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बाढ़ आते ही प्रलय मचाती है गोमती नदी
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भीमापार इलाके के गोमी नदी में लगातार बढ़ रहा जलस्तर का दृश्य।
- फोटो : GHAZIPUR
भीमापार। गोमती नदी के जलस्तर में लगातार वृद्धि होने से तटवर्ती गांवों के लोगों में हड़कंप मचा हुआ है। कुछ सहायक नदियों, दर्जनों कैनालों और सैकड़ों नालों के साथ ही बरसात में पानी से भरी गोमती नदी का जलस्तर अपने किनारों के खेतों में खड़ी फसलों को डुबाने लगा है। यही वजह है कि बीते कईं सालों से गोमती नदी में आई बाढ़ की विभीषका को याद कर यहां के लोग सिहर उठते हैं। हालांकि बाढ़ के दौरान प्रशासन द्वारा दी गई राहत सामग्री हर साल ही यहां के बाढ़ पीड़ित परिवारों के लिए ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुई है।
गोमती नदी क्षेत्र के नेवादा गांव से जिले में प्रवेश करती हैं। इसके बाद नदी का पानी गदनपुर, भुजाड़ी, बहुरा, तेतारपुर, गौरहट, गौरी, नुरदीपुर, अमेहता, सिधौना, खरौना, कुसहीं, हथौड़ा के बाद पटना गांव में मोक्षदायिनी गंगा में समाहित हो जाती है। पीलीभीत के तराई क्षेत्र में स्थित गोमत ताल से निकलने वाली गोमती नदी के लगभग 900 किलोमीटर के सफर में यूं तो सैकड़ों नालों और कैनालों का पानी प्रवेश करता है। लेकिन जौनपुर में अपने आधा दर्जन सहायक नदियों का पानी लेकर जब सईं नदी का पानी गोमती में प्रविष्ट होता है ,तो इसी गोमती का पानी अपने अत्यधिक उग्र रूप में आ जाता है। इसके बाद तो इसमें बारिश का पानी मिलकर बाढ़ का प्रलयंकारी रूप ले लेता है। फिर इसके बाद यह क्षेत्र के हजारों गांववासियों के लिए एक भयानक त्रासदी का कारण बन जाता है। लगभग दो हजार एकड़ की खेती में लगी फसलों को जलमग्न कर उन्हें उजाड़ते हुए जब गोमती का पानी इन 14 गांवों को अपने घेरे में ले लेता है, तो शेष जिले से ग्रामीणों का संपर्क टूट जाता है, और लोग छटपटा कर रह जाते हैं। लोगों का कहना है कि बाढ़ के दौरान प्रशासन जो भी राहत सामग्री उपलब्ध करवाता है। वह भी ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होता है। यदि क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और शासन, प्रशासन के लोग बाढ़ का स्थायी समाधान करते तो गौरी गांव से तेतारपुर को जाने वाले सम्पर्क मार्ग को लगभग 20 फुट ऊंचा करवा देते। इससे लगभग आधा दर्जन ग्रामवासियों को आवागमन की सुविधा हो जाती।
इसके अलावा गोमती नदी के किनारों पर बाढ़ को रोकने के लिये पत्थर के बड़े-बड़े बोल्डर बिछाए जाने की मांग हर साल की जाती है। लेकिन बाढ़ का पानी उतरने के बाद अगले साल फिर बाढ़ के आने की प्रतीक्षा तो कर ली जाती है। लेकिन इसके स्थायी समाधान की ओर एक भी कदम नहीं उठाया जाता। इस विषय में पूछे जाने पर एसडीएम सैदपुर अनिरूद्ध प्रताप सिंह ने कहा कि अभी बीते बुधवार को ही उन्होने अपनी टीम के साथ तेतारपुर सहित कईं बाढ़ से प्रभावित हो सकने वाले गांवों का दौरा किया है। अभी चिन्ता की कोई बात नहीं है। फिर भी प्रशासन किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। बाढ़ चौकियों की स्थापना कर उन पर तैनात कर्मचारियों को पूरी सजगता से नजर रखने के लिए कह दिया गया है। साथ ही छोटी-बड़ी पर्याप्त नौकाओं की व्यवस्था भी कर ली गई है।
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गोमती नदी का रामायण काल से है पौराणिक महत्व
