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लगातार तेज-धीमी बारिश से ठहर सी गई जिंदगी
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गाजीपुर। शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में बृहस्पतिवार की सुबह शुरू हुई तेज और धीमी बारिश का क्रम शाम तक जारी रहा। लगातार बारिश से जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। जिंदगी ठहर सी गई है। बारिश की वजह से सड़कों पर नाममात्र की चहल रही। गिने-चुने लोग जहां छतरी के सहारे आते-जाते दिखाई दिए, वहीं जिनकी मजबूरी थी, वह भींगते हुए। घंटों बारिश से मौसम सुहाना हो गया और लोगों को उमस और गर्मी से काफी हद तक राहत मिली। ऐसे लोगों को जब ऐसा लगा कि यह बारिश जल्द बंद होने वाली नहीं है तो वह छाता या भींगते हुए घरों से निकल पड़े। लगातार तेज और धीमी बारिश से जन-जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। जिंदगी ठहर सी गई। लोग घरों में कैद रहे। मार्गों पर वहीं लोग आवागमन करते नजर आए, जिनकी कुछ मजबूरी थी। नाममात्र के लोग छाता, रेनकोट के सहारे आते-जाते दिखाई दिए, वहीं कई लोग भींगकर। शाम को पांच बजे तक हल्की बारिश का क्रम जारी रहा। घंटों बारिश से मौसम सुहाना हो गया। गर्मी और उमस से परेशान लोगों को काफी हद तक राहत मिली। मौसम का रुख देख लोग यह कयास लगाते रहे कि पूरी रात बारिश होगी।
चिंतित रहे कच्चा मकानों में रहने वाले
गाजीपुर। घंटों कभी तेज तो कभी धीमी बारिश होने से एक तरफ जहां गर्मी से बेचैन लोगों के दिलों को चैन मिल गया, वहीं गरीबों के माथे पर बल पडऩे लगा है। सबसे ज्यादा चिंतित वह गरीब रहे, जिनका मकान मिट्टी का है। वह इस बात से परेशान दिखे कि अगर घंटों रिमझिम बारिश हुई तो उनके कच्चे मकान की मिट्टी बह जाएगी, जिससे मकान के गिरने का खतरा रहेगा। घरों में पानी ना टपके और दीवारों को नुकसान ना हो, इसके लिए उनके द्वारा बचाव के लिए तरह-तरह के जतन किए जाते रहे। कइयों ने इससे बचाव के लिए तिरपाल, प्लास्टिक की चादर खरीदकर मकानों को ढंका।
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चिंतित रहे कच्चा मकानों में रहने वाले
गाजीपुर। घंटों कभी तेज तो कभी धीमी बारिश होने से एक तरफ जहां गर्मी से बेचैन लोगों के दिलों को चैन मिल गया, वहीं गरीबों के माथे पर बल पडऩे लगा है। सबसे ज्यादा चिंतित वह गरीब रहे, जिनका मकान मिट्टी का है। वह इस बात से परेशान दिखे कि अगर घंटों रिमझिम बारिश हुई तो उनके कच्चे मकान की मिट्टी बह जाएगी, जिससे मकान के गिरने का खतरा रहेगा। घरों में पानी ना टपके और दीवारों को नुकसान ना हो, इसके लिए उनके द्वारा बचाव के लिए तरह-तरह के जतन किए जाते रहे। कइयों ने इससे बचाव के लिए तिरपाल, प्लास्टिक की चादर खरीदकर मकानों को ढंका।
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