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टार्च की रोशनी में ओपीडी, जांच के लिए दिखा दिया जाता बाहर का रास्ता
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25द्दस्रड्डश्च1ड्ड-गोंडा के महिला अस्पताल मे चस्पा डॉक्टर न होने की नोटिस।
- फोटो : GONDA
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गोंडा। आधी आबादी को सुलभ व निशुल्क इलाज के लिए बनाया गया जिला महिला अस्पताल इस दिनों अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया। जिले के सुदूर क्षेत्रों से अपने दर्द के निदान की लिए आने वाली महिलाओं को यहां न तो सुलभ इलाज मिलता है और न निशुल्क इलाज का लाभ। घंटों तक लाइन में लगकर मरीज ओपीडी तक पहुंचते तो टार्च की रोशनी में दवा व जांच लिखने के बाद डॉक्टर जांच के लिए बाहर का रास्ता दिखा देते हैं।
जिला महिला अस्पताल पर जिले की आधी आबादी को निशुल्क व सुविधाजनक इलाज मुहैया कराने का दारोमदार है। जिले के सुदूर इलाकों से गर्भवती व अन्य महिलाओं अपने दर्द का इलाज ढूंढने अस्पताल आती है। लेकिन यहां आने वाली महिला मरीज और उनके तीमारदारों को सुविधाएं मिलनी तो दूर की बात है, उनका खुलेआम शोषण किया जाता है। मरीजों को इलाज के नाम पर सिर्फ पर्चा पकड़ा दिया जाता है। अधिकांश महंगी कमीशन वाली दवाएं व जांच बाहर से कराना पड़ता है।
अस्पताल में प्रसव व आपरेशन के नाम पर डंके की चोट पर वसूली की जाती है। पैसा न देने वाले मरीजों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है या उन्हे अस्पताल से वापस कर दिया जाता है। जिला महिला अस्पताल में भर्ती मरीज के तीमारदार राजेश ने भर्ती मरीज का नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनसे आपरेशन के लिए छह हजार रुपये की मांग की गई थी। पांच हजार रुपये देने पर ही ऑपरेशन किया गया। अस्पताल कर्मचारियों की माने तो अब वसूली अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी के इसारे पर ही का होता है।
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डॉक्टर मोबाइल की रोशनी में कर रहे ओपीडी
महिला अस्पताल में अव्यवस्थाओं का आलम ये है कि डॉक्टरों को मोबाइल की रोशनी में ओपीडी करना पड़ रहा है। बुधवार को अस्पताल में अंधेरा कायम रहा। डॉक्टर मोबाइल की रोशनी में ओपीडी में मरीजों का इलाज कर रहे थे, तो वहीं बिजली न होने से कई जरूरी मशीनों का काम ठप हो गया। वार्डों में भर्ती नवजात व प्रसूता गर्मी से बेहाल हो रहे थे। अस्पताल के पैैथालॉजी के बाहर डॉक्टर अवकाश पर हैं अल्ट्रासाउंड नहीं होगा का नोटिस चस्पा था।
जिला महिला अस्पताल आने वाले मरीजों को यहां तैनात चिकित्सक बाहर की जांच व दवा का पर्चा थमा देते हैं। अस्पताल में संचालित पैथालॉजी या तो डॉक्टर नहीं रहते या सिर्फ गिनी-चुनी जांचें ही होती हैं। अस्पताल आए मरीजों ने बताया कि अस्पताल के अंदर जो दवा मिलती है, उसके बारे में चिकित्सक खुद कहते है कि इसे खाने से तुम्हारा मर्ज ठीक नहीं होगा। यदि ठीक होना है तो बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ेगी। मरीज जब बाहर से दवा खरीदता है तो उसका कमीशन संबंधित चिकित्सक को मिलता है। इस गोरखधंधे पर अस्पताल प्रशासन जिम्मेदारों के शामिल होने की बात कही जाती है। मरीजों का कहना है कि अस्पताल के अंदर जब दवा नहीं मिलती है तो उन्हें मजबूरी में बाहर से महंगे दामों पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
