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विस चुनाव में 7700 रसोइयों से ली ड्यूटी, नहीं दी फूटी कौंडी
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गोंडा। विस चुनाव में मतदेय स्थलों पर कर्मचारियों को नाश्ता व भोजन देने के लिए बेसिक शिक्षा की रसोइयों को लगाया। पूरे दिन काम लिया, लेकिन कोई पारिश्रमिक नहीं दी। जिले के 2918 बूथों पर बीते 27 फरवरी को हुए मतदान में सात हजार के करीब रसोइयों ने भोजन बनाया। प्रशासन की ओर से भोजन की व्यवस्था के लिए आदेश दे दिए गए, लेकिन उनको निर्वाचन में कार्य करने पर किसी तरह के मानदेय दिए जाने की व्यवस्था नहीं बनाई गई। जबकि अन्य सभी मतदान कर्मचारियों को ड्यूटी करने का अतिरिक्त मानदेय दिया गया है। निर्वाचन विभाग के अधिकारियों की मानें तो रसोइयों के बारे में मानदेय का कोई निर्देश नहीं है।
बेसिक स्कूलों में नौनिहालों को दोपहर में भोजन कराने के लिए 7700 रसोइयां कार्यरत हैं। इसके लिए बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से 1500 रूपए मामूली मानदेय ही माह में दिया जाता है। वह भी मानदेय कभी भी समय से नहीं मिलता। बीते सालों पर मानदेय दिए जाने पर नजर दौड़ाएं तो पांच- पांच से आठ-आठ माह काम लेने के बाद मानदेय दिया जा रहा है। बीते 2012 में विस चुनाव के बाद से लगातार स्कूलों की रसोइयों से बूथों पर कर्मचारियों को भोजन कराने का काम लिया जाता है। यह काम उनसे लोस चुनाव, पंचायत चुनाव में भी लिया जा चुका है। बूथों पर रसोइयों से काम लिया गया। यही नहीं उन्हें पोलिंग शुरू होने के पहले ही बूथों पर बुलाया गया। सुबह नाश्ता देने के बाद दोपहर में भोजन और शाम को नाश्ता बनाने का काम लिया गया। एक दिन में तीन प्रहर कार्य लिए जाने के बाद भी फूटी कौड़ी नहीं दिया गया, जबकि मतदान कार्मिक के रूप में ड्यूटी करने वालों को उसी दिन मानदेय दे दिया गया। रसोइयों की मानें तो उन्हें कभी भी चुनाव में ड्यूटी का कोई मानदेय नहीं दिया जाता है।
कम मानदेय में करनी पड़ती पूरी ड्यूटी
बेसिक स्कूलों में कार्यरत रसोइयों का मानदेय सबसे कम है। 1500 रुपये माह तय मानदेय पर रसोइयों से पूरे दिन स्कूलों में भी काम लिया जाता है। चुनाव में ड्यूटी लेने के बाद रसोइयों को लगा था कि उन्हें अतिरिक्त मानदेय मिलेगा, लेकिन निर्वाचन विभाग की ओर से उन्हें कार्मिक माना ही नहीं गया। जिससे वह मानदेय से वंचित ही रहती हैं। इस बार भी उन्हें काम के बदले कोई मानदेय नहीं मिल सका है। बताया जा रहा है कि इसकी कोई व्यवस्था ही नहीं है। संविदा कार्मिक संघ के पदाधिकारी दिलीप शुक्ल कहते हैं कि मानदेय नहीं मिलना था, तो ड्यूटी क्यों लिया गया। कहा कि मानदेय दिए जाना चाहिए।
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निर्वाचन विभाग की ओर से कर्मचारियों को ही मानदेय दिए जाने की व्यवस्था है। रसोइयों को मानदेय दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। जंगजीत वर्मा, सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी
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बेसिक स्कूलों में नौनिहालों को दोपहर में भोजन कराने के लिए 7700 रसोइयां कार्यरत हैं। इसके लिए बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से 1500 रूपए मामूली मानदेय ही माह में दिया जाता है। वह भी मानदेय कभी भी समय से नहीं मिलता। बीते सालों पर मानदेय दिए जाने पर नजर दौड़ाएं तो पांच- पांच से आठ-आठ माह काम लेने के बाद मानदेय दिया जा रहा है। बीते 2012 में विस चुनाव के बाद से लगातार स्कूलों की रसोइयों से बूथों पर कर्मचारियों को भोजन कराने का काम लिया जाता है। यह काम उनसे लोस चुनाव, पंचायत चुनाव में भी लिया जा चुका है। बूथों पर रसोइयों से काम लिया गया। यही नहीं उन्हें पोलिंग शुरू होने के पहले ही बूथों पर बुलाया गया। सुबह नाश्ता देने के बाद दोपहर में भोजन और शाम को नाश्ता बनाने का काम लिया गया। एक दिन में तीन प्रहर कार्य लिए जाने के बाद भी फूटी कौड़ी नहीं दिया गया, जबकि मतदान कार्मिक के रूप में ड्यूटी करने वालों को उसी दिन मानदेय दे दिया गया। रसोइयों की मानें तो उन्हें कभी भी चुनाव में ड्यूटी का कोई मानदेय नहीं दिया जाता है।
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कम मानदेय में करनी पड़ती पूरी ड्यूटी
बेसिक स्कूलों में कार्यरत रसोइयों का मानदेय सबसे कम है। 1500 रुपये माह तय मानदेय पर रसोइयों से पूरे दिन स्कूलों में भी काम लिया जाता है। चुनाव में ड्यूटी लेने के बाद रसोइयों को लगा था कि उन्हें अतिरिक्त मानदेय मिलेगा, लेकिन निर्वाचन विभाग की ओर से उन्हें कार्मिक माना ही नहीं गया। जिससे वह मानदेय से वंचित ही रहती हैं। इस बार भी उन्हें काम के बदले कोई मानदेय नहीं मिल सका है। बताया जा रहा है कि इसकी कोई व्यवस्था ही नहीं है। संविदा कार्मिक संघ के पदाधिकारी दिलीप शुक्ल कहते हैं कि मानदेय नहीं मिलना था, तो ड्यूटी क्यों लिया गया। कहा कि मानदेय दिए जाना चाहिए।
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निर्वाचन विभाग की ओर से कर्मचारियों को ही मानदेय दिए जाने की व्यवस्था है। रसोइयों को मानदेय दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। जंगजीत वर्मा, सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी