{"_id":"62795b0c0e0d8b3e53036c74","slug":"fraud-gonda-news-lko629834279","type":"story","status":"publish","title_hn":"सरकारी कर्मियों के फर्जी आईडी बनाकर ट्रेजरी से निकाले थे 1.58 करोड़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सरकारी कर्मियों के फर्जी आईडी बनाकर ट्रेजरी से निकाले थे 1.58 करोड़
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गोंडा। सरकारी कर्मचारियों की फर्जी आईडी बनाकर हुए 1.58 करोड़ का जीपीएफ घोटाले का मामला फिर गरमाने लगा है। शासन स्तर से इस पूरे मामले की जांच एसआईटी को सौंपे जाने के बाद इस खेल में शामिल बाकी लोगों के चेहरों से भी नकाब उतर सकेगा। इसके लिए एसआईटी की टीम अब जीपीएफ घोटाले की जड़ से जुड़े लोगों को ढूंढेगी। मार्च 2021 में जिले की पुलिस ने इस गोरखधंधे का खुलासा किया था। जांच में सामने आया था कि इस पूरे खेल में कर्मचारियों का फर्जी आईडी बना कर ट्रेजरी से भुगतान प्राप्त किया गया था। इसके लिए चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को ही प्रमुख तौर पर निशाना बनाते हुए उनके विभागाध्यक्षों के फर्जी हस्ताक्षर का प्रयोग किया गया।
इससे मामले में अब तक पांच लोगों की गिरफ्तारी के साथ ही जीपीएफ खातों से 1.58 करोड़ रुपया निकाले जाने की बात सामने आ चुकी है। जीपीएफ घोटाले की धरातल गोरखपुर चकबंदी विभाग में लेखाकार व दूसरा बस्ती जिला के हर्रेया तहसील में लेखपाल ने मिलकर तैयार की थी। इन दोनों ने इस खेल को अमल में लाने के लिए 45 खाते भी अलग अलग बैंकों में खोले। इस पूरे खेल से पर्दा तब उठा जब नवाबगंज स्थित भारतीय स्टेट बैंक के कुछ खातों में संदिग्ध तौर पर धनराशि आने की जानकारी हुई। पूरे मामले में गोरखपुर के रामगढ़ थाना के भरबलिया बुजुर्ग आजाद चौक निवासी अरुण वर्मा का नाम सबसे पहले सामने आया था जो चकबंदी विभाग गोरखपुर में लेखाकार था।
काकस में शामिल सभी लोगों ने काल्पनिक नाम से सरकारी कर्मचारियों की आईडी तैयार कर फर्जी जीपीएफ बिल कोषागार भेज कर खाते में जमा जीपीएफ धनराशि को हड़पने का खेल किया। खाते से निकाली जाने वाली करोड़ों की धनराशि गोंडा, गोरखपुर व देवरिया के बैकों में अलग अलग नाम से खुले खातों में भेजकर जमा करायी जाती थी। खाते में जमा धनराशि के आधार पर कुछ निर्धारित कमीशन खातेदार को देने के बाद बाकी धनराशि निकाल ली जाती थी। (संवाद)
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कार्रवाई में चिह्नित हुए थे 45 खाताधारक
जीपीएफ घोटाले के आरोपितों के संपत्तियों का ब्यौरा भी पुलिस ने तैयार किया था। इसमें अरुण वर्मा का करीब ढाई करोड़ रुपये का एक मकान गोरखपुर में, दो करोड़ की जमीन, एक ज्वैलरी शॉप व 50 लाख की अन्य संपत्ति चिन्हित हुईं थीं। इसी तरह राजेश पाठक का करीब तीन करोड़ रुपये का एक हास्टल अयोध्या में, 50 लाख का एक मकान सहित करीब 50 लाख रुपये की अन्य संपत्ति मिलीं। नवाबगंज के 45 खाताधारकों भी चिन्हित किया गया, जिनके खातों में घपले की धनराशि भेजी गई थी। अब इस पूरे मामले की जांच एसआईटी करेगी और उन्हें ही विभाग अभिलेख सौंपेगा।
पूरे खेल में निशाने पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी
गोरखपुर के चकबंदी विभाग में लेखाकार के पद पर कार्यरत अरुण कुमार वर्मा ने जीपीएफ घोटाले की जमीन तैयार करने में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मी को साथ लेकर पूरा गोरखधंधा संचालित किया। इस खेल में कर्मचारियों की आइडी के आधार पर डिमांड आहरण-वितरण अधिकारी के पास भेेजकर, वहां से बिल बनाकर ट्रेजरी भेजने के बाद पूरा पैसा खाते में पैसा ट्रांसफर किया जाता था।
