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प्रवासी पक्षियों की अठखेलियों से गूंजा पार्वती अरगा पक्षी विहार
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फोटो- 19- गोंडा के वजीरगंज पार्वती अरगा पक्षी विहार में प्रवासी पक्षी। संवाद
- फोटो : GONDA
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गोंडा। वजीरगंज के पार्वती अरगा पक्षी विहार में विदेश पक्षियां आ गईं हैं। उनकी अठखेलियों से पक्षी विहार गूंज रहा है। बाहर से लोग पक्षी विहार का आनंद भी उठा रहे हैं। इससे अरगा-पार्वती झील की रौनक बढ़ गई है। यहां देशी-विदेशी पक्षियों का जमावड़ा लगने लगा है। मध्य एशिया व तिब्बत से लंबी दूरी तय करके आने वाले पक्षियों का कलरव इस झील में गूंज रहा है। जिले से 30 किमी दूर टिकरी मार्ग पर ग्राम कोठा की झील अरगा व बहादुरा ग्राम में पार्वती झील एवं वजीरगंज कस्बे से सटी कोडर झील का अपना विशेष महत्व है।
करीब पांच किमी क्षेत्र में फैली अरगा-पार्वती झील में अन्य पक्षियों के अलावा सैकड़ों सारस भी अपने-अपने जोड़े के साथ आ चुके हैं। प्रवासी पक्षी यहां अधिकांश प्रवासी पक्षी लेह, लद्दाख, साइबेरिया, मंगोलिया, तिब्बत और राजस्थान से आए हैं। इनमें ब्राउन हेडेड गल यानि भूरा सिर ढोमरा, और ब्लैक हेडेड गल यानि काला सिर ढोमरा, जल कुकरी, पनचौरा आदि परिंदे हैं। इसमें पनजौरा प्रजाति प्रजनन भी करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबेरियन पक्षियों का शरीर गरम वातावरण के अनुकूल है और साइबेरिया में ठंड के मौसम में उनका जीना नामुमकिन हो जाता है। इसलिए दूर-देश से ये पक्षी जीवन रक्षा के लिए यहां आते हैं। वहीं तिब्बत से आने वाले पक्षियों में छोटी मुर्गाबी, नकटा, गिर्री व सुर्खाब, मध्य एशिया से आने वाले पक्षियों में काज, चट्टा व लगलग प्रमुख हैं। इसके अलावा स्थानीय व बाहरी पक्षियों में काला तीतर, भूरा तीतर, बटेर, रंगीन बटेर, लक बटेर, पहाड़ी भट तीतर, भट तीतर, जंगली मैना, अगरका, खजन, लाल मोनिया, बया, छपका, नीलकंठ, धनेश, कठफोड़वा, बाज, चील और हरियल आदि पक्षी शामिल हैं। देश के विभिन्न स्थानों से राम नगरी अयोध्या आने वाले श्रद्धालु भी अरगा-पार्वती झील में पक्षियों का कलरव देखने जाते हैं, क्योंकि अयोध्या से अरगा-पार्वती झील मात्र 23 किमी दूर है। वहीं मधवापुर सती अनुसुइया आश्रम को जाने वाले श्रद्धालु भी अरगा-पार्वती झील में पक्षियों को देखने जाते हैं। यहां कोडर झील व पथरी झील भी है, लेकिन पक्षियों का जमावड़ा सिर्फ अरगा व पार्वती झील में ही रहता है। विदेशी पक्षी मेहमानों का आगमन नवंबर से शुरू हो जाता है और इनका पड़ाव फरवरी तक रहता है।
सैलानियों को रास नहीं आ रही है अव्यवस्था
पक्षी बिहार में आने वाले सैलानियों को अव्यवस्था रास नहीं आ रहा है। सरकारी नल व पेयजल की टोटियां दिखावा बना हुआ है।बीते एक पखवारे से नल व पेयजल की टोटियां खराब हैं। नौका विहार हेतु यहां रखे वाटर बोट भी खराब है, जिसका कोई पुरसा हाल नहीं है। झील के आसपास के लोगों का कहना है कि पझी विहार के सौंदर्यीकरण के लिए आया धन का बंदर-बांट हो जाने से रख-रखाव में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके संबंधित विभाग के अधिकारी चुप्पी साधे हैं।
