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जैविक खेती से बदली सूरत
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11द्दस्रड्डश्च5- गोंडा में किसान पार्थ त्रिपाठी
- फोटो : GONDA
गोंडा। कहते हैं जहां चाह वहीं राह है। ऐसा ही जिले के दो किसानों ने कर दिखाया है और पूरे देश में छा गए हैं। हम बात कर रहे हैं बेलसर ब्लाक के नियावां गांव के किसान जेपी तिवारी और परसदा के पार्थ त्रिपाठी की। इन्होंने खेती की दशा ही नहीं दिशा भी बदल दी है। किसान जेपी तिवारी ने तो जैविक खेती की पहल की और अब मिसाल बन चुके हैं। एक फीसदी भी रासायनिक उर्वरक का प्रयोग नहीं करते हैं और जैविक खाद के बल पर वह गेहूं और चावल पैदा कर रहे हैं। अब तो स्थिति यह है कि खेतों में फसल तैयार ही नहीं होती है कि उपज बिक जा रही है। कारण लोग जैविक खेती से पैदा हो रहे अनाज हासिल करने की होड़ में हैं। वहीं, दूसरे युवा किसान पार्थ तिवारी हैं, जिन्होंने खेती का पूरा स्वरूप ही बदल कर रख दिया है। उन्होंने तो देशभर के 50 हजार किसानों को अपनी टीम से जोड़ लिया है और एक कंपनी ही बना दी है। वह देश से बाहर किसानों की पैदावार को भेजते हैं, जिसमें सब्जी, फल व फूल के साथ ही शहद है। उनके साथ जिले के भी 100 से अधिक किसान जुड़े हैं। वह किसानों को व्यवसायिक प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के लिए जाने जाते हैं। दोनों किसानों की देश में अलग पहचान हो गई है।
एक तरफ जहां खेती से लोग मुंह मोड़कर व्यवसाय को प्राथमिकता दे रहे हैं वहीं नियावां के किसान जेपी तिवारी 20 साल से जैविक खेती कर रहे हैं। शुरुआती कुछ वर्षों में तो उन्हें दिक्कत आई, लेकिन फिर उनकी खेती परवान चढ़ने लगी। कोरोना संकट में इम्यूनिटी बूस्टर के लिए जैविक खेती से होने वाली उपज को लोग खोज रहे हैं और किसान जेपी तिवारी का नाम हर किसी के जुबां पर है। उन्होंने अमर उजाला को बताया कि 8 एकड़ में वह गेहूं और धान की बुवाई करते हैं। उन्हें सरकार की ओर से परम्परागत कृषि विकास के लिए सम्मान भी मिला है और उन्होंने 40 किसानों को जोड़ा था कि जैविक खेती करें। जिसमें 10 से 15 लोग अभी भी कर रहे हैं। बताया कि वह गाय के गोबर, गोमूत्र के साथ ही वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग बतौर खाद करते हैं।
गेहूं के साथ चना, मसूर, मेथी की बुवाई भी करते हैं, इससे नाइट्रोजन मिलता रहता है और उपज अच्छी होती है। धान के साथ दूसरी फसल नही बोते हैं लेकिन खेत तैयार करने के लिए टैंचा, मंग, उड़द, सनई बो देते हैं फिर जुताई कराकर इसको खाद के रूप में प्रयोग करते हैं। बताते हैं कि गेहूं में कनक ब्रांड जिसे बंशी भी कहतत हैं कि बुवाई करते हैं। इसकी रोटी अच्छी होती है और बासी रोटी भी खाई जा सकती है। पैदावार पर कहा कि कोई फर्क नही पड़ता है, एक बीघे में अब तीन से चार क्विंटल उपज हो जाता है। हर साल दोनों फसलों से वह छह से सात लाख रुपये की कमाई कर लेते हैं। वह जैविक खाद से ही सब्जी भी पैदा कर रहे हैं जिसकी काफी मांग है।
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किसान जेपी तिवारी की जैविक खेती को प्रतिष्ठित बिजनेस पत्रिका फोर्ब्स में स्थान मिला है। उनका इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है और इसी तरह किसान पार्थ त्रिपाठी को भी स्थान मिला है। सीडीओ शशांक त्रिपाठी ने फोर्ब्स पत्रिका के लेख को ट्वीट किया, जिसे पीएम, सीएम को भेजा है। उन्होंने गोंडा के लिए इसे गौरव की बात कही है।
