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कलेक्ट्रेट सवंर्ग के कामकाज पर डीएम ने उठाए सवाल
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गोंडा। प्रशासनिक कामकाज में कुछ तो ऐसा है, जिससे लोगों को न्याय मिलने में देरी होती है। ऐसी कुछ बातें जिला पंचायत सभागार में उप्र मिनिस्ट्रीरियल कलेक्ट्रेट कर्मचारी संघ के नव निर्वाचित पदाधिकारियों के शपथ ग्रहण समारोह में बाहर भी आईं।
मुख्य अतिथि जिलाधिकारी मार्कंडेय शाही ने कलेक्ट्रेट संवर्ग को नसीहतें दीं और कहा कि फाइलों की टिप्पणियों में अब बेबाकी नही दिखती, इससे निर्णय लेने में देरी होती है और फाइलों के निस्तारण में देरी होती है।
उन्होंने कहा कि नियमों का स्पष्ट उल्लेख करके साफ-साफ लिखने में अब कमी आई है, पहले के कलेक्ट्रेट कर्मियों से नए लोगों को सीखने की जरूरत है। नवनियुक्त अध्यक्ष मनमोहन अरोरा ने बेबाकी से कहा कि कर्मचारी की समस्याओं के लिए बार- बार अधिकारियों से मिलने पर वह समझने लगते हैं कि नेतागिरी हो रही है।
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जिलाधिकारी मार्कंडेय शाही ने कहा कि सरकारी सेवा में नियमों का पालन लाजमी और अपेक्षित होता है। कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के समक्ष फरियाद लेकर पहुंचने वाले के लिए कम्पैशन (दया भाव) होना चाहिए। कल हम भी सेवानिवृत्त होंगे, यह बात भूल जाते हैं।
कलेक्ट्रेट संवर्ग में अब पहले जैसी मेधा नहीं दिख रही है। पहले के नोटशीट में अधिकारी को कामा, फुल स्टाप देखने की जरूरत नहीं पड़ती थी, किन्तु अब ऐसा नहीं है। वरिष्ठ या तो कनिष्ठों को प्रशिक्षित नहीं करना चाहते अथवा कनिष्ठ खुद ही दीक्षित नहीं होना चाहते।
डीएम ने कहा कि मिनिस्ट्रीरियल स्टाफ से ‘निर्णय लेना चाहें’ जैसी टिप्पणी अपेक्षित नहीं है। आप विधि सम्मत तरीके से बेबाक टिप्पणी लिख दें कि नियमों के अनुरूप यह कार्य हो सकता है अथवा नहीं, संभव हो तो उसका विकल्प भी लिख दें। पत्रावलियाें के रखरखाव की स्थिति भी काफी लचर है।
नोटशीट ठीक से न बनने के साथ ही पेज नंबर भी नहीं डाला जाता है। नव नियुक्त अध्यक्ष मनमोहन अरोरा ने कहा कि उनके लिए यह पद दोधारी तलवार पर चलने के समान है। उनके समक्ष एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई है। वह किसी भी मामले में जिलाधिकारी के खिलाफ जा नहीं सकते, किंतु साथ ही उन कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए भी अपने पदीय दायित्वों से विमुख नहीं हो सकते।
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मुख्य अतिथि जिलाधिकारी मार्कंडेय शाही ने कलेक्ट्रेट संवर्ग को नसीहतें दीं और कहा कि फाइलों की टिप्पणियों में अब बेबाकी नही दिखती, इससे निर्णय लेने में देरी होती है और फाइलों के निस्तारण में देरी होती है।
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उन्होंने कहा कि नियमों का स्पष्ट उल्लेख करके साफ-साफ लिखने में अब कमी आई है, पहले के कलेक्ट्रेट कर्मियों से नए लोगों को सीखने की जरूरत है। नवनियुक्त अध्यक्ष मनमोहन अरोरा ने बेबाकी से कहा कि कर्मचारी की समस्याओं के लिए बार- बार अधिकारियों से मिलने पर वह समझने लगते हैं कि नेतागिरी हो रही है।
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जिलाधिकारी मार्कंडेय शाही ने कहा कि सरकारी सेवा में नियमों का पालन लाजमी और अपेक्षित होता है। कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के समक्ष फरियाद लेकर पहुंचने वाले के लिए कम्पैशन (दया भाव) होना चाहिए। कल हम भी सेवानिवृत्त होंगे, यह बात भूल जाते हैं।
कलेक्ट्रेट संवर्ग में अब पहले जैसी मेधा नहीं दिख रही है। पहले के नोटशीट में अधिकारी को कामा, फुल स्टाप देखने की जरूरत नहीं पड़ती थी, किन्तु अब ऐसा नहीं है। वरिष्ठ या तो कनिष्ठों को प्रशिक्षित नहीं करना चाहते अथवा कनिष्ठ खुद ही दीक्षित नहीं होना चाहते।
डीएम ने कहा कि मिनिस्ट्रीरियल स्टाफ से ‘निर्णय लेना चाहें’ जैसी टिप्पणी अपेक्षित नहीं है। आप विधि सम्मत तरीके से बेबाक टिप्पणी लिख दें कि नियमों के अनुरूप यह कार्य हो सकता है अथवा नहीं, संभव हो तो उसका विकल्प भी लिख दें। पत्रावलियाें के रखरखाव की स्थिति भी काफी लचर है।
नोटशीट ठीक से न बनने के साथ ही पेज नंबर भी नहीं डाला जाता है। नव नियुक्त अध्यक्ष मनमोहन अरोरा ने कहा कि उनके लिए यह पद दोधारी तलवार पर चलने के समान है। उनके समक्ष एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई है। वह किसी भी मामले में जिलाधिकारी के खिलाफ जा नहीं सकते, किंतु साथ ही उन कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए भी अपने पदीय दायित्वों से विमुख नहीं हो सकते।