भीमापार। क्षेत्र में बहने वाली मोक्षदायिनी गंगा की प्रमुख सहायक नदी गोमती के पौराणिक महत्व को भी रामायण काल से जोड़ कर बताया जाता है। शिवपुराण में तो मां नर्मदा के बाद गोमती को भगवान शिव की दूसरी पुत्री कहा गया है। एकादशी के दिन गोमती के पवित्र जल में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में जिस धेनुमति नदी का जिक्र आता है। वह गोमती ही हैं। रावण का वध करने के बाद ब्रम्हहत्या से बचने के लिए अपने गुरु ब्रम्हर्षि वशिष्ठ की आज्ञानुसार भगवान श्रीराम ने गोमती नदी में ही स्नान कर अपने
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गोमती नदी क्षेत्र के नेवादा गांव से जिले में प्रवेश करती हैं। इसके बाद नदी का पानी गदनपुर, भुजाड़ी, बहुरा, तेतारपुर, गौरहट, गौरी, नुरदीपुर, अमेहता, सिधौना, खरौना, कुसहीं, हथौड़ा के बाद पटना गांव में मोक्षदायिनी गंगा में समाहित हो जाती है। पीलीभीत के तराई क्षेत्र में स्थित गोमत ताल से निकलने वाली गोमती नदी के लगभग 900 किलोमीटर के सफर में यूं तो सैकड़ों नालों और कैनालों का पानी प्रवेश करता है। लेकिन जौनपुर में अपने आधा दर्जन सहायक नदियों का पानी लेकर जब सईं नदी का पानी गोमती में प्रविष्ट होता है ,तो इसी गोमती का पानी अपने अत्यधिक उग्र रूप में आ जाता है। इसके बाद तो इसमें बारिश का पानी मिलकर बाढ़ का प्रलयंकारी रूप ले लेता है। फिर इसके बाद यह क्षेत्र के हजारों गांववासियों के लिए एक भयानक त्रासदी का कारण बन जाता है। लगभग दो हजार एकड़ की खेती में लगी फसलों को जलमग्न कर उन्हें उजाड़ते हुए जब गोमती का पानी इन 14 गांवों को अपने घेरे में ले लेता है, तो शेष जिले से ग्रामीणों का संपर्क टूट जाता है, और लोग छटपटा कर रह जाते हैं। लोगों का कहना है कि बाढ़ के दौरान प्रशासन जो भी राहत सामग्री उपलब्ध करवाता है। वह भी ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होता है। यदि क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और शासन, प्रशासन के लोग बाढ़ का स्थायी समाधान करते तो गौरी गांव से तेतारपुर को जाने वाले सम्पर्क मार्ग को लगभग 20 फुट ऊंचा करवा देते। इससे लगभग आधा दर्जन ग्रामवासियों को आवागमन की सुविधा हो जाती।
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इसके अलावा गोमती नदी के किनारों पर बाढ़ को रोकने के लिये पत्थर के बड़े-बड़े बोल्डर बिछाए जाने की मांग हर साल की जाती है। लेकिन बाढ़ का पानी उतरने के बाद अगले साल फिर बाढ़ के आने की प्रतीक्षा तो कर ली जाती है। लेकिन इसके स्थायी समाधान की ओर एक भी कदम नहीं उठाया जाता। इस विषय में पूछे जाने पर एसडीएम सैदपुर अनिरूद्ध प्रताप सिंह ने कहा कि अभी बीते बुधवार को ही उन्होने अपनी टीम के साथ तेतारपुर सहित कईं बाढ़ से प्रभावित हो सकने वाले गांवों का दौरा किया है। अभी चिन्ता की कोई बात नहीं है। फिर भी प्रशासन किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। बाढ़ चौकियों की स्थापना कर उन पर तैनात कर्मचारियों को पूरी सजगता से नजर रखने के लिए कह दिया गया है। साथ ही छोटी-बड़ी पर्याप्त नौकाओं की व्यवस्था भी कर ली गई है।
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गोमती नदी का रामायण काल से है पौराणिक महत्व
भीमापार। क्षेत्र में बहने वाली मोक्षदायिनी गंगा की प्रमुख सहायक नदी गोमती के पौराणिक महत्व को भी रामायण काल से जोड़ कर बताया जाता है। शिवपुराण में तो मां नर्मदा के बाद गोमती को भगवान शिव की दूसरी पुत्री कहा गया है। एकादशी के दिन गोमती के पवित्र जल में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में जिस धेनुमति नदी का जिक्र आता है। वह गोमती ही हैं। रावण का वध करने के बाद ब्रम्हहत्या से बचने के लिए अपने गुरु ब्रम्हर्षि वशिष्ठ की आज्ञानुसार भगवान श्रीराम ने गोमती नदी में ही स्नान कर अपने