चकबंदी विभाग के कर्मियों पर खेला पूरा दांव
जीपीएफ घोटाले के मुख्य सूत्रधार चकबंदी विभाग में कार्यरत अरुण कुमार वर्मा ने चकबंदी विभाग के कर्मियों पर ही पूरा दांव खेला। विभाग स्तर पर बेहतर जानकारी के साथ ही अफसरों के डिजिटल हस्ताक्षर का दुरुपयोग भी आसानी से किया गया। अपना काम सुगम बनाने के लिए जीपीएफ घोटाला के इस खेल में बस्ती में तैनात लेखपाल राजेश पाठक को भी शामिल किया गया।
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इससे मामले में अब तक पांच लोगों की गिरफ्तारी के साथ ही जीपीएफ खातों से 1.58 करोड़ रुपया निकाले जाने की बात सामने आ चुकी है। जीपीएफ घोटाले की धरातल गोरखपुर चकबंदी विभाग में लेखाकार व दूसरा बस्ती जिला के हर्रेया तहसील में लेखपाल ने मिलकर तैयार की थी। इन दोनों ने इस खेल को अमल में लाने के लिए 45 खाते भी अलग अलग बैंकों में खोले। इस पूरे खेल से पर्दा तब उठा जब नवाबगंज स्थित भारतीय स्टेट बैंक के कुछ खातों में संदिग्ध तौर पर धनराशि आने की जानकारी हुई। पूरे मामले में गोरखपुर के रामगढ़ थाना के भरबलिया बुजुर्ग आजाद चौक निवासी अरुण वर्मा का नाम सबसे पहले सामने आया था जो चकबंदी विभाग गोरखपुर में लेखाकार था।
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काकस में शामिल सभी लोगों ने काल्पनिक नाम से सरकारी कर्मचारियों की आईडी तैयार कर फर्जी जीपीएफ बिल कोषागार भेज कर खाते में जमा जीपीएफ धनराशि को हड़पने का खेल किया। खाते से निकाली जाने वाली करोड़ों की धनराशि गोंडा, गोरखपुर व देवरिया के बैकों में अलग अलग नाम से खुले खातों में भेजकर जमा करायी जाती थी। खाते में जमा धनराशि के आधार पर कुछ निर्धारित कमीशन खातेदार को देने के बाद बाकी धनराशि निकाल ली जाती थी। (संवाद)
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कार्रवाई में चिह्नित हुए थे 45 खाताधारक
जीपीएफ घोटाले के आरोपितों के संपत्तियों का ब्यौरा भी पुलिस ने तैयार किया था। इसमें अरुण वर्मा का करीब ढाई करोड़ रुपये का एक मकान गोरखपुर में, दो करोड़ की जमीन, एक ज्वैलरी शॉप व 50 लाख की अन्य संपत्ति चिन्हित हुईं थीं। इसी तरह राजेश पाठक का करीब तीन करोड़ रुपये का एक हास्टल अयोध्या में, 50 लाख का एक मकान सहित करीब 50 लाख रुपये की अन्य संपत्ति मिलीं। नवाबगंज के 45 खाताधारकों भी चिन्हित किया गया, जिनके खातों में घपले की धनराशि भेजी गई थी। अब इस पूरे मामले की जांच एसआईटी करेगी और उन्हें ही विभाग अभिलेख सौंपेगा।
पूरे खेल में निशाने पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी
गोरखपुर के चकबंदी विभाग में लेखाकार के पद पर कार्यरत अरुण कुमार वर्मा ने जीपीएफ घोटाले की जमीन तैयार करने में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मी को साथ लेकर पूरा गोरखधंधा संचालित किया। इस खेल में कर्मचारियों की आइडी के आधार पर डिमांड आहरण-वितरण अधिकारी के पास भेेजकर, वहां से बिल बनाकर ट्रेजरी भेजने के बाद पूरा पैसा खाते में पैसा ट्रांसफर किया जाता था।
चकबंदी विभाग के कर्मियों पर खेला पूरा दांव
जीपीएफ घोटाले के मुख्य सूत्रधार चकबंदी विभाग में कार्यरत अरुण कुमार वर्मा ने चकबंदी विभाग के कर्मियों पर ही पूरा दांव खेला। विभाग स्तर पर बेहतर जानकारी के साथ ही अफसरों के डिजिटल हस्ताक्षर का दुरुपयोग भी आसानी से किया गया। अपना काम सुगम बनाने के लिए जीपीएफ घोटाला के इस खेल में बस्ती में तैनात लेखपाल राजेश पाठक को भी शामिल किया गया।