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सादात कांड के नायक अलगू का नहीं बना कोई स्मारक
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आजादी की लड़ाई में सादात क्षेत्र के वीर सपूतों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहां 15 अगस्त 1942 को एक बड़ा विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह में सादात थाना के प्रभारी मुंशी हमीदुल्लाह खां और सिपाही वली मुहम्मद को जिंदा जला दिया गया था। इस विद्रोह में एक क्रांतिकारी अलगू अहीर शहीद हो गए थे। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह घटना आज भी सादात कांड के नाम से जानी जाती है। कालांतर में जिंदा जलाए गए दोनों पुलिस कर्मियों की मजार पुलिस विभाग ने बनवा दी लेकिन इस कांड के नायक अलगू की पहचान को साबित करने वाला कोई स्मारक अभी तक यहां नहीं बना है। उनकी मूर्ति भी कहीं नहीं लगी है। यह शहीद आज भी उपेक्षित है। सादात कांड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डोरिया गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पांच वर्ष तक जेल की हवा खाने वाले रघुनाथ यादव जो आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन पूर्व में उन्होंने इस घटना का बयान कुछ इस प्रकार किया है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सादात में 14 अगस्त 1942 की शाम को ही क्रांति की आग भड़क चुकी थी। अगले दिन 15 अगस्त को पौ फटते ही क्रांतिकारी सादात रेलवे स्टेशन को फूंकने और डाकघर एवं सहकारी बीज गोदाम को लूटने पहुंच गए थे। देखते ही देखते डाकघर और बीज गोदाम लूट लिया गया। उधर रेलवे स्टेशन में क्रांतिकारियों द्वारा तोड़-फोड़ जारी थी। स्टेशन को फूंकने का प्रयास करते हुए क्रांतिकारियों पर वहां मौजूद अंग्रेज पुलिस ने फायर झोंक दिया। एक गोली क्रांतिकारी हरवंश दूबे के पैर में लगी और वे घायल हो गए। गोली चलने की घटना पूरे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई और देखते ही देखते कुछ ही घंटे में वहां हजारों की भीड़ एकत्र हो गई। क्रांतिकारियों की भीड़ बढ़ते देख पुलिस वहां से भाग कर थाने आने लगी। पुलिस को भागते देख क्रांतिकारी भी उनका पीछा करते हुए थाना पर पहुंच गए। उससे पहले थाने की सारी पुलिस भाग चुकी थी। उस समय थाना में सिर्फ सब इंस्पेक्टर मुंशी हमीदुल्लाह खां और सिपाही वली मुहम्मद ही मौजूद थे। क्रांतिकारियों से थाना घिरा देखकर ये दोनों पुलिस कर्मी मौका पाते ही घोड़े पर सवार होकर उत्तर दिशा में राजभर बस्ती की तरफ भागने लगे तभी क्रांतिकारियों ने उनको घेर लिया। क्रांतिकारी अलगू साहस दिखाते हुए घोड़े के पास पहुंचकर सब इंस्पेक्टर मुंशी हमीदुल्लाह खां का एक पैर पकड़ कर घोड़े से खींचने लगे। उसी वक्त उसने अलगू के सीने मे गोली मार दी और वे मौके पर ही शहीद हो गए। अलगू के शहीद होते ही क्रांतिकारी दोनों पुलिस कर्मियों पर टूट पड़े और उन दोनों का पैर पकड़कर घसीटते हुए थाना परिसर में ले आए। उससे पहले क्रांतिकारियों ने थाना के कमरों के दरवाजे एवं खिड़कियां तोड़कर एकत्र किया था। उस पर मिट्टी का तेल छिड़ककर दोनों पुलिस कर्मियों को उसी में फेंककर जिंदा जला दिया गया। इसके बाद पुलिस ने क्रांतिकारियों पर कहर बरसाना शुरु कर दिया। उनकी धरपकड़ होने लगी। सैकड़ों क्रांतिकारी पकड़कर जेलों में ठूस दिए गए। वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ तब इन्हें छोड़ा गया। उधर जिंदा जलाए गए दोनों पुलिस कर्मियों की मजार पुलिस विभाग ने थाना के गेट के पास बनवा दी लेकिन शहीद अलगू की मूर्ति आज तक जिला प्रशासन ने नहीं लगवाई। जखनिया ब्लाक के कुत्तुबपुर गांव निवासी अलगू के शहादत दिवस पर उनके परिवार में जाकर कोई उनका कुशलक्षेम भी पूछने वाला नहीं है। सादात कांड में अहम भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारियों में जीतन पांडेय, रघुनाथ यादव, जीऊत कोइरी, शिवनाथ यादव, रहमतुल्लाह नाई, प्रसिद्धन लोहार, सुक्खू साव, दमडी सेठ, नथई यादव, रज्जू यादव और हरिप्रसाद सिंह का नाम शामिल है।
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