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Ghazipur News: गुमनाम पत्र से सकते में अधिकारी, जांच के बाद हो सकती है और कार्रवाई

Mon, 17 Mar 2025 11:37 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 17 Mar 2025 11:37 PM IST
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Officials are shocked by the anonymous letter, further action may be taken after investigation
जिला जेल में अभी और कार्रवाई हो सकती है। कार्रवाई के बीच गुमनाम पत्र से उच्चाधिकारियों को हैरान करने वाली बातें पता चली हैं। इससे जेल अधिकारी भी सकते में हैं। फिलहाल, यह पत्र किस परिस्थिति में किसने लिखा, इसकी भी जांच कराई जा रही है। वहीं, विभागीय अधिकारी इसे गुटबाजी और साजिश का हिस्सा मान रहे हैं। क्योंकि यह पत्र जांच रिपोर्ट तैयार होने के ठीक पहले भेजा गया है और गुमनाम पत्र में लगाए गए आरोपों में से कुछ बातें जांच रिपोर्ट में पाई भी गई है। हालांकि अभी कोई भी अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
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अमर उजाला इस पत्र की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है लेकिन पत्र में यह भी बताया गया है कि पूरे खेल से जेल अधीक्षक अनभिज्ञ हैं। उनकी आड़ में ही यह खेल संचालित हो रहा है। जबकि जेल अधीक्षक किसी से मिलना तो दूर फोन पर भी बात नहीं कर रहे हैं। वहीं, जांच में यह बात सामने आई है कि पिछले दो महीनों में जेल के अंदर से सैकड़ों कॉल की गई हैं। ये कॉल जेल में संचालित अवैध पीसीओ से की गई है। पुलिस-प्रशासन और डीआईजी जेल की जांच में जेल अधीक्षक कार्यालय में तैनात बंदी राइटर संतोष कुमार सिंह उर्फ पवन सिंह की भी भूमिका संदिग्ध मिली है। वहीं, गुमनाम पत्र में भी पवन सिंह को जेल में हो रहे खेल में महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया है। जिला मजिस्ट्रेट आर्यका अखौरी ने भी इस बात की जेल अधीक्षक के राइटर (रीडर) भूमिका को संदिग्ध मानते हुए अपनी रिपोर्ट भेजी है। वहीं, जगह-जगह भेजे गए गुमनाम पत्र में आरोप लगाया है कि पवन सिंह कारापाल का खास रहा।
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गुमनाम पत्र में लिखा गया है कि वीआईपी ट्रीटमेंट लेने वाले बंदियों से कितना पैसा लेना है, यह पवन ही तय करता। गुमनाम पत्र के मुताबिक दो लड़के राजस्थान से आए थे वे लोग एक महीने में 20 हजार रुपये दिए, जिसका नाम सचिन था। जबकि अशोक हेरोइन तस्करी में था, जिसने 15 हजार रुपये दिए। विशाल यादव अभी भी है, जो 15 हजार रुपये दिया। विजय भारती 35 हजार रुपये दे चुका है। विष्णु पाठक 32 हजार रुपये देता है। इसी तरह एक आरपीएफ सिपाही आया था, उससे 20000 रुपये लिए। विजेंद्र से 17000 रुपये लिए, विक्की से 10 हजार रुपये लिए। पत्र के मुताबिक इन सभी लोगों से कहता कि किसी से कुछ नहीं कहना है, नहीं तो कोई सुविधा नहीं मिलेगी और इस बैरिक से भीड़भाड़ वाले बैरिक में ट्रांसफर कर देंगे, जिसके डर से कोई कुछ नहीं बोलता है। हालांकि गुमनाम पत्र की सत्यता की पुष्टि अमर उजाला नहीं करता है।
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गुमनाम पत्र में यह दावा किया गया है कि जिला कारागार में प्राइवेट पीसीओ भी कारापाल की कृपा से चल रहा था। इसका संचालन सजायाफ्ता बंदी संतोष कुमार सिंह उर्फ पवन सिंह ही करता था। यह पीसीओ चार की संख्या में तीन सिम वाले हैं। जबकि एक फोन बीएसएनएल लैंड लाइन है। यह बात प्रशासन की जांच रिपोर्ट से भी सामने आई।
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