परसदा के पार्थ त्रिपाठी किसानों के लिए वरदान से कम नही हैं, उन्होंने न सिर्फ खेती का तरीका बदला, बल्कि विदेशों में उपज पहुंचा कर किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने का काम किया है। उन्होंने किसानों को खेती शुरूआत कराने के साथ ही साथ बाजार देने का काम किया है। पार्थ तिवारी ने अमर उजाला को बताया कि बेलसर के परसदा व तरबगंज के परियावां में उनका प्लाट है और वहां पर वह खेती करते हैं। उन्होंने दो कंपनी भी बना रखी है एक खेती के लिए है जिसमें 50 हजार किसान जुड़ चुके हैं और दूसरा शहद व्यवसाय के लिए है। शहद का व्यापार वह विदेशों में करते हैं उनके यहां से शहद यूरोप के देशों जर्मनी, इंग्लैंड, स्पेन के साथ अमेरिका और खाड़ी देशों में जाता है। किसानों को स्थानीय बाजार से 30 फीसदी अधिक मूल्य मिल रहा है।
इसके अलावा फल, फूल व सब्जियों का भी निर्यात करते हैं। शहद के व्यवसाय से पांच हजार किसान जुड़े हैं जो उनकी कंपनी के माध्यम से व्यवसाय करते हैं। बताया कि कोविड संकट में कई देशों में शहद की मांग बढ़ी है, वहीं देश में भी मांग है। इससे काफी लाभ किसानों को मिल रहा हैव् बताया कि वह आधुनिक तकनीक से खेती करते हैं और कराते हैं, रसायन का प्रयोग कम ही होता है। बताया कि किसानों के सामने बाजार की समस्या होती थी, जिसे उन्होने दूर करने का प्रयास किया है। अब किसान खेती को आधुनिक तरीके से कर रहे हैं और उन्हें लाभ भी मिल रहा है। वह सब्जी के साथ ही शुगर फ्री आलू की खेती बडे स्तर पर कर रहे हैं और करा रहे हैं। जिसकी मांग भारत में ही बड़ी कंपनियां में है। इस तरह पार्थ त्रिपाठी किसानों के लिए एक मिसाल बन चुके हैं।
किसान जेपी तिवारी की जैविक खेती काफी अच्छी है और उनके उपज की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं पार्थ त्रिपाठी ने किसानों को नई ऊंचाई देने का काम किया है। यह जिले के लिए गौरव की बात है। मैंने दोनो के कार्य को देखा है और अच्छा लगा है। पार्थ त्रिपाठी को मुख्यमंत्री ने सर्वश्रेष्ठ किसान से सम्मानित भी किया है।
- डॉ. मुकुल त्रिपाठी, उप निदेशक, कृषि
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एक तरफ जहां खेती से लोग मुंह मोड़कर व्यवसाय को प्राथमिकता दे रहे हैं वहीं नियावां के किसान जेपी तिवारी 20 साल से जैविक खेती कर रहे हैं। शुरुआती कुछ वर्षों में तो उन्हें दिक्कत आई, लेकिन फिर उनकी खेती परवान चढ़ने लगी। कोरोना संकट में इम्यूनिटी बूस्टर के लिए जैविक खेती से होने वाली उपज को लोग खोज रहे हैं और किसान जेपी तिवारी का नाम हर किसी के जुबां पर है। उन्होंने अमर उजाला को बताया कि 8 एकड़ में वह गेहूं और धान की बुवाई करते हैं। उन्हें सरकार की ओर से परम्परागत कृषि विकास के लिए सम्मान भी मिला है और उन्होंने 40 किसानों को जोड़ा था कि जैविक खेती करें। जिसमें 10 से 15 लोग अभी भी कर रहे हैं। बताया कि वह गाय के गोबर, गोमूत्र के साथ ही वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग बतौर खाद करते हैं।
