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Ghazipur News: फाग का राग बना देता है मन-मिजाज
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बसंत पंचमी आते ही होली की तैयारियां और फाग गीत लोगों के मन में उल्लास का वातावरण बनाने लगता है। क्या बूढ़े ,क्या जवान और क्या बच्चे सभी लोग इस त्योहार के लिए आकुल हो उठते हैं।
आज के कई दशकों पूर्व गांव घर के सम्मानित जनों द्वारा दी गई जिम्मेदारियों के हिसाब से काम भी होता था। तब त्योहार की छटा देखते बनती थी। स्त्री पुरुष दोनों वर्ग इस त्योहार का उल्लास मनाते नहीं थकते थे। उल्लास का वातावरण बसंत पंचमी के पास से ही शुरू हो जाता था। धीरे-धीरे यह परंपरा औपचारिक हो कर रह गई है।
बसंत पंचमी के दिन होलिका की स्थापना के साथ ही फाग और होली का अटूट रिस्ता गहराने लगता है। बड़े बुजुर्गों से उनके समय के होली की बात चलती है तो उनका मन दुखी हो उठता है। पहले की होली और आज की होली में बड़ा फर्क आ गया है। तब प्रेम और सौहार्द की होली थी। अब होली को हुड़दंग का त्योहार मान लिया गया है। आपसी प्रेम की जगह कटुता और प्रतिद्वंदिता ने इस पर्व की परंपरा का क्षरण कर दिया है।
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सावर्जनिक स्थलों पर बजने लगते थे ढोल मजीरे
औड़िहार। करीब छह -सात दशक पूर्व तक बसंत पंचमी से ही जगह जगह ढोल मजीरे सुनाई देने लगते थे। सार्वजनिक स्थलों पर इकट्ठा होकर शाम को देर रात तक फाग के गीत आध्यात्मिक और सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने का काम करते थे। उस वक्त के फाग गीत - बम भोले बाबा, बम भोले बाबा ,कहां रंगायो शिव पगरिया। मथुरा रंगायो की काशी रंगायो, कहां की ओडी चादरिया। स्त्रियां भी अपनी अलग गोल लेकर आंगन में चौपाल लगाने में पुरुषों को पीछे छोड़ देती थी। बदलते परिवेश और आधुनिकता बोध में अब होली की उमंग गायब है।
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आज के कई दशकों पूर्व गांव घर के सम्मानित जनों द्वारा दी गई जिम्मेदारियों के हिसाब से काम भी होता था। तब त्योहार की छटा देखते बनती थी। स्त्री पुरुष दोनों वर्ग इस त्योहार का उल्लास मनाते नहीं थकते थे। उल्लास का वातावरण बसंत पंचमी के पास से ही शुरू हो जाता था। धीरे-धीरे यह परंपरा औपचारिक हो कर रह गई है।
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बसंत पंचमी के दिन होलिका की स्थापना के साथ ही फाग और होली का अटूट रिस्ता गहराने लगता है। बड़े बुजुर्गों से उनके समय के होली की बात चलती है तो उनका मन दुखी हो उठता है। पहले की होली और आज की होली में बड़ा फर्क आ गया है। तब प्रेम और सौहार्द की होली थी। अब होली को हुड़दंग का त्योहार मान लिया गया है। आपसी प्रेम की जगह कटुता और प्रतिद्वंदिता ने इस पर्व की परंपरा का क्षरण कर दिया है।
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सावर्जनिक स्थलों पर बजने लगते थे ढोल मजीरे
औड़िहार। करीब छह -सात दशक पूर्व तक बसंत पंचमी से ही जगह जगह ढोल मजीरे सुनाई देने लगते थे। सार्वजनिक स्थलों पर इकट्ठा होकर शाम को देर रात तक फाग के गीत आध्यात्मिक और सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने का काम करते थे। उस वक्त के फाग गीत - बम भोले बाबा, बम भोले बाबा ,कहां रंगायो शिव पगरिया। मथुरा रंगायो की काशी रंगायो, कहां की ओडी चादरिया। स्त्रियां भी अपनी अलग गोल लेकर आंगन में चौपाल लगाने में पुरुषों को पीछे छोड़ देती थी। बदलते परिवेश और आधुनिकता बोध में अब होली की उमंग गायब है।