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होली आते ही चुभने लगती है सैदपुर के रंग उद्योग की याद

Fri, 11 Mar 2022 11:25 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 11 Mar 2022 11:25 PM IST
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As soon as Holi comes, the memory of Saidpur's color industry starts stinging
सैदपुर के रानी चौक मोहल्ले में घर में रंग की पुड़िया की पैकिंग करती महिला व उसकी पुत्री। संवाद - फोटो : GHAZIPUR
औड़िहार। सैदपुर के असली जंगली हरा, गुलाबी और वसंती रंग में जिले ही नहीं दूसरे देशों के लोग भी होली पर दूसरों के चेहरे रंग दिया करते थे। सैदपुर के रंग उद्योग की धाक पूरे उत्तर भारत के साथ-साथ नेपाल, सिक्किम और तिब्बत में भी थी। रंगों की इन्हीं कारखानों में पुड़िया और टिकिया वाली स्याही भी बना करती थी। कसबे के हजारों लोग इस कुटीर उद्योग से जुड़े थे लेकिन अब यहां के रंग फीके पड़ गए हैं।
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कपड़े रंगने, बेल बूटे बनाने और छपाई के काम आने वाले रंगों का निर्माण बड़े पैमाने पर जिले में होता था। नील और स्याही भी यहीं बना करता था। इनको बनाने वाले रंगरेज कहे जाते थे। होली के समय कठिनाई से छुड़ाने लायक रंगों का निर्माण यही रंगरेज किया करते थे। सैदपुर के वसंती, गुलाबी, लाल, हरे और बैंगनी रंगों की पुड़िया वाली नील की बड़ी मांग होती थी। औड़िहार जंक्शन और सैदपुर रेलवे स्टेशन का मालगोदाम साल के बारहों महीने रंग के बड़े-बड़े कार्टन में भरा रहता था। मिठाइयों में भी सैदपुर में बने रंगों का इस्तेमाल होता था। इमरती, लड्डू ,रंगीन बर्फी बनाने में इसका इस्तेमाल मिठाई के दुकानदार करते थे।
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संरक्षण के अभाव में रंग उद्योग बंदी की कगार पर है। अब सूती कपड़ों की रंगाई और छपाई मिलों में होती है। रही हैं। मिठाइयों में भी अब रंग की खपत कम होने लगी है। बाजारों में पुड़िया वाले रंगों की मांग नहीं रह गई। कलम-दावात से लिखने का चलन खत्म होने के कारण स्याही की भी मांग नहीं रह गई है। रंगों के बाजार को बड़ी कंपनियों ने निगल लिया है। रंग उद्यमी प्रताप कुमार गुप्ता, रतन कुमार एवं रंग के कारखाने में काम करने वाली गीता देवी, रीना गुप्ता ,रेखा देवी आदि यहां रंग उद्योग की बदहाली की चर्चा करते हुए कहती हैं कि कुटीर उद्योग होने के बावजूद भी इस उद्योग के लिए सरकार द्वारा कोई प्रोत्साहन नहीं है। वैैट की मार इस रंग उद्योग पर भी है। मजदूरों का बड़े शहरों की ओर पलायन हो जाना भी इस उद्योग के गिरावट का कारण है।
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