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पसका संगम में साधु-संतों ने डाला डेरा, एक माह तक चलेगा कल्पवास
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गोंडा में परसपुर के पसका में भगवान बारह का मंदिर।
- फोटो : GONDA
परसपुर (गोंडा)। अवध धाम की चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग में अवस्थित भगवान वाराह की औतार स्थली व पतित पावनी मां सरयू के त्रिमुहानी घाट पसका सूकरखेत में भगवान से सीधा नाता जोड़ कर एक मास तक कल्पवास/तपस्या के लिये यहां नागा, साधु-सन्यासियों की आमद प्रारंभ हो गयी है।
यहां पौष कृष्ण प्रतिपदा 13 दिसंबर से कल्पवास प्रारंभ हो जाएगा। यहां कल्पवास करने के लिये देश के कोने-कोने से साधु-संतों, गृहस्थ जन अपना जीवन सफल बनाने के लिये एक माह तक कल्पवास/तपस्या प्रारंभ करेंगे। बहुत से साधु-संत, महात्माओं के आने से यह इलाका बेहद भक्ति भाव पूर्ण हो गया है और रामधुन से यह इलाका गुंजायमान हो रहा हैं। पसका मेला का मुख्य स्नान पर्व पौष पूर्णिमा 10 जनवरी को पड़ेगा। बताया जाता है कि पौष मास में लगने वाला उत्तर भारत का यह प्रमुख मेला है। एक माह तक कल्पवास करने के बाद ये साधु-संत प्रयाग के लिए रवाना हो जाएंगे।
पुराणों में वर्णित सूकरखेत पसका में हजारों तीर्थ विद्यमान है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सतयुग में वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध कर पृथ्वी को पाप से मुक्त कराया था। इसी मान्यता के आधार पर इस स्थली को सूकरखेत नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान का उल्लेख स्कंद पुराण में इस तरह उल्लखित है। ‘दशकोटि सहस्त्राणि, दश कोटि शतानि च, तीर्थानि सरयू नद्या घर्घरोदक संगमे।’ जिसका अर्थ है सरयू-घाघरा संगम तट पर हजारों तीर्थ विद्यमान है।
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साधु-संतों से आशीर्वाद लेने उमड़ते श्रद्धालु
परसपुर। आदिकाल से त्रिमुहानी घाट पर पौष मास लगते ही देश के कोने-कोने से नागा, साधु-सन्यासियों, महात्माओं व गृहस्थ धर्म के लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं को त्याग सरयू की रेती पर फूस की कुटिया डाल कर एक माह तक कल्पवास/तपस्या में लीन रहते हैं। ये कल्पवासी दिन भर रामनाम धुन का संकीर्तन करते रहते है। जिनके दर्शन व आशीर्वाद के लिये आसपास क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां उमड़ते रहते हैं। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में कल्पवासी पतित पावनी मां सरयू में स्नान-ध्यान कर धूप, दीप, नैवेद्य से अपना दिनचर्या पूजा, अर्चना प्रारंभ करते हैं और पौष पूर्णिमा को मुख्य स्नान के बाद ये कल्पवासी वापस अपने मठ, मंदिरों व घरों को लौट जाते हैं।
सरयू व घाघरा का होता मिलन
परसपुर (गोंडा)। पसका सूकरखेत में सरयू व घाघरा दोनों नदियां मिलती हैं। इसलिये इस स्थल को संगम कहते हैं। सरयू-घाघरा के संगम स्थल त्रिमुहानी घाट पर श्रद्धालु स्नान करते हैं। परंतु संगम स्थल पर बांध बनने से अब यहां संगम नहीं हो पा रहा है। बल्कि यहां से सात किमी. दूर चंदापुर किटौली में घाघरा व सरयू नदी का मिलन होता है।
नरिहरदास जी की कुटिया है विद्यमान
परसपुर (गोंडा)। पसका सूकरखेत में रामचरित मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु नरहरिदास जी की कुटिया विद्यमान है। बताया जाता है कि यहां गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरित मानस का अवशेष विद्यमान है। यहीं से थोड़ी दूर स्थित राजापुर नामक गांव को गोस्वामी जी का जन्मस्थान माना गया है।
दुर्गंध से पड़ती है तपस्या में खलल
फोटो-2-3-4
जम्मू कश्मीर से आए नागा साधु भोजपत्र गिरि कहते हैं यहां नारायण की तपस्या की जाती है। भगवान विष्णु ने यहां बाराह रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को मुक्त कराया था। एक माह तक कल्पवास होगा इसके बाद प्रयाग चले जाएंगे। अयोध्या से आए साधु मैैदानी बाबा कहते हैं कि घाट पर गंदगी से दुर्गंध उठती है जिससे तपस्या में खलल उत्पन्न होता है। हनुमान बाग बस्ती से आए संत रामचेला दास ने बताया कि यहीं से मोक्षद्वार खुलता है।
