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सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय के बिना शांति संभव नहीं : मौलाना ताहिर
Sun, 07 Sep 2025 11:37 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Sun, 07 Sep 2025 11:37 PM IST
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गोंडा। मौलाना मोहम्मद ताहिर मदनी ने कहा कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय के बिना समाज में शांति की स्थापना संभव नहीं है। वह जमायते इस्लामी की ओर से रविवार को सीरत मुहिम के अंतर्गत आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि इस्लामी कैलेंडर के इसी महीने में इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था। उस समय अरब के मक्का नगर में शराबखोरी, स्त्रियों के साथ अन्याय, कन्या भ्रूण हत्या, गुलामी जैसी अनेक सामाजिक बुराइयां फैली थीं। यहां तक कि काबा की परिक्रमा भी लोग निर्वस्त्र होकर किया करते थे। लूटपाट और कमजोरों का हक मार लेना ताकतवरों की आदत बन चुकी थी। ऐसे समय में हजरत मोहम्मद ने कुरआन की शिक्षाओं के माध्यम से एक ऐसे समाज की स्थापना की, जहां लोग न्याय और समानता के साथ जीवन जीने लगे।
उन्होंने बताया कि हजरत मोहम्मद साहब ने स्पष्ट कर दिया था कि जन्म के आधार पर कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। सभी आदम की संतान हैं और सब बराबर हैं। श्रेष्ठ वही है, जो न्यायप्रिय और ईश्वर भक्त है। मौलाना ताहिर ने एक दृष्टांत रखते हुए कहा कि हजरत मोहम्मद के समय में एक बड़े कबीले की महिला फातमा ने चोरी की। जब उसे दंड से बचाने की सिफारिशें आने लगीं, तो हजरत मोहम्मद ने कठोर स्वर में कहा कि पिछले लोगों पर ईश्वर का प्रकोप इसलिए आता था क्योंकि कि वे कमजोरों को सजा देते थे और प्रभावशाली लोगों को छोड़ देते थे। उन्होंने कहा कि अगर मेरी अपनी बेटी फातमा भी यह अपराध करती, तो मैं उसे भी दंड दिलाता।
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मौलाना ने कहा कि आज समाज में अनेक प्रकार की बुराइयां व्याप्त हैं, जिन्हें हजरत मोहम्मद की शिक्षाओं से ही सुधारा जा सकता है। उन्होंने मुसलमानों से आह्वान किया कि वे इस महीने में समाज के हर वर्ग को हजरत मोहम्मद की शिक्षाओं से अवगत कराएं और स्वयं भी अपने आचरण में उन्हें अपनाएं। कार्यक्रम की शुरुआत में जमाते इस्लामी के जिलाध्यक्ष फैज बारी ने सभा के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि इस्लामी कैलेंडर के इसी महीने में इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था। उस समय अरब के मक्का नगर में शराबखोरी, स्त्रियों के साथ अन्याय, कन्या भ्रूण हत्या, गुलामी जैसी अनेक सामाजिक बुराइयां फैली थीं। यहां तक कि काबा की परिक्रमा भी लोग निर्वस्त्र होकर किया करते थे। लूटपाट और कमजोरों का हक मार लेना ताकतवरों की आदत बन चुकी थी। ऐसे समय में हजरत मोहम्मद ने कुरआन की शिक्षाओं के माध्यम से एक ऐसे समाज की स्थापना की, जहां लोग न्याय और समानता के साथ जीवन जीने लगे।
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उन्होंने बताया कि हजरत मोहम्मद साहब ने स्पष्ट कर दिया था कि जन्म के आधार पर कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। सभी आदम की संतान हैं और सब बराबर हैं। श्रेष्ठ वही है, जो न्यायप्रिय और ईश्वर भक्त है। मौलाना ताहिर ने एक दृष्टांत रखते हुए कहा कि हजरत मोहम्मद के समय में एक बड़े कबीले की महिला फातमा ने चोरी की। जब उसे दंड से बचाने की सिफारिशें आने लगीं, तो हजरत मोहम्मद ने कठोर स्वर में कहा कि पिछले लोगों पर ईश्वर का प्रकोप इसलिए आता था क्योंकि कि वे कमजोरों को सजा देते थे और प्रभावशाली लोगों को छोड़ देते थे। उन्होंने कहा कि अगर मेरी अपनी बेटी फातमा भी यह अपराध करती, तो मैं उसे भी दंड दिलाता।
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मौलाना ने कहा कि आज समाज में अनेक प्रकार की बुराइयां व्याप्त हैं, जिन्हें हजरत मोहम्मद की शिक्षाओं से ही सुधारा जा सकता है। उन्होंने मुसलमानों से आह्वान किया कि वे इस महीने में समाज के हर वर्ग को हजरत मोहम्मद की शिक्षाओं से अवगत कराएं और स्वयं भी अपने आचरण में उन्हें अपनाएं। कार्यक्रम की शुरुआत में जमाते इस्लामी के जिलाध्यक्ष फैज बारी ने सभा के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष मौजूद रहे।