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बिना खाए-पिए रोज सैकड़ों किमी पैदल चल रहे प्रवासी मजदूर

Wed, 20 May 2020 09:51 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 20 May 2020 09:51 PM IST
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Migrant laborers walking hundreds of km daily without eating and drinking
सैदपुर में जबलपुर से पैदल आये प्रवासी मजदूर । - फोटो : GHAZIPUR
गाजीपुर/औड़िहार। सिर पर गठरी का बोझ, दोनों कंधे से होते पीठ पर लटकता बैग एवं मुंह पर बंधी धूल से सनी रुमाल। हफ्तों से बिना नहाए, भूखे-प्यासे चिलचिलाती धूप में पैदल चलने वाले मजदूरों की दशा देखकर कौन ऐसा व्यक्ति है, जो द्रवित नहीं हो जाता। सूनी आंखों में गहराती उदासी, माथे पर झांकती थकान और रुआंसे मन की व्यथा लिए रोज सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने वाले प्रवासी मजदूरों की कहानी तमाम सरकारी दावों का पोल खोलने के लिए काफी है। प्रदेश सरकार की ओर से पैदल न चलने की हिदायत के बावजूद सड़क एवं रेल के किनारे बने रास्ते से अभी भी देश के महानगरों से दिन-रात पैदल आना मजदूरों की मजबूरी बनी हुई है।
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ससुराल की अंगूठी, बर्तन व सिलेंडर बेचकर घर आया चंद्रभान
गाजीपुर। अपने दर्द को ठीक से बयां न कर पाने वाले चंद्रभान ऐसे थके हारे थे कि मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। भूख प्यास से वह परेशान थे। पानी मिल गया तो बताया कि वह गुजरात के जामनगर में एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। कंपनी बंद हो जाने पर उन्हें काम से जवाब मिल गया। वह वहां से बीते 13 मई को पैदल ही घर के लिए चल दिए। एक-एक पैसे के लिए मोहताज इस प्रवासी मजदूर की कहानी सुनकर आंखों में आंसू छलक आते हैं। पैर में फटा जूता और एक पुरानी टी-शर्ट डाले यह व्यक्ति अपना बर्तन, गैस का सिलेंडर और ससुराल की मिली शादी के समय की अंगूठी बेचकर वहां से घर के लिए निकल पड़ा। तीन दिन लगातार पैदल चलने के बाद वह किसी तरह राजस्थान के भरतपुर तक पैदल आया। यहां से कानपुर आ रही एक ट्रक ने एक हजार लेकर बिरहाना रोड पर छोड़ दिया। यहां रात विश्राम करने के बाद यह प्रवासी मजदूर एक कंटेनर से प्रयागराज आया। इस शहर के कीटगंज मैं विश्राम के वक्त किसी ने जेब में पड़े तीन हजार भी मार दिया। अब क्या था, इस व्यक्ति पर तो विपत्ति का पहाड़ ही टूट पड़ा। किससे पानी मांगे और किससे दाना अपने भाग्य को कोसता वह यह मानने को विवश हुआ मेरी नियत में विधाता ने दुख लिख ही दिया है। मन में ठान लिया मजदूर हूं लेकिन मजबूर नहीं। आगे निकल पड़ा। झूंसी, दारागंज में स्वयंसेवी संगठन द्वारा बट रहे भोजन के पैकेट पाकर निहाल हो गया। उसने बताया कि वहां अन्य मेरी ही तरह के मजदूर भी खाना खा रहे थे। लोगों के बीच अपनी दशा पर एक बार फिर मेरी आंखों से आंसू छलक आए। मेरी आप बीती सुनकर निलेश नामक एक स्वयंसेवी ने मुझे पानी की एक बोतल 50 रुपये नकद देकर पुन: एक ट्रक पर बैठा दिया। वाराणसी से मंगलवार की रात पैदल चलकर अगले दिन यह शख्स सैदपुर आया। यहां से घरवालों को फोन कर साइकिल मंगवाई और अपने घर जैनपुर बुधवार की अपरान्ह पहुंच गया। घर वालों ने इन्हें घर के बाहर एक कमरे में क्वारंटीन कर दिया है।
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इंसेट:
जेब में फूटी कौड़ी नहीं, कर्ज लेकर पैसा भेजा, तो घर पहुंचा
गाजीपुर। महाराष्ट्र के मुलुंड में रहकर काम करने वाले नेवादा के राधेश्याम चौहान, लल्लन राजभर बताते हैं कि रेल से आने के लिये तीन बार पंजीकरण कराया, लेकिन आने का टोकन नहीं मिला। पेंट करने का कार्य लाकडाउन लगते ही बंद हो गया। मजदूरी का पैसा महीनों बैठकर खाया। अब घर भी लौटना भारी था। जेब में फूटी कौड़ी नहीं। गांव के साहूकार से घऱ वालों ने कर्ज लेकर पैसा भेज दिया। घर से निकलते वक्त मकान मालिक ने किराया देने का दबाव बनाया तो सारा घरेलू सामान देकर निकल लिया। ट्रक वाला दो हजार लेकर जबलपुर में उतार कर भाग निकला। अब ब्रेड और बिस्कुट पर दिन कटने लगा। सतना तक 200 किलोमीटर पैदल चलकर सोमवार को वाराणसी पहुंचा। यहां बुखार हो गया। घर जाने के उतावलेपन और बुखार में कही संदिग्ध मानकर क्वारंटीन न हो जाऊं इसलिए पैदल आने की हिम्मत नहीं हारी।
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