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प्राचीन बरखंडी नाथ महादेव मंदिर
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 23 Aug 2015 11:22 PM IST
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करनैलगंज नगर से मात्र तीन किलोमीटर दूर हुजूरपुर रोड पर स्थित प्राचीन बरखंडी नाथ महादेव मंदिर पर सावन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। यहां भक्तों की मन की सभी मुरादें पूरी होती हैं।
क्षेत्र का यह सबसे प्राचीन मंदिर है तथा मंदिर के शिवलिंग की गहराई का आज तक किसी को पता नहीं चल पाया है। बताया जाता है कि जब करनैलगंज क्षेत्र पूरा एक जंगल के रूप में था, तब जंगल में चरवाहे अपने जानवरों को चराने के लिए आते थे तथा मूंज को एकत्र कर उसे कूटते और फिर रस्सी बनाते थे।
एक दिन जिस पत्थर पर मूंज कूट रहे थे अचानक उससे खून निकलने लगा। इसकी सूचना क्षेत्र में फैल गई तो लोगों का जमावड़ा लग गया। तब श्रावस्ती के राजा को इसकी सूचना मिली। वे हाथी व घोड़ों के साथ वहां पहुंचे और जंजीर में बांध कर पत्थर को हाथी से खिंचवाने लगे, मगर पत्थर को नहीं निकाल सके।
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तब उसकी खोदाई कर निकालने की कोशिश की, फिर भी नाकाम रहने एवं पत्थर से खून की धार बहने से रोक नहीं सके और खुद बीमार पड़ गए। बाद में उन्होंने सपना देखा कि मंदिर बनवाने से ठीक हो सकते हैं तो वहां मंदिर का निर्माण कराया तथा पुजारी नियुक्त कर दिया।
तभी से मंदिर में लगातार पूजन होता है। हर वर्ष यज्ञ अनुष्ठान एवं रुद्राभिषेक कार्यक्रम होता है। इसमें शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वती स्वयं भाग लेने आते हैं।
मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि मंदिर का जो भी पुजारी होगा, वह जीवन में कभी भी विवाह नहीं करेगा। प्रथम पुजारी की बत्तीसवीं पीढ़ी के मौजूदा महंत सुनील पुरी मंदिर की देखरेख करते हैं। प्रत्येक सोमवार तथा नवरात्रि, कजरी तीज, शिवरात्रि व सावन में प्रत्येक दिन भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए आते हैं। कजरी तीज को यहां करीब एक लाख श्रद्धालु जल चढ़ाते हैं तथा मन की मुरादें मांगते हैं।
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क्षेत्र का यह सबसे प्राचीन मंदिर है तथा मंदिर के शिवलिंग की गहराई का आज तक किसी को पता नहीं चल पाया है। बताया जाता है कि जब करनैलगंज क्षेत्र पूरा एक जंगल के रूप में था, तब जंगल में चरवाहे अपने जानवरों को चराने के लिए आते थे तथा मूंज को एकत्र कर उसे कूटते और फिर रस्सी बनाते थे।
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एक दिन जिस पत्थर पर मूंज कूट रहे थे अचानक उससे खून निकलने लगा। इसकी सूचना क्षेत्र में फैल गई तो लोगों का जमावड़ा लग गया। तब श्रावस्ती के राजा को इसकी सूचना मिली। वे हाथी व घोड़ों के साथ वहां पहुंचे और जंजीर में बांध कर पत्थर को हाथी से खिंचवाने लगे, मगर पत्थर को नहीं निकाल सके।
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तब उसकी खोदाई कर निकालने की कोशिश की, फिर भी नाकाम रहने एवं पत्थर से खून की धार बहने से रोक नहीं सके और खुद बीमार पड़ गए। बाद में उन्होंने सपना देखा कि मंदिर बनवाने से ठीक हो सकते हैं तो वहां मंदिर का निर्माण कराया तथा पुजारी नियुक्त कर दिया।
तभी से मंदिर में लगातार पूजन होता है। हर वर्ष यज्ञ अनुष्ठान एवं रुद्राभिषेक कार्यक्रम होता है। इसमें शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वती स्वयं भाग लेने आते हैं।
मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि मंदिर का जो भी पुजारी होगा, वह जीवन में कभी भी विवाह नहीं करेगा। प्रथम पुजारी की बत्तीसवीं पीढ़ी के मौजूदा महंत सुनील पुरी मंदिर की देखरेख करते हैं। प्रत्येक सोमवार तथा नवरात्रि, कजरी तीज, शिवरात्रि व सावन में प्रत्येक दिन भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए आते हैं। कजरी तीज को यहां करीब एक लाख श्रद्धालु जल चढ़ाते हैं तथा मन की मुरादें मांगते हैं।