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रायपुर की 40 हजार बीघा जमीन लील गई घाघरा
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 01 Jul 2015 10:56 PM IST
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40 हजार बीघे के दायरे में आने वाले इस गांव के एक दर्जन मजरों में रहने वाले लोग घर से बेघर होकर या तो शरणार्थियों की तरह बंधे पर गुजर-बसर कर रहे हैं या फिर अपनी रिश्तेदारी के गांवों में। हालत यह है कि गांव की केवल 300 बीघे जमीन ही बंधे के इस पार लोगों के रहने को बची है। वो देर-सबेर बंधा कटने पर उसमें समा सकती है। जिसे लेकर लोगों में दहशत के साथ मायूसी छाई है। वहीं बाढ़ के डर से गांव छोड़ बंधे पर आए लोगों को एक जून की रोटी के भी लाले हो चले हैं।
65 वर्षीय मांझा रायपुर गांव निवासी भगवान दास बताते हैं कि इधर पांच साल में घाघरा नदी ने जिस तरह से इलाके में अपना तांडव मचाया है, उससे 40 हजार बीघे में बसे रायपुर व उसके एक दर्जन मजरों का वजूद पूरी तरह से खत्म हो गया। नदी में आने वाली बाढ़ ने उनके सिर्फ घर ही नहीं छीने, बल्कि गांव के गांव भी उसकी आगोश में आकर साफ हो गए। आज हालत यह है कि इस गांव की केवल 300 बीघे जमीन ही बंधे के इस पार लोगों के रहने लायक बची है। लेकिन देर-सबेर अगर बंधा कटा तो रायपुर गांव का वजूद भी साफ हो जाएगा।
वहीं गांव के प्रधान अकबाल, बहादुर, गद्दे आदि की मानें तो तीन दिनों से गांव में रहने वाली 300 आबादी की जान अटकी हुई है। लोगों से गांव तो खाली करा लिया गया है, लेकिन उनके रहने के लिए अभी तक प्रशासनिक स्तर पर किसी तरह की मदद मुहैया नहीं कराई गई है। यहां तक कि बंधे पर बसे लोगों को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ा है। छोटे-छोटे बच्चे एक जून की रोटी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं।
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वह लोग लगातार प्रशासन से अस्थाई तौर पर किसी सुरक्षित स्थान पर दो बिस्वा जमीन रहने के लिए मांग रहे हैं। लेकिन अभी तक उन्हें इसकी भी व्यवस्था नहीं कराई जा सकी है।
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65 वर्षीय मांझा रायपुर गांव निवासी भगवान दास बताते हैं कि इधर पांच साल में घाघरा नदी ने जिस तरह से इलाके में अपना तांडव मचाया है, उससे 40 हजार बीघे में बसे रायपुर व उसके एक दर्जन मजरों का वजूद पूरी तरह से खत्म हो गया। नदी में आने वाली बाढ़ ने उनके सिर्फ घर ही नहीं छीने, बल्कि गांव के गांव भी उसकी आगोश में आकर साफ हो गए। आज हालत यह है कि इस गांव की केवल 300 बीघे जमीन ही बंधे के इस पार लोगों के रहने लायक बची है। लेकिन देर-सबेर अगर बंधा कटा तो रायपुर गांव का वजूद भी साफ हो जाएगा।
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वहीं गांव के प्रधान अकबाल, बहादुर, गद्दे आदि की मानें तो तीन दिनों से गांव में रहने वाली 300 आबादी की जान अटकी हुई है। लोगों से गांव तो खाली करा लिया गया है, लेकिन उनके रहने के लिए अभी तक प्रशासनिक स्तर पर किसी तरह की मदद मुहैया नहीं कराई गई है। यहां तक कि बंधे पर बसे लोगों को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ा है। छोटे-छोटे बच्चे एक जून की रोटी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं।
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वह लोग लगातार प्रशासन से अस्थाई तौर पर किसी सुरक्षित स्थान पर दो बिस्वा जमीन रहने के लिए मांग रहे हैं। लेकिन अभी तक उन्हें इसकी भी व्यवस्था नहीं कराई जा सकी है।