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गेहूं के साथ चना, मसूर, मेथी की बुवाई भी करते हैं, इससे नाइट्रोजन मिलता रहता है और उपज अच्छी होती है। धान के साथ दूसरी फसल नही बोते हैं लेकिन खेत तैयार करने के लिए टैंचा, मंग, उड़द, सनई बो देते हैं फिर जुताई कराकर इसको खाद के रूप में प्रयोग करते हैं। बताते हैं कि गेहूं में कनक ब्रांड जिसे बंशी भी कहतत हैं कि बुवाई करते हैं। इसकी रोटी अच्छी होती है और बासी रोटी भी खाई जा सकती है। पैदावार पर कहा कि कोई फर्क नही पड़ता है, एक बीघे में अब तीन से चार क्विंटल उपज हो जाता है। हर साल दोनों फसलों से वह छह से सात लाख रुपये की कमाई कर लेते हैं। वह जैविक खाद से ही सब्जी भी पैदा कर रहे हैं जिसकी काफी मांग है।
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किसान जेपी तिवारी की जैविक खेती को प्रतिष्ठित बिजनेस पत्रिका फोर्ब्स में स्थान मिला है। उनका इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है और इसी तरह किसान पार्थ त्रिपाठी को भी स्थान मिला है। सीडीओ शशांक त्रिपाठी ने फोर्ब्स पत्रिका के लेख को ट्वीट किया, जिसे पीएम, सीएम को भेजा है। उन्होंने गोंडा के लिए इसे गौरव की बात कही है।
परसदा के पार्थ त्रिपाठी किसानों के लिए वरदान से कम नही हैं, उन्होंने न सिर्फ खेती का तरीका बदला, बल्कि विदेशों में उपज पहुंचा कर किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने का काम किया है। उन्होंने किसानों को खेती शुरूआत कराने के साथ ही साथ बाजार देने का काम किया है। पार्थ तिवारी ने अमर उजाला को बताया कि बेलसर के परसदा व तरबगंज के परियावां में उनका प्लाट है और वहां पर वह खेती करते हैं। उन्होंने दो कंपनी भी बना रखी है एक खेती के लिए है जिसमें 50 हजार किसान जुड़ चुके हैं और दूसरा शहद व्यवसाय के लिए है। शहद का व्यापार वह विदेशों में करते हैं उनके यहां से शहद यूरोप के देशों जर्मनी, इंग्लैंड, स्पेन के साथ अमेरिका और खाड़ी देशों में जाता है। किसानों को स्थानीय बाजार से 30 फीसदी अधिक मूल्य मिल रहा है।
इसके अलावा फल, फूल व सब्जियों का भी निर्यात करते हैं। शहद के व्यवसाय से पांच हजार किसान जुड़े हैं जो उनकी कंपनी के माध्यम से व्यवसाय करते हैं। बताया कि कोविड संकट में कई देशों में शहद की मांग बढ़ी है, वहीं देश में भी मांग है। इससे काफी लाभ किसानों को मिल रहा हैव् बताया कि वह आधुनिक तकनीक से खेती करते हैं और कराते हैं, रसायन का प्रयोग कम ही होता है। बताया कि किसानों के सामने बाजार की समस्या होती थी, जिसे उन्होने दूर करने का प्रयास किया है। अब किसान खेती को आधुनिक तरीके से कर रहे हैं और उन्हें लाभ भी मिल रहा है। वह सब्जी के साथ ही शुगर फ्री आलू की खेती बडे स्तर पर कर रहे हैं और करा रहे हैं। जिसकी मांग भारत में ही बड़ी कंपनियां में है। इस तरह पार्थ त्रिपाठी किसानों के लिए एक मिसाल बन चुके हैं।
किसान जेपी तिवारी की जैविक खेती काफी अच्छी है और उनके उपज की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं पार्थ त्रिपाठी ने किसानों को नई ऊंचाई देने का काम किया है। यह जिले के लिए गौरव की बात है। मैंने दोनो के कार्य को देखा है और अच्छा लगा है। पार्थ त्रिपाठी को मुख्यमंत्री ने सर्वश्रेष्ठ किसान से सम्मानित भी किया है।
- डॉ. मुकुल त्रिपाठी, उप निदेशक, कृषि