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यहां पौष कृष्ण प्रतिपदा 13 दिसंबर से कल्पवास प्रारंभ हो जाएगा। यहां कल्पवास करने के लिये देश के कोने-कोने से साधु-संतों, गृहस्थ जन अपना जीवन सफल बनाने के लिये एक माह तक कल्पवास/तपस्या प्रारंभ करेंगे। बहुत से साधु-संत, महात्माओं के आने से यह इलाका बेहद भक्ति भाव पूर्ण हो गया है और रामधुन से यह इलाका गुंजायमान हो रहा हैं। पसका मेला का मुख्य स्नान पर्व पौष पूर्णिमा 10 जनवरी को पड़ेगा। बताया जाता है कि पौष मास में लगने वाला उत्तर भारत का यह प्रमुख मेला है। एक माह तक कल्पवास करने के बाद ये साधु-संत प्रयाग के लिए रवाना हो जाएंगे।
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पुराणों में वर्णित सूकरखेत पसका में हजारों तीर्थ विद्यमान है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सतयुग में वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध कर पृथ्वी को पाप से मुक्त कराया था। इसी मान्यता के आधार पर इस स्थली को सूकरखेत नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान का उल्लेख स्कंद पुराण में इस तरह उल्लखित है। ‘दशकोटि सहस्त्राणि, दश कोटि शतानि च, तीर्थानि सरयू नद्या घर्घरोदक संगमे।’ जिसका अर्थ है सरयू-घाघरा संगम तट पर हजारों तीर्थ विद्यमान है।
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साधु-संतों से आशीर्वाद लेने उमड़ते श्रद्धालु
परसपुर। आदिकाल से त्रिमुहानी घाट पर पौष मास लगते ही देश के कोने-कोने से नागा, साधु-सन्यासियों, महात्माओं व गृहस्थ धर्म के लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं को त्याग सरयू की रेती पर फूस की कुटिया डाल कर एक माह तक कल्पवास/तपस्या में लीन रहते हैं। ये कल्पवासी दिन भर रामनाम धुन का संकीर्तन करते रहते है। जिनके दर्शन व आशीर्वाद के लिये आसपास क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां उमड़ते रहते हैं। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में कल्पवासी पतित पावनी मां सरयू में स्नान-ध्यान कर धूप, दीप, नैवेद्य से अपना दिनचर्या पूजा, अर्चना प्रारंभ करते हैं और पौष पूर्णिमा को मुख्य स्नान के बाद ये कल्पवासी वापस अपने मठ, मंदिरों व घरों को लौट जाते हैं।
सरयू व घाघरा का होता मिलन
परसपुर (गोंडा)। पसका सूकरखेत में सरयू व घाघरा दोनों नदियां मिलती हैं। इसलिये इस स्थल को संगम कहते हैं। सरयू-घाघरा के संगम स्थल त्रिमुहानी घाट पर श्रद्धालु स्नान करते हैं। परंतु संगम स्थल पर बांध बनने से अब यहां संगम नहीं हो पा रहा है। बल्कि यहां से सात किमी. दूर चंदापुर किटौली में घाघरा व सरयू नदी का मिलन होता है।
नरिहरदास जी की कुटिया है विद्यमान
परसपुर (गोंडा)। पसका सूकरखेत में रामचरित मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु नरहरिदास जी की कुटिया विद्यमान है। बताया जाता है कि यहां गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरित मानस का अवशेष विद्यमान है। यहीं से थोड़ी दूर स्थित राजापुर नामक गांव को गोस्वामी जी का जन्मस्थान माना गया है।
दुर्गंध से पड़ती है तपस्या में खलल
फोटो-2-3-4
जम्मू कश्मीर से आए नागा साधु भोजपत्र गिरि कहते हैं यहां नारायण की तपस्या की जाती है। भगवान विष्णु ने यहां बाराह रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को मुक्त कराया था। एक माह तक कल्पवास होगा इसके बाद प्रयाग चले जाएंगे। अयोध्या से आए साधु मैैदानी बाबा कहते हैं कि घाट पर गंदगी से दुर्गंध उठती है जिससे तपस्या में खलल उत्पन्न होता है। हनुमान बाग बस्ती से आए संत रामचेला दास ने बताया कि यहीं से मोक्षद्वार खुलता है।