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Gonda News: रखरखाव के अभाव में मिट रही प्रेम व भक्ति की धरोहर

Fri, 13 Feb 2026 11:18 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा Updated Fri, 13 Feb 2026 11:18 PM IST
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The heritage of love and devotion is disappearing due to lack of maintenance
मालवीयनगर ​स्थित सागर तालाब। - संवाद 
गोंडा। जिले की रियासत की शान व प्रेम-भक्ति की अद्भुत मिसाल रहा सागर तालाब और उससे जुड़ा काल्पनिक वृंदावन उपेक्षा की मार झेल रहा है। कभी यह स्थल राजसी वैभव, आध्यात्मिक आस्था व स्थापत्य सौंदर्य का संगम था, लेकिन आज खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। गोंडा नरेश महाराजा देवी बख्श सिंह के शासनकाल तक यह ऐतिहासिक स्थल जीवंत और दर्शनीय बना रहा। उनके नेपाल प्रवास के बाद ब्रिटिश शासनकाल में इसकी देखरेख शिथिल हो गई और धीरे-धीरे यह धरोहर जर्जर होती चली गई। स्वतंत्रता के बाद भी ठोस संरक्षण योजना न बन पाने से हालात बदतर होते गए। आज तालाब के मध्य स्थित मंदिर, श्याम सदन, कृष्ण कुंज और गोवर्धन पर्वत जैसे निर्माण जर्जर अवस्था में हैं। चारों ओर झाड़ियां उग आई हैं और असामाजिक तत्वों व जहरीले जीव-जंतुओं का ठिकाना बनते जा रहे हैं।
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17वीं शताब्दी की अनमोल विरासत



सागर तालाब का निर्माण 17वीं शताब्दी में गोंडा नरेश शिव प्रसाद सिंह ने कराया था। वे भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे, इसलिए तालाब के आसपास भव्य मंदिरों की स्थापना कराई गई। बाद में राजा गुमान सिंह की पत्नी रानी भगवंत कुंवरी ने इसे काल्पनिक वृंदावन का स्वरूप दिया। जनश्रुति के अनुसार, मथुरा-वृंदावन की छटा से प्रभावित राजा गुमान सिंह वहीं बसना चाहते थे, तब रानी ने वचन दिया कि गोंडा में ही वैसा ही वृंदावन बसाया जाएगा। 18वीं शताब्दी में तालाब के मध्य टापू पर गोवर्धन पर्वत, श्याम सदन, गोपाल बरसाना और कृष्ण कुंज जैसे निर्माण कराए गए। आज भी उनके अवशेष इतिहास की गवाही दे रहे हैं। वर्ष 1999-2000 में तत्कालीन जिलाधिकारी मार्कण्डेय सिंह ने पहली बार इसके जीर्णोद्धार की पहल की। गोंडा वन प्रभाग द्वारा 16.40 लाख रुपये की कार्ययोजना बनाई गई। कुछ कार्य शुरू भी हुए, लेकिन जिलाधिकारी के स्थानांतरण के साथ योजना अधर में लटक गई। इसके बाद 2011 में जिलाधिकारी राम बहादुर, फिर जिलाधिकारी डॉ. रोशन जैकब ने विकास कार्य कराए। दीपदान की परंपरा शुरू हुई। जिलाधिकारी अजय उपाध्याय के समय भी सफाई व मार्ग निर्माण हुआ, लेकिन स्थायी रखरखाव न होने से व्यवस्थाएं फिर बिखर गईं। इतिहासकार केबी सिंह ने कहा कि यदि शीघ्र संरक्षण नहीं हुआ तो काल्पनिक वृंदावन के शेष अवशेष भी मिट जाएंगे।
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