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धारावाहिक लेखन में शांति भूषण ने बनाया मुकाम, फिल्म पीके से बढ़ी पहचान
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सीरियल राइटर शांतिभूषण सिंह।
- फोटो : GHAZIPUR
गाजीपुर। युवराजपुर के रहने वाले शांति भूषण ने रंगमंच से फिल्म तक का सफर तय किया लेकिन आज उनकी पहचान टेलीविजन चैनलों के धारावाहिक लेखक के रूप में होती है।
शांतिभूषण ने शौकिया रंगमंच की शुरुआत प्रयागराज से की। उन्होंने गोदान, हवालात, खूनी बैसाखी, कोर्ट मार्शल, वेटिंग फॉर गोदो जैसे नाटकों में अभिनय करने के बाद मुंबई का रुख किया। साल 2000 में मुंबई पहुंचे। फिल्मों और धारावाहिकों में काम की तलाश की लेकिन कठिन संघर्ष के बाद उन्हें टेलीविजन के लिए लिखने का काम मिला तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। जाएं कहां, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, इश्क का रंग सफेद, नमक इश्क का, डॉक्टर बीआर अंबेडकर जैसे धारावाहिकों के जरिए उन्होंने मुंबई में अपना सिक्का जमा लिया। वर्ष 2014 में रिलीज हुई फिल्म पीके में आमिर खान को भोजपुरी बोलना सिखाने वाले शांतिभूषण की पहचान हिंदी सिनेमा में भी बनती गई। आज वे फिल्मों और धारावाहिक के स्थापित लेखक बन चुके हैं।
शांति भूषण की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल में प्रारंभ हुई, जिसमें उनके पिता मुरलीधर सिंह अध्यापक थे। उनका झुखाव बचपन से ही साहित्य और कला के प्रति था। उनका मन रामलीला में भाग लेने होता था लेकिन पिता के कठोर अनुशासन के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। गाजीपुर के सिटी इंटर कालेज से इंटरमीडिएट करने बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय और वहां से लखनऊ में मेडिकल की पढ़ाई करने गए लेकिन वहां भी मन नहीं रमा। हां गिटार बजाना जरूर सीख लिया। वहां से प्रयागराज आए और थिएटर में काम करने लगे। लंबे समय तक रंगमंच करने के बाद मुंबई पहुंच गए।
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शांतिभूषण ने शौकिया रंगमंच की शुरुआत प्रयागराज से की। उन्होंने गोदान, हवालात, खूनी बैसाखी, कोर्ट मार्शल, वेटिंग फॉर गोदो जैसे नाटकों में अभिनय करने के बाद मुंबई का रुख किया। साल 2000 में मुंबई पहुंचे। फिल्मों और धारावाहिकों में काम की तलाश की लेकिन कठिन संघर्ष के बाद उन्हें टेलीविजन के लिए लिखने का काम मिला तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। जाएं कहां, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, इश्क का रंग सफेद, नमक इश्क का, डॉक्टर बीआर अंबेडकर जैसे धारावाहिकों के जरिए उन्होंने मुंबई में अपना सिक्का जमा लिया। वर्ष 2014 में रिलीज हुई फिल्म पीके में आमिर खान को भोजपुरी बोलना सिखाने वाले शांतिभूषण की पहचान हिंदी सिनेमा में भी बनती गई। आज वे फिल्मों और धारावाहिक के स्थापित लेखक बन चुके हैं।
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शांति भूषण की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल में प्रारंभ हुई, जिसमें उनके पिता मुरलीधर सिंह अध्यापक थे। उनका झुखाव बचपन से ही साहित्य और कला के प्रति था। उनका मन रामलीला में भाग लेने होता था लेकिन पिता के कठोर अनुशासन के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। गाजीपुर के सिटी इंटर कालेज से इंटरमीडिएट करने बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय और वहां से लखनऊ में मेडिकल की पढ़ाई करने गए लेकिन वहां भी मन नहीं रमा। हां गिटार बजाना जरूर सीख लिया। वहां से प्रयागराज आए और थिएटर में काम करने लगे। लंबे समय तक रंगमंच करने के बाद मुंबई पहुंच गए।
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