़ाई में राजा देवी बख्श सिंह की तलवार से ब्रिटिश आर्मी चीफ कोलिन कैंम्पबेल बाल-बाल बचा था। लड़ाई जीतने के बाद ब्रिटेन की संसद में बरोन क्लाइड और आर्मी चीफ को फील्ड मार्शल की उपाधि मिली। लंदन के एक पार्क में महारानी विक्टोरिया के ऊपर भी आर्मी चीफ की प्रतिमा लगी है, वहीं अंग्रेजों से लोहा लेने वाले राजा देवी बख्श सिंह के महल एवं ऐतिहासिक इमारतें आज उपेक्षित और जमींदोज है।
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