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अरगा-पार्वती झील को गोखुर झील भी कहा जाता है। ये झील गाय के खुर के जैसी है। यहां का मौसम विदेशी पक्षियों को खूब भाता है। भारतीय वन जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में कम्युनिटी रिजर्व का प्रावधान है। ऐसे में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अरगा- पार्वती झील को पक्षी विहार के तौर पर विकसित किया जा सकता है। राजकुमार शर्मा, रेंजर, टिकरी।
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करीब पांच किमी क्षेत्र में फैली अरगा-पार्वती झील में अन्य पक्षियों के अलावा सैकड़ों सारस भी अपने-अपने जोड़े के साथ आ चुके हैं। प्रवासी पक्षी यहां अधिकांश प्रवासी पक्षी लेह, लद्दाख, साइबेरिया, मंगोलिया, तिब्बत और राजस्थान से आए हैं। इनमें ब्राउन हेडेड गल यानि भूरा सिर ढोमरा, और ब्लैक हेडेड गल यानि काला सिर ढोमरा, जल कुकरी, पनचौरा आदि परिंदे हैं। इसमें पनजौरा प्रजाति प्रजनन भी करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबेरियन पक्षियों का शरीर गरम वातावरण के अनुकूल है और साइबेरिया में ठंड के मौसम में उनका जीना नामुमकिन हो जाता है। इसलिए दूर-देश से ये पक्षी जीवन रक्षा के लिए यहां आते हैं। वहीं तिब्बत से आने वाले पक्षियों में छोटी मुर्गाबी, नकटा, गिर्री व सुर्खाब, मध्य एशिया से आने वाले पक्षियों में काज, चट्टा व लगलग प्रमुख हैं। इसके अलावा स्थानीय व बाहरी पक्षियों में काला तीतर, भूरा तीतर, बटेर, रंगीन बटेर, लक बटेर, पहाड़ी भट तीतर, भट तीतर, जंगली मैना, अगरका, खजन, लाल मोनिया, बया, छपका, नीलकंठ, धनेश, कठफोड़वा, बाज, चील और हरियल आदि पक्षी शामिल हैं। देश के विभिन्न स्थानों से राम नगरी अयोध्या आने वाले श्रद्धालु भी अरगा-पार्वती झील में पक्षियों का कलरव देखने जाते हैं, क्योंकि अयोध्या से अरगा-पार्वती झील मात्र 23 किमी दूर है। वहीं मधवापुर सती अनुसुइया आश्रम को जाने वाले श्रद्धालु भी अरगा-पार्वती झील में पक्षियों को देखने जाते हैं। यहां कोडर झील व पथरी झील भी है, लेकिन पक्षियों का जमावड़ा सिर्फ अरगा व पार्वती झील में ही रहता है। विदेशी पक्षी मेहमानों का आगमन नवंबर से शुरू हो जाता है और इनका पड़ाव फरवरी तक रहता है।
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सैलानियों को रास नहीं आ रही है अव्यवस्था
पक्षी बिहार में आने वाले सैलानियों को अव्यवस्था रास नहीं आ रहा है। सरकारी नल व पेयजल की टोटियां दिखावा बना हुआ है।बीते एक पखवारे से नल व पेयजल की टोटियां खराब हैं। नौका विहार हेतु यहां रखे वाटर बोट भी खराब है, जिसका कोई पुरसा हाल नहीं है। झील के आसपास के लोगों का कहना है कि पझी विहार के सौंदर्यीकरण के लिए आया धन का बंदर-बांट हो जाने से रख-रखाव में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके संबंधित विभाग के अधिकारी चुप्पी साधे हैं।
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अरगा-पार्वती झील को गोखुर झील भी कहा जाता है। ये झील गाय के खुर के जैसी है। यहां का मौसम विदेशी पक्षियों को खूब भाता है। भारतीय वन जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में कम्युनिटी रिजर्व का प्रावधान है। ऐसे में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अरगा- पार्वती झील को पक्षी विहार के तौर पर विकसित किया जा सकता है। राजकुमार शर्मा, रेंजर, टिकरी।