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स्वतंत्रता सेनानी की विरासत को संभाल रही पुत्री
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 11 Aug 2015 11:16 PM IST
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पहले अंग्रेजी सेना से बाद में अंग्रेजों से लड़कर देश की आजादी में योगदान देने वाले सपूत को उनके अंतिम सांस के समय देशी गुलामी की टीस सालती रही। कोई बेटा न होने के कारण बेटी ही उनकी विरासत को आगे बढ़ाने में लगी है, लेकिन शासन-प्रशासन के रवैये से यह आजाद हिंद फौज का सिपाही खुश नहीं था और अब उनकी बेटी व उनका परिवार भी खुश नहीं है।
वीर सपूत के निधन पर कोई जनप्रतिनिधि तक नहीं गया था। एक मात्र तहसील स्तर के अधिकारी ने पहुंच कर पांच हजार रुपये देकर उनकी अंत्येष्टि में अपना योगदान देकर सरकारी रवैये की असली तस्वीर दिखा दी थी। गोंडा नगर से लखनऊ मार्ग की ओर आगे बढ़ने पर करनैलगंज तहसील की सोनहरा ग्राम पंचायत का बुधई पुरवा में आज भी रामअछैबर तिवारी का नाम बड़े अदब से लिया जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की थाती को संजोए उनकी बेटी व दामाद कहते हैं कि उनके पिता रामअछैबर तिवारी 1931 में अंग्रेज सरकार की फौज में भर्ती हुए। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों की ओर से उन्हें लड़ने के लिए भेजा गया।
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युद्ध के दौरान रामअछैबर तिवारी को जर्मन सरकार द्वारा बंदी बना लिया गया। इस दौरान उनकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। उसी समय आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मन गए और उनके प्रयास से रामअछैबर तिवारी मुक्त हुए।
इसके बाद रामअछैबर तिवारी आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए और भारत माता की जय बोलते हुए अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। इसी दौरान भारत की अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वे जेल में रहे। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो उन्हें रिहा किया गया।
आजाद हिंद फौज के इस सिपाही को देश में आजादी के बाद किसी ने नहीं पूछा। वह अपने घर चले आए और किसी तरह परिवार चलाने लगे। उनके कोई बेटा नहीं था, इसलिए बेटी के साथ रहने लगे। साठ के दशक में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जापान गईं तो जापान सरकार ने उनसे पूछा कि आपने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के लिए क्या किया।
आजादी के करीब 25 वर्ष बाद देश की सरकार को इन सेनानियों की याद आई और 15 अगस्त 1972 को इंदिरा गांधी ने रामअछैबर तिवारी को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया और पेंशन मिलने लगी। घर की पूंजी गंवा चुके रामअछैबर तिवारी का निधन वर्ष 2007 में हो गया। लेकिन उनकी अंतिम सांस तक शासन व प्रशासन द्वारा सेनानियों के प्रति अपनाए जा रहे रवैये से वह दुखी थे।
इस सेनानी के परिवार को न तो कोई भूमि मिली और न ही किसी प्रकार की सहायता। सेनानी की पुत्री लल्ली देवी व दामाद जयचंद्र मिश्र ने बताया कि उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने कोई जनप्रतिनिधि या वरिष्ठ अधिकारी नहीं आया। केवल करनैलगंज के एसडीएम को भेजा गया तो वे अंत्येष्टि के लिए पांच हजार रुपये देकर लौट गए।
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वीर सपूत के निधन पर कोई जनप्रतिनिधि तक नहीं गया था। एक मात्र तहसील स्तर के अधिकारी ने पहुंच कर पांच हजार रुपये देकर उनकी अंत्येष्टि में अपना योगदान देकर सरकारी रवैये की असली तस्वीर दिखा दी थी। गोंडा नगर से लखनऊ मार्ग की ओर आगे बढ़ने पर करनैलगंज तहसील की सोनहरा ग्राम पंचायत का बुधई पुरवा में आज भी रामअछैबर तिवारी का नाम बड़े अदब से लिया जाता है।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की थाती को संजोए उनकी बेटी व दामाद कहते हैं कि उनके पिता रामअछैबर तिवारी 1931 में अंग्रेज सरकार की फौज में भर्ती हुए। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों की ओर से उन्हें लड़ने के लिए भेजा गया।
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युद्ध के दौरान रामअछैबर तिवारी को जर्मन सरकार द्वारा बंदी बना लिया गया। इस दौरान उनकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। उसी समय आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मन गए और उनके प्रयास से रामअछैबर तिवारी मुक्त हुए।
इसके बाद रामअछैबर तिवारी आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए और भारत माता की जय बोलते हुए अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। इसी दौरान भारत की अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वे जेल में रहे। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो उन्हें रिहा किया गया।
आजाद हिंद फौज के इस सिपाही को देश में आजादी के बाद किसी ने नहीं पूछा। वह अपने घर चले आए और किसी तरह परिवार चलाने लगे। उनके कोई बेटा नहीं था, इसलिए बेटी के साथ रहने लगे। साठ के दशक में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जापान गईं तो जापान सरकार ने उनसे पूछा कि आपने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के लिए क्या किया।
आजादी के करीब 25 वर्ष बाद देश की सरकार को इन सेनानियों की याद आई और 15 अगस्त 1972 को इंदिरा गांधी ने रामअछैबर तिवारी को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया और पेंशन मिलने लगी। घर की पूंजी गंवा चुके रामअछैबर तिवारी का निधन वर्ष 2007 में हो गया। लेकिन उनकी अंतिम सांस तक शासन व प्रशासन द्वारा सेनानियों के प्रति अपनाए जा रहे रवैये से वह दुखी थे।
इस सेनानी के परिवार को न तो कोई भूमि मिली और न ही किसी प्रकार की सहायता। सेनानी की पुत्री लल्ली देवी व दामाद जयचंद्र मिश्र ने बताया कि उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने कोई जनप्रतिनिधि या वरिष्ठ अधिकारी नहीं आया। केवल करनैलगंज के एसडीएम को भेजा गया तो वे अंत्येष्टि के लिए पांच हजार रुपये देकर लौट गए।