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उपेक्षित है रामचरित मानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली

Sun, 26 Jul 2020 09:27 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 26 Jul 2020 09:27 PM IST
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The birthplace of Goswami Tulsidas, the creator of Ramcharit Manas is neglected
गोंडा के परसपुर में 84 कोसी परिक्रमा के समय तुलसीदास जी के मंदिर की परिक्रमा करते हुए साधु संत। (फा? - फोटो : GONDA
परसपुर (गोंडा)। कौशिल्यानंदन मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की मर्यादा को अपनी लेखनी से जन-जन के हृदय स्थली तक पहुंचाने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी की पावन जन्मस्थली की उपेक्षा का दंश अब लोगों से सहन नहीं हो पा रहा है। 27 जुलाई को सावन शुक्ल सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है। इसे जिले में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। श्रीराम जन्मभूमि पर आए न्यायालय के निर्णय व वहां पांच जुलाई को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों भव्य प्रभु श्रीराम मंदिर का शिलान्यास व दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित श्रीराम मंदिर निर्माण कराए जाने की खबर सुन कर प्रभु श्रीराम भक्त फूले नहीं समा रहे हैं। वहीं रामचरित मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास का जन्म स्थान आज भी शासन-प्रशासन की उपेक्षा का शिकार होकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।
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अवध धाम (अयोध्या) के 84 कोसी परिक्रमा मार्ग के सांस्कृतिक व शास्त्रीय सीमा में अवस्थित श्रीरामचरित मानस महाकाव्य के अमर प्रणेता विश्ववंद्य गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के जन्म स्थान को लेकर चाहे जितने भी दावे क्यों न किये जा रहे हो। लेकिन सभी में जनपद गोंडा का दावा अपने आप मे पुख्ता साक्ष्यों पर आधारित है। कलकल करती पतित पावनी मां सरयू की धारा, सूकरखेत के पास राजापुर नामक गांव को गोस्वामी जी का जन्म स्थान माना जाता है। यहां पर राष्ट्रीय संत मोरारी बापू ने श्रद्धालुओं को नव दिवसीय श्रीराम कथा सुना कर अपने आप को धन्य किया था।
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गोस्वामी जी के जन्म स्थान से अयोध्या धाम मात्र 60 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। प्रत्येक वर्ष यहां चैत्र मास में 84 कोसी परिक्रमा के लिये साधु-संत आकर रात्रि विश्राम करते हैं। बताया जाता है कि 84 कोसी परिक्रमा करने से चौरासी लाख योनियों के भव बंधन से जीव मुक्त हो जाता है। इसी श्रद्धा एवं विश्वास के कारण ही धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अवध धाम की 84 कोसी परिक्रमा दुलारे बाग, जंबू दीप, गोस्वामी तुलसी दास जी की जन्म स्थली, पसका सूकरखेत स्थित भगवान वाराह की औतार स्थली, गोस्वामी जी के गुरु नरिहरदास आश्रम व मां वाराही देवी सहित अनेक धार्मिक स्थलों का भी साधु-संत व श्रद्धालु परिक्रमा कर अपने आप को कृतार्थ करते हैं। रामचरित मानस जैसे अमर महाकाव्य की रचना कर प्रभु श्रीराम को देश ही नहीं विदेशों में भी जन जन के हृदयं स्थली तक पहुंचाने वाले गोस्वामी जी की जन्मस्थली आज भी खुद उपेक्षा का शिकार है। इस ऐतिहासिक व धर्मिक स्थली की तरफ शासन-प्रशासन ने भी न जाने क्यों आज तक ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। इस स्थली को आज किसी भागीरथ का इंतजार है। जो उनके गरिमा के अनुकूल इस का विकास करवा सके।
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विनय पत्रिका में स्वयं तुलसी ने दिया है अपने जन्म का प्रमाण
