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पूरे दिन होती रही या अली या हुसैन या अब्बास की सदाएं बुलंद

Thu, 19 Aug 2021 10:50 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 19 Aug 2021 10:50 PM IST
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Whether Ali or Hussain or Abbas's ever-elevating continued throughout the day
पैगम्बरे-इस्लाम के नवासे शोहदाए कर्बला हजरत इमाम हुसैन और उनके जांनिसार साथी जिन्होंने इस्लाम और इंसानियत बका के लिए शहादत तो कुबूल की लेकिन यजीद की बैयत कुबूल न की। इन्हीं शोहदाए कर्बला की याद में बृहस्पतिवार को नगर सहित कस्बों तथा मुस्लिम बहुल गांवों में अकीदतमंदों ने घरों में ही नौहाख्वानी, मातम एवं सीनाजनी की।
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मुस्लिम बहुल मुहल्लों में पूरे दिन घरों से या अली या हुसैन या अब्बास हाए सकीना की सदाएं बुलंद होती रहीं। अजादारे हुसैन ने फर्शे-अजा बिछायी तथा घर के सदस्यों के साथ ही जिक्रे शोहदाए-कर्बला की तथा मसाएबे शोहदाए-कर्बला पढ़ा। देर शाम लोगों ने फातिहाख्वानी एवं नज्र-ओ-नेयाज किया। पूर्व में लोग इमाम चौक पर नौ मुहर्रम को विभिन्न चौक पर ताजिये रखते थे। इस दौरान विभिन्न अंजुमनों के लोगों द्वारा मातम, जंजीर का मातम, नौहाख्वानी एवं सीनाजनी की जाती थी। इस वर्ष भी पहली मुहर्रम से आज तक न कोई जुलूस निकला और न ही सार्वजनिक मजलिसें हुईं। कोविड-19 की गाइडलाइन के अनुपालन के मद्देनजर पिछले दिनों हुई पीस कमेटी की बैठकों में इसके लिए शासन की तरफ से मना किया गया था। ताजिएदारों को सीमित संख्या में कर्बला से मिट्टी लाने एवं दस मुहर्रम को सीमित संख्या में इसे कर्बला ले जाकर दफ्न करने की इजाजत दी गई थी।
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जंगे-कर्बला दो विपरीत विचारधाराओं की जंग थी
माहे-मुहर्रम की दसवीं तारीख, जिसे यौमे आशूरह के नाम से जाना जाता है, मजहबे इस्लाम में विशेष महत्व रखता है। आज ही के दिन कर्बला की तपती रेत पर तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहते हुए पैगंबरे-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके जांनिसार साथियों की शहादत का मंजर सामने आया था।
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इमाम ने कुर्बानी न दी होती तो इस्लाम का वास्तविक स्वरूप ही बदल गया होता। जंगे-कर्बला दो शाहजादों की जंग नहीं थी बल्कि दो विपरीत विचारधाराओं की जंग थी, यानि हक और बातिल की जंग थी। इमाम आली मकाम ने यह जंग यजीद से लड़ी, जाहिरी तौर पर इमाम का सर कलम हो गया, घर उजड़ गया, खैमे जला दिये गये, बीमार को बेड़ियों में जकड़ा गया, एक ही रसन (रस्सी) में बारह लोगों को बांधा गया, पर्दानशीं महिलाओं को खुले सर बाजारों में घुमाया गया। बावजूद इसके यजीद यह जंग हार गया। इमाम शहीद होकर भी मकसद में कामयाब रहे। कर्बला ऐसी दर्सगाह है, जहां हमें इंसानियत का दर्स मिलता है। इमाम की नजर में खुद एवं अजीजों के साथ ही छह माह के मासूम बेटे असगर से अधिक इंसानियत के उसूल थे। आपने मानवीय मूल्यों को कभी भी अपने से दूर नहीं जाने दिया।
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