अस्पताल में सिर्फ अल्ट्रासाउंड की सुविधा बाधित है बाकी जांच हो रही है। मरीजों से अवैध वसूली की शिकायत मिलने पर जांच कराकर आवश्यक की जाएगी। डॉ सुषमा सिंह, सीएमएस महिला अस्पताल
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जिला महिला अस्पताल पर जिले की आधी आबादी को निशुल्क व सुविधाजनक इलाज मुहैया कराने का दारोमदार है। जिले के सुदूर इलाकों से गर्भवती व अन्य महिलाओं अपने दर्द का इलाज ढूंढने अस्पताल आती है। लेकिन यहां आने वाली महिला मरीज और उनके तीमारदारों को सुविधाएं मिलनी तो दूर की बात है, उनका खुलेआम शोषण किया जाता है। मरीजों को इलाज के नाम पर सिर्फ पर्चा पकड़ा दिया जाता है। अधिकांश महंगी कमीशन वाली दवाएं व जांच बाहर से कराना पड़ता है।
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अस्पताल में प्रसव व आपरेशन के नाम पर डंके की चोट पर वसूली की जाती है। पैसा न देने वाले मरीजों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है या उन्हे अस्पताल से वापस कर दिया जाता है। जिला महिला अस्पताल में भर्ती मरीज के तीमारदार राजेश ने भर्ती मरीज का नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनसे आपरेशन के लिए छह हजार रुपये की मांग की गई थी। पांच हजार रुपये देने पर ही ऑपरेशन किया गया। अस्पताल कर्मचारियों की माने तो अब वसूली अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी के इसारे पर ही का होता है।
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डॉक्टर मोबाइल की रोशनी में कर रहे ओपीडी
महिला अस्पताल में अव्यवस्थाओं का आलम ये है कि डॉक्टरों को मोबाइल की रोशनी में ओपीडी करना पड़ रहा है। बुधवार को अस्पताल में अंधेरा कायम रहा। डॉक्टर मोबाइल की रोशनी में ओपीडी में मरीजों का इलाज कर रहे थे, तो वहीं बिजली न होने से कई जरूरी मशीनों का काम ठप हो गया। वार्डों में भर्ती नवजात व प्रसूता गर्मी से बेहाल हो रहे थे। अस्पताल के पैैथालॉजी के बाहर डॉक्टर अवकाश पर हैं अल्ट्रासाउंड नहीं होगा का नोटिस चस्पा था।
जिला महिला अस्पताल आने वाले मरीजों को यहां तैनात चिकित्सक बाहर की जांच व दवा का पर्चा थमा देते हैं। अस्पताल में संचालित पैथालॉजी या तो डॉक्टर नहीं रहते या सिर्फ गिनी-चुनी जांचें ही होती हैं। अस्पताल आए मरीजों ने बताया कि अस्पताल के अंदर जो दवा मिलती है, उसके बारे में चिकित्सक खुद कहते है कि इसे खाने से तुम्हारा मर्ज ठीक नहीं होगा। यदि ठीक होना है तो बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ेगी। मरीज जब बाहर से दवा खरीदता है तो उसका कमीशन संबंधित चिकित्सक को मिलता है। इस गोरखधंधे पर अस्पताल प्रशासन जिम्मेदारों के शामिल होने की बात कही जाती है। मरीजों का कहना है कि अस्पताल के अंदर जब दवा नहीं मिलती है तो उन्हें मजबूरी में बाहर से महंगे दामों पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
अस्पताल में सिर्फ अल्ट्रासाउंड की सुविधा बाधित है बाकी जांच हो रही है। मरीजों से अवैध वसूली की शिकायत मिलने पर जांच कराकर आवश्यक की जाएगी। डॉ सुषमा सिंह, सीएमएस महिला अस्पताल