परसपुर (गोंडा)। बताया जाता है अपने जन्म स्थान को लेकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने खुद विनय पत्रिका में लिखा है। ‘आलसी अभागे मोसे ते कृपालु पाले पोसे राजा मोरे राजा राम अवध सहरू’ चूंकि जिस वक्त उन्होंने यह पंक्तियां लिखी थी। उस समय गोंडा का कोई अस्तित्व नहीं था। बताया जाता है तुलसी जन्मभूमि राजापुर से पांच किलोमीटर दक्षिण उनके गुरु नरहरिदास जी का आश्रम सूकरखेत में विद्यमान है। यहां पुजारी द्वारा सहेज कर रखी गयी रामचरित मानस की पांडुलिपि के अवशेष का कुछ भाग लोग गोस्वामी जी द्वारा रचित मानते हैं। जो आज भी यहां सुरक्षित है।
राजस्व अभिलेखों में दर्ज है आत्माराम टेपरा गोचर भूमि
परसपुर (गोंडा)। तुलसी जन्म भूमि सूकरखेत विकास समिति एवं सनातन धर्म परिषद के अध्यक्ष डॉ. स्वामी भगवदाचार्य ने बताया कि अयोध्या धाम से सटे गोंडा के राजापुर सूकरखेत में गोस्वामी तुलसीदास के पिता आत्माराम के नाम का एक टेपरा (गोचर भूमि) जो आत्माराम टेपरा के नाम आज भी राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। उन्होंने बताया कि यहां आज भी तुलसीदास के वंशज रहते हैं। उनकी वंश परंपरा के लोग तुलसी, उनके पिता आत्माराम व मां हुलसी के नाम श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण करते हैं। उन्होंने बताया कि गोस्वामी जी ने मानस में लिखा है। ‘मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा सो सूकरखेत’ उन्होंने बाल्यकाल में यह कथा अपने गुरु नरहरिदास जी से सुनी थी। गोस्वामी जी ने गोंडा, फैजाबाद (जो अब अयोध्या) की अवधी भाषा का प्रयोग किया है। यहां की लोक संस्कृति को उन्होंने सूक्ष्मता पूर्वक चित्रित किया है। उन्होंने एक रचना रामलला नहछू लिखी थी। नहछू नामक प्रथा केवल इसी क्षेत्र में प्रचलित है।
देखरेख में धूमिल हो रहा तुलसीघाट, सरोवर, कूप
परसपुर (गोंडा)। तुलसी जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष डॉ. स्वामी भगवदाचार्य ने कहा कि रामचरित मानस के अमर महाकाव्य में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम का महिमा मंडन करने वाले अयोध्या धाम से सटे गोस्वामी जी की जन्मस्थली राजापुर सूकरखेत आज भी उपेक्षित है। तुलसीघाट, तुलसी सरोवर देख रेख के अभाव में बड़े तालाब का रूप ले चुका है। तुलसी ओपेन थियेटर, तुलसी कूप व अतिथि भवन भी उपेक्षित होकर जर्जर हो गया है। गोस्वामी जी की जन्मस्थली को आने वाला मार्ग व सरयू घाघरा का पवित्र संगम स्थल (लेकिन बांध बंध जाने से अब यहां संगम नहीं होता है) त्रिमुहानी घाट को जाने वाला मार्ग उपेक्षित है। उन्होंने बताया कि तुलसीदास जी के जन्मस्थान के विकास में आज तक शासन-प्रशासन ने कोई रुचि नहीं ली। लेकिन केंद्र व प्रदेश में राम भक्त सरकार इस ऐतिहासिक, धार्मिक जन्मस्थली को उसके गरिमा के अनुकूल विकसित करे। जैसा कि 2018 में सरकार ने अयोध्या धाम की 84 कोसी परिक्रमा मार्ग में आने वाले सभी आध्यात्मिक स्थलों को विकसित करने के लिये अयोध्या धाम में शिलान्यास किया था।

संभ्रांत लोगों ने विकास कराने की मांग की
परसपुर (गोंडा)। परसपुर विकास मंच के अध्यक्ष अरुण कुमार सिंह ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी राष्ट्र के गौरव हैं। मानस की रचना कर न सिर्फ भारत बल्कि विश्व को एक संदेश दिया है। इस लिये उनके जन्मस्थली के विकास के लिये ठोस पहल होनी ही चाहिए। लोकतंत्र सेनानी व (सभासद) श्रीराम सैनी ने कहा कि इस स्थली के विकास के लिये सरकार तत्काल ध्यान दे ताकि गोस्वामी जी की जन्मस्थली का उनके गरिमा के अनुकूल विकास हो सके। प्रमोद मिश्र ने कहा कि इस स्थली के विकास के लिये आज तक सिर्फ आश्वासनों के अलावा धरातल पर कोई कार्य दिखाई नहीं पड़ रहा है। इस धार्मिक, ऐतिहासिक स्थली का तत्काल विकास हो। आदर्श शुक्ला (सभासद) ने कहा। की तुलसी जी के जन्मभूमि के विकास में शासन-प्रशासन ने खास रुचि नहीं ली है। जिससे यह स्थली आज भी उपेक्षित है। जो नहीं होना चाहिये।
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